अभी हाल ही में कृषि मंत्रालय ने 2007-08 और उससे पिछले साल के कृषि के आंकड़े जारी किए। इसकी मानें तो इन दो सालों में कई फसलों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था।
इसी वजह से कृषि मंत्रालय, कृषि क्षेत्र के इस प्रदर्शन को जबरदस्त बता रहा है। लेकिन करीब से देखने पर यह तस्वीर उतनी खुशनुमा नहीं लगती है। सच तो यह है कि कृषि सेक्टर के इस प्रदर्शन की तुलना अगर पहले के आंकड़ों की जाए, तो सरकारी दावों की धज्जियां उड़ती साफ नजर आती हैं।
अगर कपास को छोड़कर ज्यादातर फसलों के औसत वार्षिक विकास दर की तुलना पहले के उच्चतम स्तरों से की जाए, तो यह विकास बस ठीक-ठाक ही रहा है। सबसे बड़ा झटका तो दो प्रमुख खाद्यान्न, चावल और गेहूं के उत्पादन स्तर को देखकर लगता है। इन दोनों फसलों के उत्पादन में आशा के मुताबिक इजाफा नहीं हुआ है, जिस वजह से खाद्य सुरक्षा के मामले में लटकती हुई तलवार साफ दिखाई दे रही है।
ऊपर से इस साल मानसून ने मुल्क के ज्यादातर खेतों को प्यासा ही रखा है। इसलिए खेतीबाड़ी के लिए अच्छा वक्त बना रहेगा, इस बात पर इक्का-दुक्का लोगों को ही भरोसा है। अब गेहूं को ही ले लीजिए। अभी हाल ही में इसका फिर से आयात शुरू हुआ है। इस वजह से यह पिछले कई दिनों से काफी चर्चा में भी है। नए आंकड़ों की मानें तो 2007-08 में गेहूं का उत्पादन 7.84 करोड़ टन हुआ था। इस पर कृषि मंत्रालय अपनी पीठ खूब थपथपा रहा है, लेकिन केवल आठ साल पहले यानी 1999-2000 के आंकड़ों पर नजर डालें तो तब गेहूं का उत्पादन 7.64 करोड़ टन हुआ था।
मतलब, इस साल के उत्पादन के मुकाबले केवल 20 लाख टन कम। इसका मतलब है कि हमारे मुल्क में पिछले आठ साल में गेहूं का वार्षिक उत्पादन औसतन केवल 0.3 फीसदी की रफ्तार से बढ़ा है। इसका मतलब यह हुआ कि गेहूं के रिकॉर्ड उत्पादन पर जश्न मनाने की जरूरत नहीं है। चावल की हालत भी ज्यादा अच्छी नहीं है। पिछले साल धान का उत्पादन 9.64 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर था। छह साल पहले धान का कुल उत्पादन 9.33 करोड़ टन के स्तर पर था यानी आज के स्तर से बस 30 लाख टन कम।
मतलब, पिछले छह साल से अपने मुल्क में धान के उत्पादन में हर साल औसतन केवल 0.5 फीसदी की रफ्तार से इजाफा हो रहा। इस हिसाब से देखें तो अपने मुल्क की दो प्रमुख खाद्यान्न फसलों के उत्पादन में इजाफा काफी कम नजर आता है। जनसंख्या में हो रहे इजाफे को ध्यान में रखें तो यह बढ़ोतरी कहीं भी नहीं ठहरती है। इसलिए भविष्य में खाद्यान्न के आयात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। हालांकि, हमें कम से कम इस बात का तो शुक्र मानना चाहिए कि इन फसलों के उत्पादन में इजाफा तो हो रहा है।
दूसरी तरफ, मोटे अनाज के उत्पादन का विश्लेषण भी कम मजेदार नहीं है। हाल के वर्षों में मोटे अनाज को खाने की थाली से बाहर धकेल कर कारोबारियों की झोली में डाल दिया गया है। अब इन्हें खाद्यान्न के रूप में कम और नगदी फसलों के रूप में ज्यादा जाना जाने लगा है। इस साल उनका प्रदर्शन वाकई में काफी अच्छा रहा है। इस जबरदस्त उत्पादन की असल वजह रही ऊंची कीमतें। इन ऊंची कीमतों की असल वजह रही पोल्ट्री और स्टार्च उद्योग से आई तेज मांग। इनका भी उत्पादन ज्यादातर बारिश पर निर्भर करती है, लेकिन पिछले चार सालों में इन अनाजों का उत्पादन दो फीसदी से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ा है।
खेती-बाड़ी में सबसे बुरी गत रही दलहनों की। इनके उत्पादन में आया ठहराव खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। पिछले अपने मुल्क में दालों का उत्पादन 1.51 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर था। वैसे, 1998-99 के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो इसे रिकॉर्ड कहने का दिल बिल्कुल भी नहीं कहता। 1998-99 में मुल्क में दाल का कुल उत्पादन 1,49 टन रहा था। मतलब, बस नाम की प्रगति। आज भी अपने मुल्क में आम लोगों के लिए प्रोटीन का मुख्य स्रोत दाल ही है। ऐसे में यह हालात वाकई काफी चिंताजनक है। इसका मतलब यह है कि आयात के भूत से इतनी जल्दी हमारा पीछा नहीं छूटने वाला है।
हालांकि, इस साल मुल्क में तिलहनों के उत्पादन की हालत खाद्यान्न और दालों के उत्पादन से काफी बेहतर है। इसका सेहरा जाता है सोयाबीन की खेती में आई तेजी को, औद्योगिक जगत की बढ़ती मांग से गुलजार रही। सोयाबीन में आज से नहीं, बल्कि पिछले कई सालों से तेजी बरकरार है। पिछले 10 सालों से सोयाबीन के उत्पादन में हर साल औसतन 1.8 फीसदी का इजाफा हो रहा है। खरीफ के इस मौजूदा मौसम में भी कम बारिश की वजह से जहां मूंगफली के बुआई क्षेत्र में कमी आई है, जबकि सोयाबीन के बुआई क्षेत्र में इजाफा हुआ है।
दूसरी तरफ, भले ही महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में किसानों की आत्महत्या की वजह से कपास की फसल की काफी बदनामी हुई है, लेकिन इस साल इस फसल ने वाकई कमाल कर दिया। खासतौर पर तो 2002 के बाद विवादस्पाद बीटी कॉटन के आने के बाद तो इसके उत्पादन काफी इजाफा हुआ है। 2003-04 में इसके आने के बाद से तो इसका कपास के उत्पादन में एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 22 फीसदी का इजाफा हुआ है। इससे पता चलता है कि विकास के लिए तकनीक की कितनी जरूरत होती है।