ज्यादा भी नहीं तो आज से 10 साल पहले की बात है जब बॉलीवुड अदाकारा माधुरी दीक्षित का करियर पूरी बुलंदियों पर था, उस दौरान भी माधुरी एक फिल्म के लिए 20 लाख रुपये बतौर मेहनताना लिया करती थीं।
तब भी निर्माताओं के लिए यह बड़ी रकम हुआ करती थी। बाद में काजोल, प्रीटी जिंटा और उर्मिला मातोंडकर जैसी अभिनेत्रियों ने फिल्मों में काम करने के लिए और ज्यादा पैसा लेना शुरू कर दिया। कुछ साल पहले ऐश्वर्य राय ने फिल्म करने के लिए एक करोड़ रुपये लेकर इस मामले में एक नये अध्याय की शुरुआत की।
फिलहाल कैटरीना कैफ, करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा और ऐश्वर्य राय बच्चन जैसी अभिनेत्रियां एक फिल्म के लिए 4 से 5 करोड़ रुपये ले रही हैं। यह रकम भेजा फ्राई जैसी फिल्मों के कुल बजट से भी ज्यादा बैठती है। न केवल फिल्मों में बल्कि छोटे पर्दे पर भी ये अभिनेत्रियां कम दाम में काम करने को तैयार नहीं हैं।
‘बिग ब्रदर’ फेम शिल्पा शेट्टी कलर्स पर प्रसारित हो रहे उसके देसी संस्करण ‘बिग बॉस-2’ के लिए हर एपीसोड के हिसाब से 80 लाख रुपये ले रही हैं। इतनी ही रकम सलमान खान को सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन पर ‘दस का दम’ प्रस्तुत करने के लिए मिलती है। मतलब साफ है कि इस दौर की अदाकाराएं मेहनताना लेने में भी अपने साथी अभिनेताओं को टक्कर देने लगी हैं।
वहीं अगर विज्ञापनों की बात करें तो मौजूदा दौर की अभिनेत्रियां बड़ी रकम की मांग कर रही हैं। अभी तक दो फिल्में देने वाली दीपिका पादुकोण आईटीसी की फियामा डी विल्स सीरीज के प्रचार के लिए सालाना डेढ़ करोड़ रुपये ले रही हैं। करीना भी किसी उत्पाद के प्रचार के लिए दो करोड़ रुपये सालाना तक वसूल कर रही हैं।
कहा जा रहा है कि सैफ अली खान के साथ एयरटेल के विज्ञापन के लिए तो उन्हें पांच करोड़ रुपये मिले हैं। कुल मिलाकर लब्बोलुआब यही है कि हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियों के दिन बहुत तेजी से बदल रहे हैं। वैसे इस दौरान अभिनेताओं ने भी अपनी कीमतों में कई गुना बढ़ोतरी की है और कमाई के मामले में वे अब भी इन सुंदरियों से आगे ही हैं।
फिल्म विश्लेषक तरण आदर्श कहते हैं, ‘पहले की तुलना में अब फिल्मों के कुल बजट में भी बढ़ोतरी हुई है। कुछ साल पहले 20 से 30 करोड़ रुपये में बनने वाली फिल्म बहुत बड़े बजट की मानी जाती थी, वहीं अब यह पैमाना 80 से 90 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।’ इसके अलावा विदेशों में भारतीय फिल्मों को मिल रही सफलता ने भी बॉलीवुड की हालत को सुधारा है।
पांच साल पहले कोई फिल्म अधिकतम 500 प्रिंटों के साथ रिलीज होती थी। केतन मेहता की 2005 में आमिर खान अभिनीत मंगल पांडे को 1,000 प्रिंटों के साथ रिलीज किया गया था। मौजूदा दौर की बात करें तो जोधा-अकबर और सिंह इज किंग जैसी बड़े बजट वाली फिल्में 1,500 से 2,000 प्रिंटों के साथ रिलीज होती हैं।
थियेटरों से होने वाली आमदनी के अलावा अब कई और जरियों से निर्माता की जेब में पैसा आता है। कई बड़े कारोबारी घराने भी अब फिल्म निर्माण में कूद चुके हैं। हो भी क्यों न आखिर एक हिट फिल्म 300 फीसदी मुनाफा कमाकर जो देती है।
हरीश बिजूर कंसल्ट्स के ब्रांड स्पेशलिस्ट और सीईओ हरीश बिजूर कहते हैं, ‘पांच साल पहले ही अभिनेत्रियां जिन ब्रांडों का विज्ञापन करती थीं उनको बरकरार रखना खासा मुश्किल हो रहा था। अब इस तरह की धारणा तेजी से बदल रही है।’ फिलहाल तो अब इन अभिनेत्रियों में एक दूसरे के विज्ञापन और फिल्में हड़पने की होड़ चल रही है। देखते हैं इस कवायद में बाजी किसके हाथ लगती है।