Categories: लेख

रिटेल स्टोर पर भारी रियल एस्टेट का किराया

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 2:04 AM IST

देश में संगठित क्षेत्र के खुदरा कारोबारियों के लिए थोड़ी मुश्किल का दौर आ गया है। जितनी तेजी से रिटेल स्टोर खुल रहे हैं उतनी तेजी उनकी तरक्की में नहीं आ रही है।


वजह यह है कि बड़े कारोबारियों को  रियल एस्टेट के बड़े मॉल में खुलने वाले नए स्टोर के लिए काफी किराया देना पड़ता है और उसके मुकाबले उनकी कमाई उतनी ज्यादा नहीं हो पा रही है। बाजार में हालात कुछ ऐसे है कि एक तरफ ये बड़े खुदरा कारोबारी रियल एस्टेट के नए स्टोर पर अपना कब्जा जमाने की कोशिश में लगे हैं।

उनकी ये कोशिश है कि उनका बाजार में हिस्सा ज्यादा से ज्यादा हो। दूसरी ओर आपको जानकर यह हैरानी होगी की इन आधुनिक स्टोर में काफी लोग आते हैं लेकिन वे सभी खरीदार नहीं होते।

मिसाल के तौर पर एक लाइफ स्टाइल के खुदरा विक्रेता शॉपर्स स्टॉप को ही लें। यह लगभग 15 साल से कारोबार में है और ज्यादातर रेडीमेड कपड़ों का कारोबार करती है। इसके अलावा महंगे ब्रांडेड उत्पादों को भी बेचती है। परंपरागत रूप से अब तक इस तरह के व्यवसाय से खुदरा व्यापारियों का सकल मुनाफा 30 से 35 प्रतिशत मिलता रहा है। लेकिन इसका परिचालन मुनाफा कम से कम 12-14 प्रतिशत होना चाहिए।

हालांकि ऐसी स्थितियां नजर नहीं आती हैं। शॉपर्स स्टॉप को भी किराए की मार झेलनी पड़ रही है। इसकी वजह आप यह मान सकते हैं कि रियल एस्टेट में कीमतों का उछाल जारी है और उनके खर्चो में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। नतीजा यह है कि इस साल मार्च तक किरायों में काफी बढ़ोतरी हो गई है।

सामान्य हालत में इन रिटेल चेनों के लिए रियल एस्टेट की लागत, कुल लागत का केवल 7 से 8 फीसदी या फिर कुल बिक्री का 6 से 7 हिस्सा ही होना चाहिए। शापर्स के रियल एस्टेट लागत की बात करें तो हम पाएंगे की पिछले साल के वित्तीय वर्ष की तुलना में कुल लागत 9 प्रतिशत तक बढ़ गई है। अगर ब्रिकी प्रतिशत की बात करें तो पाएंगे कि उसके मुकाबले किराया 8.8 प्रतिशत के अधिकतम स्तर तक पहुंच गया है।

यह एक सबसे बड़ी वजह है कि पिछले साल मुनाफा 89 प्रतिशत तक नीचे आ गया था। रिटेल स्टोर चेन में खाद्य उत्पाद भी बेचे जाते हैं और उनमें कुछ जनरल स्टोर्स भी होते हैं। इनका मुनाफा बेहद कम होता है। ऐसे में रियल एस्टेट की लागत 3 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए क्योंकि यहां सकल मुनाफा बेहद कम है आमतौर पर यह 13 से 15 प्रतिशत के बीच में ही रहता है।

अगर ऐसा नहीं होगा तो कोई रिटेलर अपने दूसरे खर्चे के लिए भी भुगतान नहीं कर पाएगा और उन्हें 3 प्रतिशत तक का शुद्ध मुनाफा कमाने में भी काफी मुश्किलें आएंगी। सुभिक्षा रिटेल चेन का दावा है कि इसकी रियल एस्टेट की लागत 2-2.5 प्रतिशत है। यह सच भी हो सकता है इसकी वजह यह है कि इसके 1,300 स्टोर्स में से लगभग 100 स्टोर चेन्नई में हैं।

ये स्टोर्स एक दशक पुराने हैं इसी वजह से इनका किराया भी कम है मसलन हर एक महीने के लिए किराया है 10 रुपये प्रति वर्ग फुट। पूरे देश भर में मौजूदा औसत दर की बात करें तो वह भी 40 से 45 रुपये प्रति वर्ग फुट से ज्यादा नहीं होगा। इसकी खास वजह यह भी है कि सुभिक्षा के स्टोर्स मुख्य सड़क या जगहों पर स्थित नहीं हैं।

सुभिक्षा की नई रिटेल चेन औसतन 60 से 65 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर से किराया दे रही हैं। इसके साथ ही उन्हें 15 से 20 साल का अनुबंध भी करना होता है जिसमें किराए में इजाफा करने की बात भी होती है। अनुमान के तौर पर 40 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर से किराए में 4 प्रतिशत की लागत होती है। रिटेलर ये चाहते हैं कि उनका परिचालन मुनाफा 14 प्रतिशत हो।

प्रति वर्ग फुट से होने वाली कमाई एक महीने में 1163 रुपये या एक साल में 14000 रुपये प्रति वर्ग फुट होनी चाहिए। सुभिक्षा का दावा है कि उसकी बिक्री कम से कम 40 प्रतिशत से ज्यादा दर्ज हो रही है। लेकिन इसकी वजह सिर्फ ये है कि इसके ज्यादातर आउटलेट नए हैं जिनमें से कम से कम 600 आउटलेट पिछले साल खुले हैं। इस बात के पक्के सबूत हैं कि इन रिटेल चेनों की संख्या उतनी नहीं बढ़ रही है जितनी इसकी जरूरत है। अब बिक्री की रफ्तार अब थोड़ी धीमी हो रही है।

अब पैटालून को ही ले जो लाइफस्टाइल, खाद्य उत्पाद और जनरल स्टोर्स का कारोबार भी करती है। इसके उसी स्टोर में दुबारा खरीदारी की दर पिछले साल के 15 प्रतिशत बिक्री के मुकाबले वित्तीय वर्ष 2008 में महज 10 प्रतिशत है। शापर्स के  भी उसी स्टोर में दुबारा बिक्री की दर को देखें तो 2008 के वित्तीय वर्ष में लगभग 14 प्रतिशत बढ़ी है। टाइटन की ज्वेलरी का स्टोर पिछले दो साल में बढ़ रहा है।

वास्तविकता यह है कि चाहे वह जनरल स्टोर्स हो या कपड़े, उपभोक्ताओं के पास कई विकल्प मौजूद हैं। इसी वजह से रिटेलरों में काफी होड़ मची हुई है। आजकल उपभोक्ता संगठित क्षेत्र के रिटेल आउटलेट में ज्यादा पैसे खर्च कर रहे हैं। लेकिन ऐसे रिटेल चेन के स्टोर्स की बढ़ती संख्या की वजह से लोगों के  द्वारा खर्च की गई रकम बंट कर काफी कम हो जाती है। यही वजह है कि प्रति वर्ग फुट से होने वाली आय बढ़ने के बजाय या तो स्थिर है या फिर कम हो रही है।

चेन्नई में संगठित क्षेत्र के सबसे ज्यादा रिटेल स्टोर्स हैं वहां किरानाफर्स्ट ने एक शोध कराया है। इस शोध के  जरिए यह पता चला है कि प्रति वर्ग फीट से होने वाली आय 2004 में 1100 रुपये तक थी जो अब कम होकर 700 रुपये तक पहुंच गई है। पैंटालून की प्रति वर्ग फीट आय सितंबर 2006 में 2080 रुपये थी जो दिसंबर 2007 में 1859 रुपये तक हो गई।

रिटेल चेन की कोशिश यह है कि अपने स्टोर्स में छुट देकर ग्राहकों को लुभाया जाए ताकि वे साधारण किराने की दुकान से दूर हो जाए इसकी वजह से वे कम मुनाफा वसूल करते हैं। हाल ही में मई 2008 में इक्रीयर की एक रिपोर्ट के मुताबिक संगठित क्षेत्र के खुदरा कारोबार का असर असंगठित क्षेत्र पर कुछ ऐसे पड़ रहा है कि कम आय वाले उपभोक्ता दूसरे लोगों से ज्यादा पैसे बचा लेते है क्योंकि वे हमेशा छुट वाली चीजों को लेना पसंद करते हैं।

अगर ऐसे शॉपर्स स्टोर ऐसी रियायत करें तो ठीक है वरना रिटेलरों के लिए यह कोई अच्छी खबर नहीं होगी। हालांकि उनकी उम्मीदें तो यही है कि ज्यादा से ज्यादा लोग उनके रिटेल स्टोर्स में आए और खरीदारी करें।

First Published : May 28, 2008 | 11:49 PM IST