किसी सरकार के शुरुआती सालों में यह उम्मीद की जाती है कि वह सुधार की गाड़ी को आगे बढ़ाएगी।
पर अब संप्रग सरकार ने अपना यह ‘हनीमून’ का समय बिता दिया है, जिसमें उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वह अधिक से अधिक सुधार कार्यक्रमों पर काम करेगी। सवाल यह है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इतने समय में जो राजनीतिक पैठ बना ली है या यूं कहें कि राजनीति के क्षेत्र में जो नाम कमाया है उसे आखिर कहां और किस तरीके से खर्च किया जाए।
अब जब मौजूदा सरकार के पास पांच वर्षों के इस कार्यकाल में महज नौ महीने ही बचे हैं तो उनसे किस तरीके के आर्थिक सुधारों की उम्मीद की जा सकती है। मनमोहन सिंह से अब इतना समय बीत जाने के बाद तो यही उम्मीद है कि वह मध्यम दर्जे के सुधारों की जगह महत्वाकांक्षी और तेज गति वाले सुधारों की ओर रुख करेंगे। पिछले तीन सालों के दौरान जो आर्थिक कदम उठाए गए हैं उनसे तो कम से कम यह नहीं कहा जा सकता कि वे बहुत उत्साह और जोश दिखाते हुए उठाए गए हैं।
कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि अपने मौजूदा कार्यकाल में प्रधानमंत्री ने पहली बार कोई आक्रामक कदम उठाया है या फिर यूं कहें कि खुलकर अपनी शक्ति का इस्तेमाल किया है। यहां बात अमेरिका के साथ परमाणु करार की ही की जा रही है, पर यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि अगला चुनाव कम से कम 123 समझौते की बुनियाद पर तो नहीं ही लड़ा जा सकता है। कहना गलत नहीं होगा कि इस दफा प्रधानमंत्री ने अपनी विचारधाराओं और पुराने विचारों से अलग हटते हुए कदम उठाया और मुमकिन है कि अपने बचे हुए कार्यकाल में भी वह ऐसा रुख जारी रखें।
और अगर वे इसी तरह का कदम उठाना जारी रखते हैं तो कोई और फायदा हो ना हो अगले चुनाव में संप्रग सरकार पर यह आरोप तो नहीं लगाया जाएगा कि सरकार ने अब महत्वाकांक्षी सुधार कार्यक्रमों के मोर्चे पर अकर्मठता ही दिखाई है (जैसा कि अब तक कहा जाता रहा है)। मौजूदा सरकार की अगली रणनीति अब यह हो सकती है कि वह ऐसे सुधार कार्यक्रमों पर ध्यान देना शुरू करे जो चुनावी दृष्टिकोण से उसके लिए फायदेमंद साबित हो। आर्थिक मोर्चे पर सरकार से जो सबसे बड़ी अपेक्षा है वह है बेलगाम मंहगाई पर काबू पाना।
चूंकि महंगाई बढ़ने के सारे कारण घरेलू नहीं हैं और इस पर काफी हद तक विदेशी कारकों का भी हाथ है ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाएगी और किस हद तक सफल हो पाएगी। पर सरकार अगर मुद्रास्फीति के ग्राफ को नीचे कर पाने में सफल हो जाती है (चुनाव के पहले) तो निश्चित तौर पर यह उसके लिए एक बड़ी राहत होगी। एक दूसरी रणनीति यह हो सकती है कि सरकार पाइपलाइन में पड़ी योजनाओं को जिसे पूरा कराने में वित्त मंत्रालय भी जुटा है, पर विधायिका की मुहर लगवा दी जाए। इनमें से ज्यादातर सुधार वित्तीय क्षेत्र को फायदा पहुंचाएंगे।
बीमा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा तय करना, पेंशन के ढांचे को नए सिरे से तैयार करना और बैंकिंग क्षेत्र में सार्वजनिक भागीदारी को कम करना, ऐसी कुछ योजनाएं हैं जिन्हें पूरा करने के लिए पिछले कुछेक सालों से प्रयास जारी है। पर सरकार जिस मोर्चे पर जीत हासिल करने के लिए सबसे अधिक उत्सुक है (महंगाई पर काबू पाना) वह इतना आसान नहीं और जिस मोर्चे पर जीतना आसान है (वित्तीय क्षेत्र में सुधार) वह मौजूदा हालात को देखते हुए सरकार के लिए उतनी महत्वाकांक्षी योजना नहीं लगती।
हालांकि सरकार के पास एक और विकल्प हो सकता है जो महत्वाकांक्षी भी हो। आर्थिक और राजनीतिक विकेंद्रीकरण और साथ में गठबंधन राजनीति के बढ़ते दबदबे के बीच केंद्र सरकार के लिए आर्थिक प्रभाव क्षेत्र एक तरह से सिमटता चला जा रहा है। पर एक क्षेत्र ऐसा भी है जहां अब भी सरकार का नियंत्रण और दबदबा है (भले ही यह नियंत्रण कुछ कमजोर पड़ा हो) और वह है उच्च शिक्षा का क्षेत्र। सरकार के इस लाइसेंस-कोटा-परमिट राज वाले किले में भी सुधार की मांग के लिए गूंज सुनाई पड़ रही है। उच्च शिक्षा के हर क्षेत्र में भी राजनीतिक, प्रशासनिक और निगरानीकर्ताओं की दखल बढ़ती ही जा रही है।
चाहे वह दाखिले की प्रक्रिया हो, संगठन का आंतरिक मामला, फीस का मसला, तनख्वाह का मुद्दा या फंड की जरूरत, हर जगह हस्तक्षेप बढ़ता ही जा रहा है। अगर उच्च शिक्षा का जिक्र किया जा रहा हो तो उदारीकरण और वैश्वीकरण को इससे दूर नहीं रखा जा सकता। हम मानते हैं कि उच्च शिक्षा में स्टेट प्रोविजन और स्टेट फंडिंग की भूमिका जारी रहेगी पर इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है और उम्मीद है कि आगे भी रहेगी। इस दुनिया में निजी क्षेत्र को जो स्वतंत्रता दी जा रही है उसे कम करना न तो सही होगा और न ही किया जा सकता है।
उच्च शिक्षा में सुधार लाना इतना आसान भी नहीं होगा। पहली समस्या यह है कि शिक्षण संस्थानों में शिक्षा और शोध कार्यों से जुड़े अच्छे लोगों को देश में रोक पाना बहुत मुश्किल है। ऐसा इसलिए कि वे बड़ी आसानी से दूसरे देशों में अपनी सेवाएं दे सकते हैं तो ऐसे में हमारे देश में हालात ऐसे तो होने ही चाहिए कि हम शिक्षाविदों को खुद से बांधें रख पाएं। जब देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में ख्यातिप्राप्त आईआईटी में भी शिक्षाकर्मियों की 30 से 40 फीसदी सीटें खाली पड़ी हैं तो बाकी संस्थानों का हाल क्या होगा यह समझना शायद बहुत मुश्किल नहीं होगा।
दूसरी समस्या यह है कि अभी तक इस बारे में साफ विचारधारा नहीं बन पाई है कि आखिर गुणवत्ता युक्त उच्च शिक्षा है क्या। पर एक ऐसे शिक्षा व्यवस्था को तैयार करने के लिए सबसे पहले जरूरी होगा कि यूजीसी और एआईसीटीई जैसी नियामक इकाइयों के बंधन से मुक्त कराना, जिसने उच्च शिक्षा व्यवस्था में निजी क्षेत्र के दखल को रोक कर रखा है। मनमोहन सरकार के पास अब जितना समय बचा है उसमें यह उम्मीद की जा सकती है कि वह अपनी सारी शक्तियां इस क्षेत्र को निजी स्वार्थ के बंधनों से मुक्त कराने में लगा दें और इस क्षेत्र में घरेलू के साथ साथ निजी क्षेत्र और विदेशी खिलाड़ियों की हिस्सेदारी को भी सुनिश्चित कर सकें।
यह जरूर है कि इस बारे में सख्त निगरानी रखनी पड़ेगी कि उच्च शिक्षण क्षेत्र में उन्हीं खिलाड़ियों को प्रवेश की अनुमति दी जाए जो गुणवत्ता युक्त सेवाएं उपलब्ध करा सकें और भेड़चाल को यहां से दूर रखा जाना चाहिए। उच्च शिक्षा व्यवस्था में जो सुधार की आवश्यकता बताई जा रही है उससे एक फायदा यह भी होगा कि देश में कुशल पेशेवरों की जो किल्लत देखने को मिल रही है, उससे भी कुछ हद तक छुटकारा मिल सकेगा।
अब आखिर में जरा एक बार फिर से जिक्र करते हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस नए अवतार की जो पहले एक कमजोर नेता की थी और अब बदलकर एक तेज तर्रार नेता की हो गई है। परमाणु करार के इस हालिया घटनाक्रम ने उनके ओहदे को सोनिया गांधी के मुकाबले में थोड़ा बेहतर तो बना ही दिया है। जहां एक ओर कम्युनिस्ट की बोलती बंद हो गई है वहीं भाजपा भी बैकफुट पर आ गई है।