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संस्कृति का अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 1:57 PM IST

हिंदू त्योहारों के इस मौसम में मैंने सोचा कि यह देखना दिलचस्प होगा कि देश की अर्थव्यवस्था पर संस्कृति का क्या प्रभाव पड़ता है। मेरे लिए यह अच्छी बात रही कि मुझे इस विषय पर हाल ही में एक बेहतर शोध पत्र पढ़ने का मौका मिला। मैं यह देखना चाहता था कि क्या विभिन्न संस्कृतियों की वजह से अलग आर्थिक नतीजे देखने को मिलते हैं।
सारा लोव्स द्वारा लिखे गए एक शोध पत्र में बिल्कुल यही प्रश्न पूछा गया है। इस शोध पत्र का शीर्षक ‘ऐतिहासिक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में संस्कृति’ है। लोव्स ने ‘सामाजिक रूप से प्रसारित, व्यक्तियों के मूल्य और भरोसे को ही संस्कृति के रूप में परिभाषित किया है। उनका कहना है कि ‘विभिन्न प्रकार के आर्थिक परिणामों के लिए ये महत्त्वपूर्ण हैं।
अध्ययन के इस व्यापक क्षेत्र को ऐतिहासिक राजनीतिक अर्थव्यवस्था या एचपीई कहा जाता है। यह संस्कृति की उत्पत्ति, विकास और उसके प्रसार का जायजा लेता है। जाहिर है, ‘ऐतिहासिक रूप से निर्धारित सांस्कृतिक मूल्यों और प्रथाओं को विभिन्न प्रकार के प्रमुख आर्थिक नतीजों को प्रभावित करने के तौर पर पेश किया गया है।’

अगर आप इस विषय में रुचि रखते हैं तब यह शोध पत्र अब तक इस विषय पर किए गए सभी शोधों का एक बेहतर सारांश आपके सामने पेश करता है। यह भी संभव है कि आप आखिर में बहुत आश्वस्त महसूस न करें, लेकिन कम से कम आप कुछ नई चीजें जरूर सीख लेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि किसी भी संस्कृति का आर्थिक परिणामों पर प्रभाव पड़ता है। लेकिन इसकी सीमा और स्वरूप में इतनी विविधता है कि इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ भी कहना शायद असंभव है।
यही कारण है कि मुझे लगता है कि शोध पत्र यह कहने का जोखिम उठाए बिना कई व्याख्यात्मक बदलाव वाले कारकों की पेशकश करता है कि उनमें से कौन अधिक महत्त्वपूर्ण है। लोव्स कहती हैं कि इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण प्राथमिकताएं दो तरह की हैं जिनमें से एक आर्थिक और सामाजिक है। जहां तक आर्थिक प्राथमिकताओं का संबंध है, इसमें ‘संतुष्टि और खुशी मिलने में देरी के महत्त्वपूर्ण आर्थिक निहितार्थ हो सकते हैं।’
इसका मतलब यह है कि ‘प्रति व्यक्ति आमदनी के साथ ही धैर्य का मानव एवं भौतिक पूंजी के संचय के साथ सहसंबद्ध है।’ इसमें कोई दोराय नहीं कि भारत इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। हम व्यापक स्तर पर सबकी समृद्धि के लिए 75 वर्षों से इंतजार कर रहे हैं। सामाजिक वरीयताओं के बारे में इस शोध पत्र में कहा गया है, ‘व्यक्तिवादी संस्कृति, व्यक्तिगत उपलब्धियों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर देती हैं। इसके विपरीत, सामूहिकतावादी समाज, समानता को प्रोत्साहित करते हैं, जिससे सामूहिक रूप से कोई कदम उठाना या कार्रवाई करना आसान हो जाता है।’
ऐसे में सवाल यह है कि भारत व्यक्तिवादी या सामूहिकता में कहां सटीक बैठता है? फिर भरोसे की भी बात है। लेखक कहते हैं, ‘नैतिक सार्वभौमिकता यानी आंतरिक एवं बाहरी समूहों के लोगों पर भी समान रूप से भरोसा करने की प्रवृत्ति विभिन्न नीतिगत प्राथमिकताओं से जुड़ी है।’ भारतीय कारोबारी समुदाय के बारे में सोचने पर आपको इसकी तस्वीर दिख सकती है। भरोसे वाले संबंधों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा परिवार और रिश्तेदारी है।
इस शोधपत्र में कहा गया है, ‘एक महत्त्वपूर्ण आयाम जिस पर रिश्तेदारी की संरचनाएं भिन्न हो सकती हैं, उसका आधार या तो सामूहिक सदस्यता या विरासत हो सकती है जिसके मूल तक भी मातृवंश वाली प्रणालियों में महिलाओं के माध्यम से पहुंचा जाता है और पुरुषों के माध्यम से पितृवंश प्रणालियों की पहचान होती है।’
मातृवंश को बेहतर के रूप में देखा जाता है, जो मेरे इस विचार के अनुरूप है कि महिलाएं हर उस चीज में बेहतर करती हैं जिसके लिए सहयोग की आवश्यकता होती है। हालांकि, ‘मातृवंश से जुड़े लोग अपने जीवनसाथी के साथ प्रयोग में कम सहयोग करते हैं।’ मेरे ख्याल से इसका मतलब यह है कि पति और पत्नियां ज्यादातर साथ नहीं मिलते हैं।
अंत में, सबसे महत्त्वपूर्ण कारक धार्मिकता भी है। सामूहिक पहचान बनाने के लिए ‘सहयोग के दायरे के महत्त्वपूर्ण निहितार्थ’ हैं। ऐसा लगता है कि ‘प्रोटेस्टेंटवाद ने आर्थिक समृद्धि को बढ़ाया क्योंकि इसने मानव पूंजी के संचय को प्रोत्साहित किया और ‘लड़कियों में बाइबल पढ़ने की क्षमता’ थी। कुछ अन्य प्रश्न भी हैं जिन पर इस शोध पत्र में बात नहीं की गई है। उदाहरण के लिए, संस्कृति का किसी देश में बचत, निवेश व्यवहार और कर नीतियों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
भारतीय लोग आमतौर पर बचत करते हैं और इसीलिए वे निवेश भी करते हैं। जब सरकार उन पर बहुत अधिक कर नहीं लगाती है तब वे और भी ज्यादा निवेश करते हैं। अगर ऐसा होता है तब वे सामान्य रूप से अपनी आमदनी और संपत्ति को कम करके आंकते हैं।
क्या कोई सांस्कृतिक मूल्य, वस्तुएं या आर्थिक नीतियां समाज की संस्कृति को प्रभावित करती हैं? मेरा मतलब है, आर्थिक परिणामों पर संस्कृति के प्रभाव का अध्ययन करना अच्छा है, लेकिन इसके विपरीत संस्कृति पर आर्थिक नीतियों के प्रभाव के बारे में क्या कहा जा सकता है? जैसा कि शोध पत्र में भी आखिर में कहा गया है कि इस विषय पर बहुत अधिक शोध की आवश्यकता है।

First Published : October 9, 2022 | 10:26 PM IST