मुल्क को आजाद हुए आज 61 साल हो चुके हैं। आजादी के वक्त हमें सांप और सपेरों के देश के रूप में जाना जाता था, लेकिन आज हमें कंप्यूटर और बीपीओ के मुल्क के नाम से पहचाना जाता है।
आज हम दुनिया में सबसे तेजी से तरक्की करते हुए मुल्कों में से एक हैं। इस बदलाव के जिम्मेदार हैं हमारे युवा। आर्थिक विलेश्षकों की मानें तो आजादी के वक्त और आज के वक्त में काफी बदलाव आ चुका है। क्रिसिल के प्रिंसिपल इकनॉमिस्ट धर्मकीर्ति जोशी का कहना है कि, ‘सबसे बड़ा बदलाव तो आर्थिक उदारीकरण के बाद आया है।
आज की तारीख में शहरी युवाओं के लिए बीपीओ और कॉलसेंटरों की नौकरियां मौजूद हैं। बीपीओ इंडस्ट्री आज की तारीख में कम से कम 5.5 लाख लोगों को रोजगार मुहैया करवा रही है।’ नैसकॉम की एक रिपोर्ट की मानें तो आज बीपीओ इंडस्ट्री में दूसरे किसी भी सेक्टर के मुकाबले चार गुनी ज्यादा नौकरियां पैदा हो रही हैं। रिपोर्ट का यह भी कहना है कि यह नए-नए उपनगरीय इलाकों को विकसित कर रहा है।
आज की तारीख में भारत की बीपीओ इंडस्ट्री की असल वैल्यू 25 से लेकर 50 अरब डॉलर के बीच है। साथ ही, यह 30 से 40 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है। जोशी के मुताबिक इसकी वजह से आज एक पूरे का पूरा नया इनकम क्लास पैदा हो चुका है। उनका कहना है कि, ‘बीपीओ की वजह से इससे जुड़े कामों के लिए भी लोगों की तादाद बढ़ रही है।
सिक्योरिटी गार्डों से लेकर ड्राइवरों और खानसामों तक की मांग इसके वजह से बढ़ी है।’ जोशी बताते हैं कि, ‘ अब आईटी और इससे जुड़ी सेवाओं को ही ले लीजिए। यह आज की तारीख में मुल्क में काफी तेजी से तरक्की कर रहा है। यह सेक्टर आज की तारीख में 20 लाख लोगों को रोजगार मुहैया करा रहा है। यह मुल्क के जीडीपी में मोटा योगदान करता है।’ वहीं, बैंकिंग सेक्टर भी आज तेजी से तरक्की कर रहा है।
प्राइसवाटरहाउस कूपर्स के एसोसिएट डाइरेक्टर रॉबिन रॉय का कहना है, ‘बैंकिंग सेक्टर मुल्क में आज तेजी से तरक्की कर रहा है। ऐसे में इस तरफ से भी लोगों की मांग भी तेजी से आ रही है। अभी कुछ ही दिनों पहले आईसीआईसीआई बैंक ने घोषणा की थी कि उनके बैंक इस साल कम से कम 10-15 हजार नए लोगों की जरूरत पड़ेगी।’ साथ ही, अब तो रिटेल सेक्टर भी रोजगार के बड़े अवसर मुहैया करवा रहा है।
मुल्क के इस बदलते रूप की वजह से बड़े उलट-फेर हुए हैं। जोशी बताते हैं, ‘इसने एक नए इनकम क्लास को पैदा कर दिया है। एक ऐसा क्लास, जो खूब कमाता है और खूब खर्च करता है। इसीलिए तो अब कंज्यूमर डयूरेबल प्रोडक्ट्स की बिक्री में इतना तेज इजाफा हुआ है। मॉल्स और महंगे रेस्तरां उनकी पसंदीदा जगहें बन चुके हैं। मोबाइल फोन, लैपटॉप और आईपॉड जैसे उत्पादों की खरीदारी खूब कर रहे हैं। हालांकि, अब भी यह विकास मुल्क के कुछ खास हिस्सों तक ही सिमटा हुआ है, लेकिन धीरे-धीरे इसे आगे फैलना ही है।’
द यूथ ऑफ इंडिया इज बेगर, नॉट चूजर। किस आर्थिक आजादी की बात करते हैं? अभी भी देश का युवक भ्रमित है। हाथों को काम नहीं है। कोई प्राइवेट नौकरी करता है तो साल में चार महीने बेरोजगार रहना आम बात है।
सुविधाएं देश के कुल चार-पांच शहरों और कुछ संस्थानों के छात्रों तक सिमटी है। क्या कुछ संस्थानों से हर साल निकलने वाले करीब 10,000 छात्रों के अलावा देश के बाकी युवक निकम्मे और मूर्ख हैं, जो नौकरियों के लिए भटकते हैं?’ यह आक्रोश उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के 32 साल के युवक राजेश का है, जिसे इस उम्र में भी बायोडाटा लेकर नौकरियों के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं।
उदारीकरण के बाद यह हौव्वा खड़ा किया जा रहा है कि संचार क्षेत्र में क्रांति आ गई, बीपीओ सेक्टर में अपार संभावनाएं हैं, रिटेल क्षेत्र पांव पसार रहे हैं, आधारभूत ढांचे का विकास तेजी से हुआ है आदि-आदि। लेकिन यह तो चुनिंदा शहरों और चुनिंदा लोगों तक सीमित है। जाने माने कम्युनिस्ट नेता अबनी रॉय ने कहा, ‘संचार क्रांति तो जैसे ग्रामीणों के लिए मुसीबत का सबब है।
रोजगार नहीं है और युवक फैशन में मोबाइल लेकर घूमते हैं, जिसका अतिरिक्त बोझ पड़ता है। बेरोजगार युवक अपना खर्च चलाने के लिए गलत रास्ता चुनते हैं। गांवों में पीने को शुध्द पानी नहीं है, स्तरीय विद्यालय नही हैं, न अस्पताल है और न ही सड़कें।’ देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को देखकर तो यही लगता है कि दैवीय शक्ति ही इसका उध्दार कर सकती है।
करीब साढ़े छह लाख गांवों में देश की 72 प्रतिशत आबादी रहती है, जो सकल घरेलू उत्पाद के महज एक चौथाई हिस्से पर गुजर-बसर करती है। योजना आयोग का कहना है कि 2004-05 में 27.5 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे थे। इस आंकडे में क्रमिक सुधार आया है। 1977-78 में 51.3 प्रतिशत जबकि 1993-94 में 36 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे थे।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले 75 प्रतिशत यानी, 28 करोड़ लोगों में से करीब 20 करोड़ लोग गांवों में रहते हैं। जून के अंतिम सप्ताह में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट आई जिसमें कहा गया कि गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों को पिछले एकसाल में जरूरी एवं बुनियादी सुविधाएं पाने के लिए करीब 900 करोड़ रुपये रिश्वत देनी पड़ी।
पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव कहते हैं, ‘आज हम आर्थिक विकास को दहाई अंकों में ले जाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन यह खुशहाली का मानक नहीं है। योजना आयोग बाजारवादियों का बंधक बना हुआ है। बाजारवादी गलत आंकड़े देते हैं और देश की गलत तस्वीर पेश करते हैं।’
लखनऊ में सिविल सेवा की तैयारी कर रहे छात्र देवेन्द्र कुमार भट्ट कहते हैं, ‘सरकार ने युवकों के आक्रोश से बचने के लिए सरकारी नौकरियों में आयुसीमा बढ़ा दी है। नौकरियां हैं नहीं और लाखों की संख्या में बेरोजगार और प्रतिभाशाली युवक नौकरी की तैयारी करते हैं। 35 साल की उम्र में जब वे बेरोजगार होते हैं, तो न तो वे सरकार के खिलाफ आवाज उठाने लायक रह जाते हैं, न ही कायदे से अपना खर्च चला पाते हैं।’
मेरी नजर में आर्थिक आजादी का मतलब देश के हर नागरिक-चाहे वह गरीब हो या अमीर सभी को रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाओं की पूर्ति से है। भले ही देश की आर्थिक विकास दर व औद्योगिक विकास दर में बढ़ोतरी हो रही है लेकिन वह तब तक बेमानी ही रहेगी जब तक कि देश का हर नागरीक खासकर गरीब जनता को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखा जाता है।
देश की गरीब जनता को बुनियादी सुविधाओं सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। गरीबों के कल्याण से ही देश का कल्याण संभव है। इसके बाद ही हमलोग पूरी तरह देश को आर्थिक रूप से आजाद कह सकते हैं। देश की जनता को जब तक उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखा जाएगा तब तक आजादी का कोई मतलब नहीं है। भेदभाव मिटाकर और एक धागे में खुद को पिरो कर चले आजादी की राह पर।
भैंरोसिंह शेखावत, पूर्व उप राष्ट्रपति
इसमें कोई शक नहीं कि आजादी से लेकर अब तक बहुत बदलाव आ चुका है। आज के समय में जनता पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा आजाद है। उन्हें बोलने-लिखने, अपनी विचारों को रखने और अपनी पसंद के नेताओं को चुनने की पूरी आजादी है। अगर क्रिकेट की बात करें तो 1983 के वर्ल्ड कप से लेकर आज के 20-20 मैच तक क्रिकेट के खेलने, देखने और उसके प्रस्तुतीकरण में ढेरों बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
क्रिकेट की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही है। अब तो रोजाना मैच खेले जा रहे हैं। ऐसे में क्रिकेट खिलाड़ियों में भी एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है। क्रिकेट के प्रति युवाओं का झुकाव काफी बढ़ गया है। यही वजह है कि आज के दौर में खिलाड़ी आर्थिक रूप से ज्यादा आजाद व स्वतंत्र महसूस कर रहे हैं।
मदन लाल, पूर्व भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी
अगर आजादी के बाद फिल्म उद्योग की बात करें तो पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड में बहुत तेजी से बदलाव आए हैं। कॉर्पोरेट घरानों के बॉलीवुड में कदम रखने से फिल्म उद्योग में प्रोफेशनलिज्म बढ़ा है। लोगों के काम करने के रवैये में बदलाव आया है। विदेशों में भारतीय फिल्मों के दर्शकों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। मुनाफे और पहचान के लिहाज से यह बहुत ही अच्छा है।
कुल मिलाकर इंडस्ट्री में अच्छा पैसा आ रहा है। अब इंडस्ट्री से जुड़े हर आदमी को अच्छा मेहनताना मिल रहा है। भारतीय सिनेमा को अब विदेशों में भी पहचान मिलने लगी है। अब फिल्म की सफलता पहले तीन दिन में ही तय होने लगी है। कुल मिलाकर रुझान ठीक ही हैं लेकिन फिल्म उद्योग को भी अभी और लंबा रास्ता तय करने के लिए कई सुधार करने की जरूरत है।
समीर, गीतकार
आज आर्थिक आजादी के मायने बदल चुके हैं। देश की विभिन्न पार्टियों की घोषणा-पत्रों से गरीबी उन्मूलन का एजेंडा ही गायब हो चुका है और जब तक देश का हर गरीब आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होता है तब तक आम आवाम के बीच आर्थिक आजादी एक कोरी कल्पना ही रहेगी। आज देश के सामाजिक सुधार का जिम्मा भी मुनाफखोर निजी कंपनियों के हाथों सौंप दिया गया है, जिससे सुधार की आशा करनी भी बेमानी है।
मैं कभी सोची भी नहीं थी कि भारत का विभाजन होगा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सिध्दांतों और आदर्शों को पूरी दुनिया के सामने लाने के लिए एक फिल्म तैयार की गई थी लेकिन सरकार ने उस पर परदा डाल दिया। आज की क्षुद्र राजनीति की वजह से ही नई पीढ़ी नेताजी के प्रेरणादायक विचारों व कृतियों को याद कर रहे हैं। हमारे देश के युवा बहुत क्षमतावान है और वे भारत का भाग्य बदल सकते हैं।
कैप्टन लक्ष्मी सहगल, स्वतंत्रता सेनानी