गत 17 जुलाई को बैंक ऑफ इंटरनैशनल सेटलमेंट्स के आर्थिक सलाहकार और शोध प्रमुख युन सॉन्ग शिन ने ‘इन्फ्लेशन ऐंड द पाथ ऑफ सॉफ्ट लैंडिंग’ नाम वाली रिपोर्ट में कहा कि दरों में सीधे और अधिकतम इजाफा करने से अर्थव्यवस्था सहज और सॉफ्ट लैंडिंग ( अर्थव्यवस्था में वृद्धि के बाद सहज धीमापन) हासिल कर सकेगी।
दिल्ली में एक हालिया भाषण में रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा था कि केंद्रीय बैंक की कोशिश भी सॉफ्ट लैंडिंग की है।
मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तीन दिवसीय बैठक शुक्रवार को समाप्त हो रही है। माना जा रहा है कि दरों में इजाफा किया जाएगा लेकिन सवाल यह है कि कितना? सरकार सीधे तेज इजाफा करेगी या मामूली इजाफा करते हुए हालात के और स्पष्ट होने की प्रतीक्षा की जाएगी।
आरबीआई ने अपनी नीतिगत दरों को जून में आधा फीसदी बढ़ाकर 4.9 प्रतिशत कर दिया था। इससे पहले मई में 40 आधार अंकों की बढ़ोतरी की गई थी। क्या इस बार भी वह 50 आधार अंकों का इजाफा करेगा? या 35 आधार अंकों के इजाफे के साथ दरों को 5.25 फीसदी कर देगा जो महामारी के पहले के 5.15 फीसदी से कुछ अधिक होगा।
इन प्रश्नों के उत्तर देने के पहले आइए देखते हैं कि जून की नीति के बाद से भारत और विदेशों में क्या बदलाव आया है?
10 वर्ष के बॉन्ड का प्रतिफल 7.518 प्रतिशत से घटकर 7.32 प्रतिशत रह गया है लेकिन 364 दिन के ट्रेजरी बिल का प्रतिफल 6.12 प्रतिशत से बढ़कर 6.33 प्रतिशत हो गया है। जून में व्यवस्था में 3.16 लाख करोड़ रुपये की नकदी थी जो अब घटकर करीब 76,000 करोड़ रुपये रह गई है। इसकी कई वजह हैं। मसलन आरबीआई द्वारा डॉलर की बिक्री, प्रचलित मुद्रा में इजाफा और शायद सरकारी व्यय में कमी भी।
नकदी की कमी के साथ अंतरबैंक बाजार में ओवरनाइट कॉल मनी दर (जिस दर पर बैंक एक दूसरे को ऋण देते हैं) रीपो दर से अधिक हो चुकी है। रीपो दर वह दर है जिस पर बैंक आरबीआई से ऋण लेते हैं।
अन्य चीजों के अलावा खुदरा मुद्रास्फीति जो मई में 7.04 प्रतिशत थी वह जून में 7.01 प्रतिशत रह गई। इस अवधि में ब्रेंट क्रूड की कीमत 120.57 डॉलर प्रति बैरल से कम होकर 109.58 डॉलर प्रति बैरल रह गई। इसके अलावा रुपया जो 77.71 प्रति डॉलर पर था वह 79.27 प्रति डॉलर रह गया।
इस बीच भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी 571.56 अरब डॉलर के साथ 20 माह के न्यूनतम स्तर पर आ गया जबकि इसका उच्चतम स्तर 642 अरब डॉलर था। गत नीति के समय भी यह 596.5 अरब डॉलर था। आरबीआई की डॉलर बिक्री के अलावा डॉलर के मुकाबले अन्य मुद्राओं के अवमूल्यन ने भी विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आने में योगदान किया।
रूस के केंद्रीय बैंक ने दरों को 9.5 फीसदी से घटाकर 8 फीसदी किया है। उसे छोड़ दें तो अधिकांश केंद्रीय बैंकों ने एमपीसी की बैठक के बाद दरें बढ़ाई हैं।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने दो चरणों में 150 आधार अंकों का इजाफा करके 9.06 फीसदी तक पहुंच चुकी मुद्रास्फीति का मुकाबला करने की ठानी। यूरोपीय केंद्रीय बैंक ने भी 11वर्ष में पहली बार दरों में 50 आधार अंक का इजाफा किया ताकि 8.6 फीसदी तक पहुंच चुकी मुद्रास्फीति का मुकाबला किया जा सके।
बैंक ऑफ कनाडा ने ओवरनाइट दर में एक फीसदी इजाफा किया। यह सन 1998 के बाद का सबसे बड़ा इजाफा है। 2.5 फीसदी की मौजूदा दर 2008 के बाद की अधिकतम दर है। वहीं बैंक ऑफ इंगलैंड ने दरों में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की है जो लगातार पांचवां इजाफा है। वहां मुद्रास्फीति 9.4 फीसदी है। स्विस नैशनल बैंक ने भी 15 वर्ष में पहली बार नीतिगत दरें 50 आधार अंक बढ़ाईं।
अन्य केंद्रीय बैंकों में हंगरियन नैशनल बैंक ने दरों में 380 आधार अंक का इजाफा किया जबकि चेक नैशनल बैंक तथा नैशनल बैंक ऑफ पोलैंड ने 125 आधार अंक की बढ़ोतरी की। इन तीनों देशों में मुद्रास्फीति दो अंकों में है। यह सूची अभी अधूरी है। इस परिदृश्य में आरबीआई से क्या उम्मीद की जाए?
आदर्श स्थिति में उसे 50 आधार अंक की बढ़ोतरी करनी चाहिए ताकि रीपो दर 5.4 फीसदी हो जाए। इसकी दो वजह हैं: उच्च मुद्रास्फीति और अवमूल्यित रुपया।
मॉनसून के सामान्य और कच्चे तेल के औसतन 105 डॉलर प्रति बैरल रहने के अनुमान के साथ आरबीआई ने वित्त वर्ष 2023 की पहली तिमाही में मुद्रास्फीति के 7.5 फीसदी रहने का अनुमान जताया है।
दूसरी तिमाही में इसके 7.4 फीसदी, तीसरी में 6.2 फीसदी और चौथी तिमाही में 5.8 फीसदी रहने की बात कही गयी है। गत फरवरी में बैंक ने वित्त वर्ष 2023 के लिए 4.5 फीसदी मुद्रास्फीति का अनुमान जताया था। रूस-यूक्रेन युद्ध तथा तेल कीमतों पर इसके असर तथा अन्य बातों ने भी यह अनुमान बदलने पर विवश किया है।
एमपीसी 4 फीसदी (दो फीसदी ऊपर या नीचे) का लक्ष्य लेकर चल रही है। अप्रैल में खुदरा महंगाई 7.79 फीसदी के साथ आठ वर्ष के उच्चतम स्तर पर थी। जनवरी 2022 से ही खुदरा महंगाई तय स्तर से ऊपर बनी हुई है। आरबीआई के मुताबिक दिसंबर तक यह सिलसिला चलेगा।
जिंस और खाद्य कीमतों में नरमी के साथ मुद्रास्फीति शायद कम हो जाए लेकिन मूल मुद्रास्फीति चिंता का विषय है क्योंकि यह काफी ऊंची है। अगर यह लंबे समय तक छह फीसदी से ऊंची बनी रही तो केवल खाद्य और ईंधन कीमतों में नाटकीय कमी ही इसे नीचे ला सकती है।
रुपये की कीमत में हालिया गिरावट ने आरबीआई की चुनौती बढ़ा दी है। फेडरल रिजर्व अन्य केंद्रीय बैंकों की तुलना में तेजी से दरें बढ़ाता रहा है। रुपये को बचाने की एक ही सूरत है कि अमेरिकी और भारतीय नीतिगत दरों का अंतर बढ़ने न दिया जाए।
50 आधार अंकों के इजाफे के बाद अगली बैठक में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी की जा सकती है जिससे रीपो दर 5.65 फीसदी हो जाएगी। क्या आरबीआई को इसी दर को लक्ष्य बनाना चाहिए? या उसे छह फीसदी दर को निशाना बनाना चाहिए? फिलहाल अनिश्चितताओं के चलते कुछ भी कहना मुश्किल है लेकिन उस स्तर पर आरबीआई अगले कदम की प्रतीक्षा कर सकता है।
वहीं अगर केंद्रीय बैंक केवल 35 आधार अंक की बढ़ोतरी करता है तो भी आश्चर्य नहीं होगा। अधिकांश विश्लेषक मानते हैं कि मुद्रास्फीति के मोर्चे पर बुरा समय बीत चुका है। चौथी तिमाही की मुद्रास्फीति आरबीआई के अनुमान से कम रह सकती है।
क्या रुपया सबसे बुरे दौर से गुजर चुका है? अधिकांश केंद्रीय बैंक अमेरिकी फेडरल रिजर्व के इजाफे को लेकर प्रतिक्रिया दे रहे हैं लेकिन पूंजी के लिहाज से अमेरिका का आकर्षण कमजोर हो रहा है। आगे चलकर मुद्रास्फीति कमजोर होगी तो फेड भी दरों को आक्रामक ढंग से नहीं बढ़ाएगा। इससे अमेरिकी मुद्रा की दिशा पलट सकती है।
कुल मिलाकर आरबीआई दरों में कम इजाफे के लिए वजह देकर उसे उचित ठहरा सकता है लेकिन मेरा मानना है कि 50 आधार अंकों का इजाफा किया जाना चाहिए ताकि मुद्रास्फीति तथा रुपये में गिरावट से निपटने का दृढ़ निश्चय प्रकट हो।