एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया के लिए नौकरी के उम्मीदवारों को अपनी ओर खींच पाना कभी भी मुश्किल नहीं रहा है।
वजह भी शायद साफ है कि कंपनी की उद्योग जगत में खासी पहचान है और बाजार में उसकी ब्रांड इक्विटी भी दमदार रही है। पर कंपनी के लिए कर्मचारियों को अपने पास रोक कर रख पाना एक मुश्किल काम था।
कंपनी को कुछ ही समय के बाद छोड़ कर जाने वाले कर्मचारियों की संख्या हमेशा से उसके लिए सरदर्दी का सबब था। इसके लिए कुछ हद तक बाजार में प्रतिभाओं की कमी को जिम्मेदार तो कहा जा सकता है, पर इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि एलजी में काम कर रहे कर्मचारी अपने ऊपर हद से अधिक दबाव महसूस करते थे।
कुछ ऐसा कि उन्हें घुटन सी होने लगे। या सीधे शब्दों में कहें तो कोरिया की इस कंपनी खुद को भीड़ में एक अलग नियोक्ता के रूप में पहचान दिलाने में सफल नहीं हो पाई थी। पर शायद अब चीजें बदलने लगी हैं। हालांकि, यशो वर्ध्दन वर्मा, जिन्हें 1997 में एलजी इंडिया में नियुक्त किया गया था और जो वर्तमान में कंपनी के मानव संसाधन निदेशक हैं, यह नहीं मानते कि कंपनी का नाम बाजार में श्रेष्ठ नियोक्ताओं की सूची में शामिल नहीं है।
वह मानते हैं कि उद्योग जगत में कर्मचारियों की एक कंपनी छोड़कर दूसरी कंपनी में जाने की जो औसत दर है उसकी तुलना में कंपनी में यह दर काफी कम है। पर साथ ही वह इस बात का भी खुलासा करते हैं कि पिछले कुछ महीनों में कंपनी ने प्रबंधन स्तरीय कार्यक्रमों की ओर ध्यान देना शुरू किया है। जरा देखते हैं कि एलजी ने अपने कर्मचारियों का हित देखते हुए कौन से कदम उठाए हैं। सबसे पहले कंपनी ने यह फैसला लिया है कि रविवार को कंपनी के किसी भी कर्मचारी से काम नहीं करवाया जाएगा।
पहले हालात इससे कुछ अलग थे और सप्ताहांत भी कर्मचारियों को आधी रात तक दफ्तर में बैठ कर काम करना पड़ता था। अब चूंकि आदतों या फिर पुराने नियमों में एक बारगी से बदलाव आना शायद इतना आसान नहीं होता है इसलिए कंपनी वर्मा और उनकी टीम के दूसरे सदस्य अक्सर अपने कर्मचारियों के घरों में लैंडलाइन पर फोन कर के यह पूछते रहते हैं कि कहीं वे दफ्तर में तो नहीं हैं या फिर कंपनी के किसी काम के सिलसिले में ही बाहर तो नहीं गए हैं।
वर्मा हंसते हुए कहते हैं कि इस बात की जानकारी पाने की सबसे बढ़िया स्रोत खुद उनके कर्मचारियों की पत्नियां होती हैं। कंपनी एक फैमिली ऐंबैसडर कार्यक्रम भी चला रही है जिसमें एक व्यक्ति कर्मचारियों के घरों तक जाता है और उससे उनकी समस्याएं पूछता है। एलजी जो पहले से ही उद्योग जगत में बेहतर तनख्वाह देने के लिए जानी जाती है, (कंपनी ने इस साल औसतन 18 फीसदी का इन्क्रीमेंट दिया है) ने इन दिनों कुछ और तरह के इन्सेंटिव देने पर विचार कर रही है।
सितंबर में कंपनी अपने 2,000 कर्मचारियों के लिए पांच वर्षीय रोजगार विकास कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। इस कार्यक्रम के लिए तैयारी पिछले साल मार्च महीने में ही शुरू कर दी गई थी। प्रारंभिक चरणों में हरेक कर्मचारी के बारे में मूल्यांकन किया जा रहा है कि अब से पांच साल के बाद वे कहां हो सकते हैं और उनके प्रशिक्षण की आवश्यकताएं क्या हैं। इस कार्यक्रम पर पहले दिन से ही नजर रखने के लिए चार सदस्यीय टीम का चयन किया गया है।
जिस हिसाब से कारोबारी समीकरण लगातार बदल रहे हैं और लोगों से उम्मीद की जा रही है कि वे अपनी योग्यताओं और दक्षताओं को लगातार सुधारते रहें, ऐसे में एलजी ने अपने 30 वरिष्ठ कर्मचारियों के लिए दो तरह की योजनाएं तैयार की हैं। वर्मा कहते हैं कि इन्हीं लोगों को कंपनी के विकास में योगदान देना है और इस वजह से जरूरी है कि प्रशिक्षण कार्यक्रम को लचीला बनाया जाए। कंपनी ने इस कार्यक्रम को तैयार करने के लिए अब तक एक करोड़ रुपये खर्च किए हैं पर उसे उम्मीद है कि इस कार्यक्रम के जरिए उसे इससे कहीं अधिक की वापसी होगी।
इस पंचवर्षीय रोजगार योजना कार्यक्रम को बदलते पारिस्थितिकी तंत्र को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है और वर्मा को उम्मीद है कि इसकी मदद से कर्मचारी लंबे समय के लिए कंपनी से जुड़े रहने का मन बना सकेंगे। इस कार्यक्रम से और फायदा यह होगा कि कंपनी उन कर्मचारियों की पहचान कर पाएगी जो बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। इन कर्मचारियों की पहचान होने से उन्हें तरक्की की राह पर आगे बढ़ाना कंपनी के लिए आसान हो जाएगा।
एक अध्ययन से भी पता चला है कि श्रेष्ठ नियोक्ताओं के साथ काम करने वाले कर्मचारियों में 76 फीसदी अपने काम से संतुष्ट रहते हैं जबकि अपेक्षाकृत कम बेहतर कर्मचारियों के पास काम करने वाले महज 50 फीसदी कर्मचारी ही अपने काम को लेकर खुश रहते हैं। एलजी की एक मान्यता यह भी रही है कि दुनिया भर में उसकी सहायक कंपनी में कम से कम 20 फीसदी सीईओ स्थानीय ही होने चाहिए। प्रशिक्षण एक ऐसा काम है जो एलजी के खून में हमेशा से रहा है। इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि हर तिमाही में कम से कम एक बार ऐसा होता है कि एलजी इंडिया के पूरे दफ्तर में सन्नाटा फैला होता है और इसकी वजह होती है कि कंपनी के सारे कर्मचारी क्लासरूम में प्रशिक्षण ले रहे होते हैं।
प्रशिक्षण के बाद टेस्ट भी लिया जाता है और इसमें निचले से लेकर चोटी तक सभी कर्मचारियों को भाग लेना होता है। जिन कर्मचारियों को सबसे अच्छे अंक मिलते हैं उन्हें पुरस्कार भी दिया जाता है। एलजी का हर कर्मचारी औसतन एक साल में 10 दिन इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लेता है। वर्मा कहते हैं कि आज के प्रतियोगितापूर्ण माहौल में कर्मचारियों को थोड़ा बहुत तनाव होना तो स्वाभाविक है और इससे बचा भी नहीं जा सकता। इसलिए अगर कुछ किया जा सकता है तो वह है सही उम्मीदवारों का चयन करना।
यही वजह है कि कंपनी में भर्ती करते वक्त एलजी दूसरे किस्म के साक्षात्कारों के अलावा ‘ऋणात्मक साक्षात्कार’ भी लेती है जिससे यह पता चल सके कि कोई उम्मीदवार प्रतिकूल परिस्थितियों में कितना तनाव झेल सकता है। जब वर्मा का साक्षात्कार लिया गया था तो उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।
कंपनी के तीन सदस्यों ने 15 मिनट तक उनका एक बंद कमरे में साक्षात्कार लिया था और उस दौरान उनसे कुछ भी नहीं पूछा गया और साक्षात्कार खत्म होने की घोषणा कर दी गई। दूसरे दिन उन्हें नियुक्ति पत्र सौंपा गया और उन्हें बताया गया कि कंपनी ने उनके बारे में पहले से ही विस्तृत जानकारियां इकट्ठी कर ली थीं और साक्षात्कार वाले दिन तो महज उनके बॉडी लैंग्वेज को पढ़ा गया था। इस घटना से उन्हें समझ में आया कि आखिर एलजी किस तरीके से अपने यहां भर्तियां करती है।