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बढ़ती मुद्रास्फीति पर कैसे करें नियंत्रण?

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 5:57 PM IST

दुनिया भर में मुद्रास्फीति काफी ऊंचे स्तर पर है। इससे निपटना कितना मुश्किल होगा? मुद्रास्फीति और उससे निपटने को लेकर काफी अनिश्चितता का माहौल है। लेकिन सतर्कतापूर्वक आगे बढ़ने और कम धुंधले परिदृश्य के पक्ष में भी दलील है।
उभरते बाजारों में महामारी के बाद मजबूत वृहद नीतिगत प्रतिक्रिया हुई। अमेरिका में दूसरे विश्व युद्ध के स्तर की राजकोषीय नीति अपनाई गई। नवंबर 2020 में राष्ट्रपति चुनाव होने थे, इस बात ने भी इसे प्रोत्साहन दिया। उभरते बाजारों के केंद्रीय बैंकों ने दरों में भारी कटौती की और 2008 में विकसित अपारंपरिक मौद्रिक नीति की टूलकिट को दोबारा अपनाया। हम सब जानते हैं कि इन प्रतिक्रियाओं की अब अति हो चुकी है। महामारी और फिर युद्ध के कारण आपूर्ति शृंखला में आई बाधा ने हालात और बिगाड़ दिए। ये सभी ताकतें एक साथ आईं और इनके चलते मुद्रास्फीति इतनी बढ़ी कि उसकी तुलना 1970 के दशक की महंगाई से की जा सकती है।
विकसित बाजारों की विस्तारवादी वृहद आर्थिक नीति से भारत को भी बहुत लाभ हुआ क्योंकि इससे निर्यात में तेजी आई। इसी प्रकार भारत के वृहद/ वित्तीय माहौल को वैश्विक मुद्रास्फीति आौर वित्तीय माहौल तथा विकसित बाजारों की नीतिगत प्रतिक्रिया से नया आकार मिल रहा है। भारत में भी इस स्थिति को समझने की आवश्यकता है।
मौद्रिक नीति का काम है अल्पावधि में ब्याज दर का प्रबंधन करना ताकि दीर्घावधि में कीमतों में स्थिरता रहे। हमें अल्पावधि की ब्याज दरों को वास्तविक संदर्भों में प्रकट करना चाहिए। उदाहरण के लिए भारत में जब अल्प दर 5 प्रतिशत और अनुमानित मुद्रास्फीति 8 प्रतिशत है तो वास्तविक अल्प दर 3 प्रतिशत ऋणात्मक है। नीतिगत दरों को आमतौर पर वास्तविक अर्थों में सकारात्मक होना चाहिए तभी वह मुद्रास्फीति का मुकाबला कर सकेगी।
मौद्रिक अर्थव्यवस्था का एक अच्छा उपकरण इस बात पर विचार करना भी है कि अनुमानित मुद्रास्फीति में बदलाव आने पर क्या होता है। मान लेते हैं कि अनुमानित मुद्रास्फीति में 100 आधार अंकों की बढ़ोतरी होती है। यदि अल्पावधि की दर केवल 50 आधार अंक बढ़ती है तो वास्तविक दर में कमी आती है। जाहिर है ऐसा नहीं होना चाहिए। इस विचार को ‘टेलर सिद्धांत’ कहा जाता है। मौद्रिक नीति को मुद्रास्फीति पर प्रतिक्रिया देनी चाहिए। जब मुद्रास्फीति में 100 आधार अंकों की कमी आती है तो मौद्रिक नीति को कम से कम 150 आधार अंकों की कटौती करनी चाहिए। बीते वर्षों में इस मामले में कई केंद्रीय बैंकों ने गड़बड़ी की है। अनुमानित मुद्रास्फीति में इजाफा हुआ लेकिन मौद्रिक नीति की प्रतिक्रिया इसके अनुरूप नहीं रही। अर्थव्यवस्था में ओवरहीटिंग हुई और मुद्रास्फीति बढ़ी लेकिन वास्तविक दरों में गिरावट आई जिससे अर्थव्यवस्था को दोबारा प्रोत्साहन मिला। आर्थिक एजेंटों ने इस पर नजर रखी और यह निष्कर्ष निकाला कि केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को लेकर गंभीर नहीं हैं। उनकी वेतन तय करने वाली तथा मूल्य स्थिरता वाले व्यवहार में बदलाव आया जिसने मुद्रास्फीति को बढ़ावा दिया। यही कारण है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व को हाल के महीनों में तीव्र प्रतिक्रिया देनी पड़ी। वह सकारात्मक वास्तविक दर हासिल करने की कोशिश कर रहा है। वह अपनी विश्वसनीयता को दोबारा हासिल करने की कोशिश कर रहा है ताकि एक ऐसे बिंदु पर पहुंच सके जहां फेड के लक्ष्य को लेकर कोई आपत्ति न हो।
क्या यह पूर्वी यूक्रेन में छिड़ी तोपखानों की जंग की तरह खूनी सिलसिला होगा जहां बड़े पैमाने पर संकट उत्पन्न होगा? मौद्रिक नीति केवल दीर्घावधि में काम करती है और मुद्रास्फीति पर असर 12 से 18 महीनों में नजर आएगा। मुद्रास्फीति के चलते विश्व अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही है। अधिक आशावादी दृष्टिकोण के पक्ष में तीन तर्क हैं। अहम बात यह है कि जनता फेड को कैसे देखती है: जहां तक फेडरल रिजर्व के विश्वसनीय ढंग से अमेरिकी मुद्रास्फीति को 2 फीसदी के दायरे में रखने के प्रयास करने का सवाल है, एक पल के लिए तो ऐसा लगा कि वास्तव में ऐसा नहीं है। क्योंकि फेड की बातें मुद्रास्फीति को लक्षित करने से इतर थीं। वह समय अब बीत चुका है। फेड अब पुन: एक सामान्य परिपक्व केंद्रीय बैंक की तरह वापसी कर चुका है और 2 फीसदी के मुद्रास्फीति के लक्ष्य को लेकर उसे कोई संशय नहीं है। सन 1994 के बाद से अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने विनिमय दर को लेकर कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया है।
श्रमिकों और कंपनियों के पास यह जानकारी रहती है तो मुद्रास्फीति को स्थिर बनाने में मदद मिलती है। विभिन्न व्यक्ति वेतन भत्तों और कीमतों को लेकर निर्णय लेते हैं और एक बार जब फेड के लक्ष्य को लेकर भरोसा कायम हो जाए तो ये निर्णय बदल जाएंगे ताकि मुद्रास्फीति में कमी की जा सके।  यदि सही ढंग से अंजाम दिया जाए तो मौद्रिक नीति एक दिमागी काम है और इसमें काफी क्रूरता शामिल होती है। संस्थागत विश्वसनीयता आंशिक रूप से कष्ट कम करती है। यह केवल सैद्धांतिक बात नहीं है। इतिहास में ऐसे अवसर भी आये हैं जहां मुद्रास्फीति को कम करने के लिए जरूरी कष्ट को उपयुक्त रणनीतियों की मदद से कम किया गया। इजरायल में 1985 में ऐसा ही किया गया।
आपूर्ति क्षेत्र की बाधाओं का क्या? बाजार अर्थव्यवस्था एक स्व संगठित और स्व सुधार वाली व्यवस्था है और जनवरी 2020 के बाद से कंपनियां अपने व्यवहार में तब्दीली कर रही हैं। उदाहरण के लिए बाल्टिक एक्सचेंज ड्राई इंडेक्स जो कच्चे माल के नौवहन की लागत का आकलन करता है, वह सितंबर 2021 के 5,500 अंकों के उच्चतम स्तर से दिसंबर 2021 में सामान्य स्तर पर आ गया।
2020 में कोविड के कारण आपूर्ति शृंखला में जो बाधा आयी उसमें सुधार भी नहीं हुआ था कि चीन और रूस के घटनाक्रम ने हालात और खराब कर दिए। मूल्य व्यवस्था अबाध रूप से उत्पादन की समस्याओं का पता लगाती है और उन्हें हल करती है। चीन की कोविड शून्य नीति या यूक्रेन में रूस के आक्रमण जैसे नये झटकों को छोड़ दिया जाए तो वैश्विक उत्पादन नये सिरे से तय हो रहा है।
आखिर में विकसित बाजारों की राजकोषीय नीति में सख्ती मददगार साबित हो रही है। ताजा तिमाहियों में नतीजे सामान्य रहे हैं। इससे मुद्रास्फीतिक दबाव कम हुआ है।
अमेरिकी फेड अब कौन से कदम उठाएगा? वृहद आर्थिक स्थिरता कब लौटेगी, जिसके बाद सामान्य आर्थिक वृद्धि का सिलसिला शुरू हो सकेगा? यह सच है कि फेड को शायद ऐसा करने के लिए कठोर कदम उठाने पड़ें। परंतु मुद्रास्फीति को लक्षित करने वाली विश्वसनीय व्यवस्था, आपूर्ति शृंखला में सुधार और राजकोषीय सामान्यीकरण तीन ऐसी बातें हैं जो सुझाती हैं कि स्थिरता अनुमान से कम लागत में भी बहाल की जा सकती है।

First Published : June 29, 2022 | 12:59 AM IST