विश्व बैंक ने हाल ही में यह खुलासा किया कि वर्ष 1981 के बाद से दुनिया भर के गरीबों की संख्या 1.9 अरब से घटकर 1.4 अरब रह गई है, हालांकि गरीबी रेखा के निर्धारण के लिए प्रति व्यक्ति दैनिक क्रय क्षमता को बढ़ाकर 1.25 डॉलर कर दिया गया है।
भले ही इस दौरान गरीबों की संख्या 52 फीसदी से घट की 26 फीसदी रह गई है, उसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि गरीबी से निपटने के लिए दुनियाभर में जो प्रयास किए जा रहे हैं वे काफी हैं। क्या कोई जादुई छड़ी है जिसे घुमाते ही गरीबी को पूरी तरह से खत्म किया जा सकता है?
संतोष मेहरोत्रा, जो मानव विकास अर्थशास्त्री हैं और साथ ही योजना आयोग में सलाहकार भी, वह नई पुस्तक ‘एलिमिनेटिंग ह्यूमन पॉवर्टी’ में गरीबी के सफाये का तरीका ढूंढ रहे हैं। मेहरोत्रा 11वीं पंचवर्षीय योजना के इलेक्ट्रॉनिक संपादकों में से एक हैं।
‘एलिमिनेटिंग ह्यूमन पॉवर्टी’ के सह संपादक और अर्थशास्त्री एनरिक डेलामोनिका का कहना है कि अगर गरीबी से पूरी तरह निपटना है तो बुनियादी सामाजिक सेवाओं को बेहतर बनाना होगा, केवल मैक्रो इकनॉमी यानी वृहत अर्थव्यवस्था के विकास से कहानी बदलने वाली नहीं है।
ऐसा इसलिए कि गरीबी से छुटकारा का मतलब यह नहीं होता कि गरीबों की आय में वृद्धि हो जाए। इससे छुटकारा तब ही मिल सकता है जब बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य, जल, पोषण की हालत भी अर्थव्यवस्था के साथ साथ सुधरेगी।
आर्थिक और सामाजिक विकास के बीच संबंध को समझाते हुए वह कहते हैं कि एक ओर प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) विकास है जिसमें तेजी लाने के लिए तकनीकी बदलाव जरूरी है क्योंकि वह इसमें इंजन की तरह काम करता है, फिर आय के कारण गरीबी में कमी है जिसका मूल्यांकन प्रति व्यक्ति जीएनपी, संपत्ति वितरण, सेवाओं के वितरण और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था के जरिए किया जाता है।
एक और पहलू बुनियादी सामाजिक सेवा का है। इसमें कहा गया है कि जिन देशों ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में लंबी छलांग लगाई हैं उनमें से सभी ने आय के आधार पर मापी जाने वाली गरीबी से निजात पाई है, ऐसा नहीं है। केरल और श्रीलंका इसके बड़े उदाहरण हैं।
इनमें से कोई भी दो तत्व एक दूसरे को बेहतर बनाने के लिए जरूरी नहीं हैं, पर वे एक दूसरे को फायदा जरूर पहुंचा सकते हैं। जहां भी इनके बीच जुड़ाव है, वहां बेहतर परिणाम देखे गए हैं। इस किताब में 9 वर्ग बनाए गए हैं जिनमें विभिन्न देशों को रखा गया है और इसमें बताया गया है कि जिन देशों में पांच साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर सबसे कम है, उन देशों में विकास दर सबसे अधिक है।
इस वजह से इस किताब में कहा गया है कि विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सामाजिक और आर्थिक नीतियों में सामंजस्य होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अक्सर होता यह है कि आर्थिक विकास को वरीयता दी जाती है और इसी कोशिश में सामाजिक विकास पीछे छूट जाता है। इस किताब में छोटे ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देने की सिफारिश भी की गई है।
इस किताब में उन दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों का उदाहरण दिया गया है जहां छोटे उद्योगों (जिनमें 10 से 15 लोग काम करते हैं) को बढ़ावा देने के लिए विशेष नीतियां अपनाई जाती हैं। इस किताब में इस ओर भी इशारा किया गया है कि विकासशील देशों में बड़ी संख्या में लोगों को छोटे उद्योगों (जहां 10 से कम लोगों को नियुक्त किया गया हो) में रोजगार प्राप्त होता है।
गरीबी को कम करने के लिए एक औद्योगिक नीति की सिफारिश करते हुए कहा गया है कि ऋण मुहैया कराने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के सुझावों के ठीक उलट विकासशील देशों को ऐसी नीतियां तैयार करनी चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई हों।
यह किताब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का समर्थन तो करती है पर इसमें चीन का उदाहरण दिया गया है जिसने शुरुआत में केवल संयुक्त उपक्रमों के जरिए एफडीआई को मंजूरी दी थी। पर बाद में यह महसूस किया गया कि एफडीआई से चीन के शहरों और गांवों में उन उद्योगों को फायदा पहुंचा है जो स्थानीय सरकारों की ओर से प्रायोजित थीं। अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जुड़े होने की वजह से इनका तेजी से विकास हुआ है।
भारत टाटा और पोस्को जैसी बड़ी कंपनियों के दुख में शामिल होकर आंसू बहा रहा है, जो अपने कारखानों और खानों के लिए जमीन हासिल करने की लड़ाई लड रही हैं, पर शायद उसे उन छोटी कंपनियों की ओर भी ध्यान देना चाहिए जो देश को गरीबी की गिरफ्त से बाहर निकालने की क्षमता रखती हैं।
अगर छोटे उद्योगों और छोटी कंपनियों पर सरकार ध्यान देना शुरू कर दे तो देश कम से कम मुश्किल आर्थिक हालात से मुकाबले को तो तैयार रहेगा। यह किताब एक ओर जहां छोटे उद्योगों और असंगठित क्षेत्रों को सहारा देने की बात कहती है, वहीं इसमें यह भी बताया गया है कि स्थानीय व्यवस्थाओं में सुधार मानव विकास और गरीबी से निपटने का एक प्रत्यक्ष हथियार हो सकता है।
पर अगर गरीबी से पूरी तरह से निपटना है तो सबसे पहली जरूरत बुनियादी सामाजिक सेवाओं की स्थिति में सुधार लाना है क्योंकि इनके बिना गरीबी मिटाने के दूसरे तमाम प्रयोग असफल हो जाएंगे। साथ ही यह किताब बताती है कि भले ही स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र के काफी सुधार की जरूरत है पर इसका मतलब यह नहीं है कि इन क्षेत्रों को निजी हाथों में सौंप दिया जाए।
किताब में बताया गया है कि जिने देशों ने गरीबी की समस्या से थोड़ा बहुत भी छुटकारा पाया है उन देशों में इन सेवाओं को उपलब्ध कराने के लिए सरकार का खासा योगदान रहा है। किताब कहती है कि सरकार की इन क्षेत्रों में असफलता को दूर करने के लिए निजीकरण से बेहतर विकल्प विकेंद्रीकरण का होगा।