कारोबारी जगत के ज्यादातर लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं कि अगर मंगलवार को सरकार, संसद में विश्वास मत हासिल कर लेती है, वह आर्थिक सुधारों की गाड़ी तेजी से आगे बढ़ाएगी।
उनकी यह उम्मीद इस हकीकत के बावजूद कायम है कि सरकार के पास अब छह-सात महीनों का वक्त बाकी है। इसके बाद आम चुनाव का बिगुल फूंक दिया जाएगा और फिर सभी राजनीतिक दल उसी में मशगूल हो जाएंगे।
उम्मीद तो यह भी की जा रही है किमनमोहन सिंह और उनके सिपहसलार दहाई के आंकड़ों को छू चुकी महंगाई की दर और गिरती हुई विकास दर जैसे दुश्मनों का सामना बड़ी बहादुरी के साथ करेंगे। इसके लिए मनमोहन सरकार को दो मोर्चों पर एक साथ जंग लड़नी पड़ेगी।
पहला मोर्चा तो पेंशन सुधार और बीमा जैसे अहम सेक्टरों में विदेशी निवेश को बढ़ाने जैसे बड़े मुद्दों का है। ये मुद्दे मुल्क की अर्थव्यवस्था के लिए काफी जरूरी तो हैं, लेकिन ये वोट नहीं जुटा सकते। अगर सरकार उन बड़े मुद्दों पर आर्थिक सुधारों की गाड़ी की रफ्तार तेज भी करती है, तो भी इसका इस्तेमाल वह विपक्ष के इसी आरोप के खिलाफ कर सकती है कि उसने पिछले चार सालों में आर्थिक सुधारों के नाम पर कुछ भी नहीं किया। लेकिन बिजली और शिक्षा जैसे कुछ सेक्टर तो ऐसे हैं, जहां पीछे छूट चुके मौके वापस लौटकर नहीं आएंगे।
साथ ही, राज्य स्तर पर कारोबार पर असर डालने वाले सभी मुद्दों को हल करना भी काफी मुश्किल काम है। इसके अलावा, इस बात की उम्मीद इक्का-दुक्का लोगों को ही है कि इतने कम वक्त में सरकारी अफसरों की टेबल के नीचे से होने वाली कमाई पर लगाम लगाई जा सकेगी। इस तरीके से संप्रग सरकार के पास अब उन लोगों के बीच अपनी इात बचाने के रास्ते न के बराबर हैं, जिन्होंने काफी उम्मीदों के साथ 2004 में मनमोहन की ‘ड्रीम टीम’ का स्वागत तहेदिल से किया था।
सरकार के सामने दूसरा मोर्चा उन बड़े मुद्दों का है, जिनकी वजह से थोड़े वक्त के लिए अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल का माहौल कायम हो जाता है। अगर सरकार इस मोर्चे पर जंग को लड़ना चाहती है, तो भी आम चुनावों के ठीक पहले उसके तरकश में तीर कम ही बचे हैं। अगर सरकार का राजकोषीय घाटा आठ फीसदी और व्यापार घाटा करीब चार फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर बना रहेगा, वह अर्थव्यवस्था के लिए यकीनन अच्छी खबर नहीं हो सकती।
उर्वरक और पेट्रोलियम उत्पादों पर मोटी सब्सिडी देकर सरकार भलाई करने की जगह असल में उर्वरक और तेल कंपनियों का बेड़ा गर्क कर रही है। लेकिन वह सब्सिडी को घटा भी नहीं सकती है क्योंकि इससे तेल की कीमतों में भारी-भरकम इजाफा हो जाएगा। इससे आज जो महंगाई की दर 12 फीसदी के आस-पास चक्कर काट रही है, कल को 20 फीसदी के नए शिखर पर होगी। आप अंदाजा लगा ही सकते हैं कि आज इतना हंगामा मचा है तो तब क्या होगा, जब महंगाई की दर 20 फीसदी के पहाड़ पर होगी। इस गजब के धर्मसंकट में फंसी सरकार काफी असहाय नजर आ रही है।
क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां दिनोंदिन मुल्क की रेटिंग कम करती जा रही हैं और विदेशी निवेशक तेजी से मुल्क के शेयर बाजार से पैसे निकालने में जुटे हुए हैं। लेकिन सरकार कुछ भी नहीं कर पा रही है। अगर उसने किसानों को 71,600 करोड़ रुपये की मोटी-ताजी कर्ज माफी योजना और छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को अमली जामा नहीं पहनाया होता, तब तो वह कुछ करने के हालत में भी होती। ये दोनों अर्थव्यवस्था के लिए काफी हानिकारक साबित हुए। इसी वजह से पूरी उम्मीद है कि मांग को साधने के लिए रिजर्व बैंक ब्याज दरों में इजाफा जारी रखेगी। कारोबारियों के लिए यह कोई अच्छी खबर नहीं है।
हकीकत तो यही है कि कंपनियों को इस आर्थिक तूफान में अपनी नैया को खुद पार लगाना पड़ेगा। हालांकि यह बात तो सभी मान रहे हैं कि अपने मुल्क में कारोबार अब भी फायदे का धंधा है। इसी वजह से तो कोई भी यह नहीं कह रहा कि इस साल हमारी विकास दर सात फीसदी से कम होगी।