नरेंद्र मोदी असरदार दिख रहे थे। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की सालाना बैठक में गुजरात के मुख्यमंत्री ने किसी लिखित ब्योरे की मदद लिए बगैर कामयाबियों की लंबी सूची की तफसील दी।
उन्होंने कहा कि गुजरात में कपास के उत्पादन में 5 गुने से ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है और राज्य 2 अंकों की विकास दर बनाए रखने में कामयाब रहा है। इसके बाद उन्होंने और भी प्रभावशाली तरीके से राज्य में चलाए जा रहे नए कार्यक्रमों की जानकारी दी।
मोदी ने कहा कि किस तरह राज्य के हर गांव को ब्रॉडबैंड कनेक्शन से जोड़े जाने का काम चल रहा है। मोदी की बातें तथ्य और लक्ष्य केंद्रित थीं और वह पूरी तरह आत्मविश्वास से लबरेज थे।जब इसी मंच पर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से यह पूछा गया कि 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों को लेकर राजधानी ने अब तक क्या किया है और क्या दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों के लिए तैयार है, तो उनका जवाब था – ‘इसकी पूरी कहानी एक भारतीय शादी की तरह है।
जिसमें बारात आने से चंद घंटे पहले तक यह लगता है कि कुछ हो ही नहीं रहा है। पर चमत्कारिक रूप से सब कुछ वक्त पर पूरा हो जाता है।’ दीक्षित की बात पर श्रोताओं के बीच हंसी की लहर दौड़ गई, पर मुझे इस बात पर शंका हुई कि उनका ‘सब कुछ समय पर होने’ का वादा सही साबित होगा।आप कह सकते हैं कि मोदी ने जनसंहार के लिए लोगों का उकसाया, जबकि शीला दीक्षित की छवि एक चहेती चाची की है।
पर जब मोदी ने अच्छे बहुमत के साथ दोबारा चुनाव जीता और शीला दीक्षित एक दफा फिर से चुनाव की दहलीज पर खड़ी हैं, ऐसे में हर राज्य का मुख्यमंत्री अपने प्रदर्शन के आधार पर चुनावी जीत हासिल करना चाहता है।
यह सही है कि जाति और समुदाय जैसे परंपरागत मुद्दे हमेशा की तरह आज भी चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, पर जब उड़ीसा यह दावा करता है कि उसने पहली दफा राष्ट्रीय औसत से ज्यादा विकास दर हासिल की है, तो शायद नवीन पटनायक तीसरी दफा राज्य की कमान संभालने के हकदार हैं। यह बात दीगर है कि उड़ीसा का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट अब भी समस्याओं से घिरा हुआ है।
नीतीश कुमार अभी यह दावा नहीं कर सकते कि वे बिहार में निवेशकों को खींचने में नाकाम रहे हैं, पर उनके द्वारा राज्य की हालत सुधारे जाने की दिशा में किया गया काम ही है कि आज वहां लोग बेहतर जिंदगी बसर करने से डर नहीं रहे। इसकी एक मिसाल यह कि आज पटना में कारों की बिक्री उफान पर है, क्योंकि लोगों को अब इस बात का खौफ नहीं है कि उनकी कार छीन या लूट ली जाएगी।
राजस्थान में वसुंधरा राजे ने भी सड़कों की हालत दुरुस्त किए जाने की दिशा में काफी कुछ किया है और राज्य के कुछ हिस्सों में बिजली की स्थिति भी बेहतर हुई है। इसी तरह, हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी अपने पूर्ववर्ती के मुकाबले अच्छा प्रदर्शन किया है। और मार्क्सवादियों के शासन वाले पश्चिम बंगाल में भी नंदीग्राम मामले से पहले तक बुध्ददेव भट्टाचार्य के प्रति काफी उत्साह की-सी स्थिति थी।
पर सवाल यह है कि ये सारे मामले चंद्रबाबू नायडू द्वारा तय किए गए मानक के मुकाबले कहां टिकते हैं?अब जरा केंद्र की बात करें। तुलनात्मक रूप से देखा जाय तो केंद्र सरकार का कोई भी ऐसा मंत्री, जो काम करने की ख्वाहिश रखता है, इस बात से निराश हो जाएगा की उसकी सीमा क्या है और ऐसे में किसी भी मंत्री पर बेहतर प्रदर्शन का दबाव नहीं है।
पिछले 4 साल में बिजली और शिक्षा की स्थिति में कोई भी गौरतलब परिवर्तन नहीं देखा गया है। कृषि क्षेत्र की हालत भी पतली है और यह क्षेत्र संकट के दौर से गुजर रहा है। न तो अर्जुन सिंह, न शरद पवार और न ही सुशील कुमार शिंदे ने पिछले 4 साल में ऐसा कुछ किया है कि वे लोगों के बीच सीना तानकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकें।
गरीबी मिटाने के लिए चलाई जा रही मुहिम भी ज्यादातर मामलों में अपने मकसद को हासिल करने में नाकाम रही है और राहुल गांधी अपनी ‘भारत खोजो’ यात्रा के जरिये इसी की पड़ताल करने की कवायद में जुटे हैं। यहां तक कि पी. चिदंबरम भी अपनी विरासत पर गर्व नहीं कर सकते, क्योंकि घाटा और मुद्रास्फीति दोनों कुलांचे भर रहे हैं।
कमलनाथ की ‘मेहनत’ 80 अरब डॉलर के व्यापार घाटे के रूप में सामने आई है। हालांकि नागरिक उड्डयन, रेलवे तथा विज्ञान और तकनीक मंत्रालयों की अगुआई करने वाले मंत्रियों का लेखाजोखा थोड़ा ठीक है।
केंद्र के इन मंत्रियों के लिए अच्छा होता कि वे किसी राज्य के मुख्यमंत्री होते। इसकी वजह यह है कि आज भी देवगौड़ा जैसे कुंद पड़ गए और पुराने स्कूल के नेता कर्नाटक के लोगों के जहन पर राज करते हैं। इसी तरह, राज ठाकरे जैसे नेता विखंडन की राजनीति के अलावा और कुछ भी नहीं कर सकते। और जब बात केरल के मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन की हो, तो इतना जरूर कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने जनादेश के साथ न्याय नहीं किया है।