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सबको खुश करने के चक्कर में उपजा भ्रम

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 2:44 AM IST

डेविड हाल्बर्सटाम ने 1970 के दशक में वियतनाम युध्द की शुरुआत पर ‘द बेस्ट ऐंड द ब्राइटेस्ट’ नाम की पुस्तक लिखी।


इस किताब में उन विंदुओं पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें राष्ट्रपति कैनेडी ने प्रशासन के संचालन में सहयोग के लिए ”विज किड्स” की नियुक्ति की थी। हम सभी जानते हैं कि जो भी हुआ, बुरा हुआ लेकिन हकीकत यह भी है कि कैनेडी की कैबिनेट में ज्यादातर सदस्य अपनी पीढ़ी के बेहतरीन और तेज तर्रार लोग थे।

राबर्ट मैकनामारा उस टीम में, विज किड्ज क्लब और कैनेडी के प्रशासन (रक्षा सचिव) के कार्ड लाने-ले जाने वाला सदस्य थे। बाद में  वे विश्व बैंक के अध्यक्ष बने और उस दौर का प्रतिनिधित्व किया जब उसमें सुधार हुआ (1970 और 1980 की शुरुआत में)।

उन्हीं के दौर में एक बेहतरीन पुस्तक सामने आई जिसका वित्तीय प्रबंधन और नेतृत्व विश्व बैंक ने किया था। इस पुस्तक को ‘द ग्रोथ रिपोर्ट: स्ट्रैटेजीज फॉर सस्टेंड ग्रोथ ऐंड इनक्लूसिव डेवलपमेंट’ नाम दिया गया। 

इस रिपोर्ट को तैयार करने वाली टीम का नेतृत्व नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रसिध्द अर्थशास्त्री माइकल स्पेंस ने किया था, जिसमें तमाम बेहतरीन और मेधावी लोग शामिल थे। इसमें रॉबर्ट सोलो (नोबेल पुरस्कार से सम्मानित और विकासात्मक अर्थशास्त्र के प्रमुख) और कुछ एकेडेमिक्स, जो बाद में टेक्नोक्रेट्स, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री बने, शामिल थे।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि किसी गैर वैज्ञानिक परियोजना को तैयार करने के लिए इतने बेहतरीन दिमाग एक साथ जुड़े (मेरा अनुमान है कि परमाणु बम का विकास भी कुछ मेधावी लोगों ने ही किया है)। लेकिन यह कहना बहुत बड़ी अतिशयोक्ति होगी कि उनकी रिपोर्ट कुछ हास्यास्पद इनपुट्स के अलावा भी किसी काम की थी।

इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि इसमें सभी विद्वानों का पक्ष शामिल किया जाना था, जो राजनीतिक रूप से भी सही हो, उसके विभिन्न विचारों वाले 21 सदस्यों की किसी भी नीतियों के खिलाफ न हों और साथ ही इस समिति में शामिल देशों  ( ब्राजील, चीन, भारत, कोरिया, मेक्सिको, पेरू, तुर्की, अमेरिका आदि ) के खिलाफ न हों।

इस रिपोर्ट में ऐसा क्या कहा गया, जो कुछ ज्यादा ही संतुलित है और इससे कोई सूचना भी नहीं मिलती। इसके कुछ कारण हैं, जिनमें से कुछ का ही यहां उल्लेख किया जाएगा। रिपोर्ट में उस वाशिंगटन कंसेंसस से, जिसकी अब दुर्गति हो चुकी है, दूर रहने की कोशिश भी की गई है, ताकि लहजा कुछ नर्म रहे। वाशिंगटन कंसेंसस कुछ उम्दा नीतियों का पुलिंदा है, जिसे जॉन विलियमसन ने दो दशक पहले कामयाब वृध्दि के लिए जरूरी शर्त बताते हुए तैयार किया था।

दो दशक के बाद विकास आयोग ने उनमें से 10 नए सिध्दान्तों को खोज निकाला और यह भिन्न प्रकृति का संतुलित और करके सीखने के आधार पर तैयार किया गया, बाद में इसमें सफल विकास के लिए 5 सिध्दांत बने। यह 13 देशों के खुद के अनुभवों के आधार पर बनाए गए थे। इनमें से ज्यादातर देशों ने लगातार 25 साल तक 7 प्रतिशत से अधिक विकास दर हासिल की (भारत और वियतनाम भी इसमें शामिल हुए)।

इन तेरह देशों में 5 की आबादी 70 लाख से कम है जिनमें माल्टा जैसा छोटा देश भी शामिल है जिसकी आबादी 4 लाख से भी कम है। यह रिपोर्ट इस तरह के अपवाद स्वरूप मिली सफलता के महत्त्वपूर्ण कारणों पर दृढ़ लगती है: ”तेजी से और लंबे समय के विकास के लिए मजबूत राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत है… इस तरह के नेतृत्व को समग्र विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए धैर्य, लंबी योजनाओं और कर्ज से दूर रहने पर ध्यान देने की जरूरत है ”(पृष्ठ 3)।

जैसा कि रोमन क्राउड कहते हैं, उन पांच सिध्दांतों के बारे में बताएं। वे हैं पूरे विश्व का खुलापन (विश्व अर्थव्यवस्था का दोहन), वृहद स्तर पर आर्थिक स्थायित्व, निवेश और बचत की उच्च दरें, संसाधनों को बाजार के अनुरूप बनाना और प्रतिबध्द, विश्वसनीय और सक्षम सरकार। क्या इस तरह की नीति की कल्पना की जा सकती है, तो अच्छी, संतुलित, और खुली हो- इसके साथ ही आपको ढेरों निवेश और बचत की निश्चिंतता दे?

अब आप खुद ही देखें कि 10 सिध्दांतों, जिनकी आलोचना की गई (जो राजनीतिक रूप से ठीक हैं) और इन 5 सिध्दांतों में क्या भिन्नता है? पुनरुक्तियों के एक बौध्दिक पुनर्कथन के साथ इस रिपोर्ट में जटिल समस्याएं हैं। संतुलन की प्रक्रिया में कभी-कभी इसमें सरकार के हस्तक्षेप के प्रति क्षमायाचक दृष्टिकोण अपनाया गया है। इसके लिए दो उदाहरण ही पर्याप्त होंगे।

पहला- इस रिपोर्ट में साफतौर पर उन अराजक तत्वों से पल्ला झाड़ लिया गया है जो सरकार के हस्तक्षेप को बाहर रखते हैं। कोई इस बात पर बहस नहीं करता कि सरकार की कोई भूमिका नहीं है। इसमें केवल इस बात पर बहस की गई है कि अच्छी अर्थव्यवस्था के लिए सरकार कराधान तथा अपने अच्छे उद्देश्यों जैसे प्रतिबध्दता, विश्वसनीयता और क्षमता के मामले में क्या कर सकती है।

खासकर भारत जैसे उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देशों के लिए। सभी अर्थव्यवस्थाओं, खासकर भारत जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्था में जहां सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाओं में खामियां हैं, उनकी समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया गया है। इस रिपोर्ट में उन विकल्पों पर विचार नहीं किया गया है, सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार के कौन-कौन से विकल्प हैं। 

किसी चीज के बारे में स्पष्ट राय नहीं दी गई है और इसे विकास कर रहे देशों की सरकारों के लिए इसे विश्वसनीय कहा जा रहा है? यहां तक कि इस रिपोर्ट में जन सेवाओं पर सरकार की वित्तीय आवश्यकताओं के बारे में भी नहीं कहा गया है (अगर सरकार सार्वजनिक सुविधाएं नहीं उपलब्ध कराती तो फिर कर लगाने का मतलब क्या है?) और जनता के काम आने वाली सेवाओं सरकार द्वारा किए जाने को अनावश्यक बताया गया है (तो फिर शिक्षक, नर्स और चिकित्सक सरकार के कर्मचारी क्यों हैं?) आश्चर्यजनक लगता है कि इस रिपोर्ट में अच्छी संस्थाओं की जरूरत पर बल दिया गया है, जो गरीब और अमीर देशों के बीच भिन्नता की प्रमुख वजह है।

हो सकता है कि अच्छे संस्थानों का मतलब बीएमडब्ल्यू जैसे लग्जरी गुड्स से हो- इसका कारण यह हो सकता है कि पाश्चात्य देशों में बीएमडब्ल्यू जैसे अच्छे संस्थान हैं इसलिए वे धनी हुए हैं, जो खर्चीले सामान खरीद सकते हैं। खर्चीले सामान की खरीदारी न तो आपको धनी बनाता है और न ही इससे तेजी से विकास होता है।

(लेखक नई दिल्ली स्थित एसेट मैनजमेंट कंपनी, आक्सस इनवेस्टमेंट्स के चेयरमैन हैं। यह उनके व्यक्तिगत विचार हैं)

First Published : May 30, 2008 | 10:42 PM IST