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आयात निर्यात की सुधरती सेहत

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 5:01 AM IST

अगर अप्रैल 2008 के आयात निर्यात के आंकड़ों पर निगाह डालें तो कारोबार के मामले में हालात काफी अच्छे दिखाई दे रहे हैं।


अप्रैल, 2007 के मुकाबले डॉलर के चश्मे से देखें तो इस साल के अप्रैल महीने में निर्यात में 31.5 फीसदी का इजाफा हुआ। मतलब, जहां अप्रैल, 2007 में 10.9 अरब डॉलर का निर्यात हुआ था, वहीं इस साल यह स्तर 14.4 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया।

वहीं, रुपये के हिसाब से यह इजाफा 25 फीसदी का है। इस अप्रैल में यह 46 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 58 हजार करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया। पिछले साल में ज्यादातर समय डॉलर की घटती कीमत की वजह से काफी कुछ उलट-पुलट हो गया। डॉलर की निगाह से विकास दर और रुपये की निगाह से विकास दर में काफी अंतर आ गया।

एक तरफ, डॉलर में तो विकास दर काफी अच्छी नजर आ रही थी। वहीं, रुपये के चश्मे से देखें तो विकास दर की हालत पतली हो गई थी। उन निर्यातकों की कमाई पर तो काफी असर पड़ा, जिनकी कमाई डॉलर में थी, लेकिन खर्च रुपये में होते थे। कुछ के तो अस्तित्व पर संकट के बादल छा गए थे। अब जब से डॉलर में शक्ति वापस आने लगी हैस तो इन दोनों विकास दरों के बीच की खाई पटती नजर आ रही है। इस वजह से कई निर्यातकों ने राहत की सांस ली है।

यह काफी अहम सवाल है कि रुपये की यह कमजोरी कब तक जारी रहेगी, लेकिन जब तक हालत ऐसी रहे, निर्यात मात्रा को तेजी से इजाफा होना चाहिए। साथ ही, इससे निर्यात भी फायदे का धंधा बना रहेगा। इस दौरान आयात में भी काफी इजाफा हुआ है। डॉलर के नजरिये से आयात में पूरे 37 फीसदी का इजाफा हुआ है। पिछले साल अप्रैल में यह 17.8 अरब डॉलर के स्तर पर था, वहीं इस साल अप्रैल में यह 24.3 अरब डॉलर के स्तर पर आ गया।

इस साल अप्रैल में तेल का आयात भी करीब 8 अरब डॉलर के आस-पास रहा। यह पिछले साल अप्रैल के 5.5 अरब डॉलर के स्तर की तुलना 46 फीसदी ज्यादा है। हालांकि, अप्रैल, 2007 की तुलना में इस साल के उसी महीने में गैर तेल आयात में 32 फीसदी का इजाफा हुआ है। यह एक तरह का समझाने वाले संकेत हैं कि घरेलू मांग इस वित्तीय वर्ष के पहले महीने में काफी ऊंची रही। इसी हफ्ते औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के आंकड़े आने वाले हैं। इससे तस्वीर और साफ हो जाएगी।

पेट्रोलियम उत्पादों के कारोबार के बारे में बात करें तो इसके आंकडे थोड़ी देरी से आते हैं। यह बात साफ हो गई है कि रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों तेजी से बडी मात्रा में निर्यात होने वाली साम्रागियों में शामिल हो रहा है। वजह यह है कि निजी तेल कंपनियों को देश में कम कीमत पर पेट्रोल या डीजल बेचने पर कोई सब्सिडी नहीं मिलती। इसलिए वे घरेलू बाजार में उन्हें बेचने से कतराती हैं। वे इन्हें बाहर निर्यात कर देती हैं, जिससे उन्हें काफी कमाई होती है। वहीं सरकारी तेल कंपनियों को भारी घाटा हो रहा है।  

First Published : June 11, 2008 | 11:33 PM IST