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ऐसे साधें कच्चे तेल के रावण को

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:41 AM IST

छह महीने पहले इजरायल ने अपने मुल्क में वाहनों को चलाने के वास्ते पेट्रोल या डीजल के बजाय बैटरी का इस्तेमाल करने की ठानी।


इस काम में लाख दिक्कतें हैं, फिर भी वहां की सरकार ने बैटरी से चलने वाली कारों को सड़कों पर उतारने और पेट्रोल पंपों की जगह बैटरी चार्जिंग स्टेशन खोलने की ठानी है। अगर अपने मुल्क की तरफ देखें तो भारत सरकार का ईंधन सब्सिडी का बिल 3 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर है।

मतलब, यह सरकार के राजकोषीय घाटे के आधिकारिक स्तर यानी 1.33 लाख करोड़ रुपये से भी दोगुना हो चुका है। हालांकि हालात इतने खतरनाक स्तर पर पहुंच चुके हैं, फिर भी इस बारे में कोई खास योजना बनाई जा रही हो, ऐसा कम से कम दिखता तो नहीं है। मुल्क में चर्चा इसी बात पर हो रही है कि कौन किस तरह की सब्सिडी का बोझ उठाएगा। इसका मतलब अगले एक साल में सब्सिडी का बोझ तेल कंपनियों पर कुछ ज्यादा पड़ेगा, जबकि तेल मार्केटिंग कंपनियों के लिए यह बोझ ज्यादा होगा।

हालांकि, केंद्र सरकार के कंधों पर बोझ तब तक बढ़ता रहेगा, जब तक वह वोट की खातिर हरेक वर्ग के लोगों को कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बोझ से बचाने की कोशिश करती रहेगी। हालांकि यह तो बहस का मुद्दा है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा ज्यादा खतरनाक है या फिर राजकोषीय घाटे में इजाफा। हालांकि, पेट्रोल और डीजल पर चलने वाली गाड़ियों की जगह पर नई तकनीक वाले वाहनों को लाने से पहले उनकी कीमतों पर जानकारी देनी पड़ेगी।

आलोचकों का कहना है कि हम बिजली से चलने वाली गाड़ियों का रुख नहीं कर सकते हैं। दरअसल, मुल्क में पहले से ही बिजली की कमी है। हमारे यहां बिजली की आपूर्ति मांग के मुकाबले अब भी 10 फीसदी कम है। हालांकि, हम सूरज से ऊर्जा बना सकते हैं।  इस ऊर्जा का इस्तेमाल वाहनों को चलाने में भी किया जा सकता है। सोलर पैनल का इस्तेमाल करके वाहनों की बैटरी को चार्ज किया जा सकता है, जिनसे बाद में उन्हें चलाया भी जा सकता है।

निर्धारित रूटों पर चलने वाली बसों को भी पेट्रोल या डीजल के बजाय बैटरी से चलाई जा सकती है। साथ ही, कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए ज्यादा से ज्यादा टे्रनों को भी बिजली से चलाया जाना चाहिए। अगर सरकार में ऊंचे पदों पर बैठे लोग बाग ज्यादा गहराई से और साथ मिलकर सोचेंगे तो इस दिशा में और ज्यादा काम हो सकता है। लेकिन हो इसके ठीक उलट रहा है। दिल्ली सरकार बैटरी से चलने वाली कारों पर सब्सिडी दे रही है, तो प्रधानमंत्री की ऊर्जा समन्वय कमेटी केरोसीन तेल के लैंप की जगह सोलर लैंपों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में जुटी हुआ है।

इन अलग-अलग कदमों से मुल्क के सामने खड़ी कच्चे तेल की समस्या पर कोई खास असर नहीं होने वाला। जरूरत है तो एक एकीकृत और रणनीतिक रवैये की, जिससे कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर कम किया जा सके। साथ ही, कच्चे तेल की लंबे समय तक के लिए उपलब्धता को भी बरकरार रखा जा सके।

First Published : June 30, 2008 | 10:26 PM IST