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सरकार पर बढ़ता दबाव

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 06, 2022 | 9:04 PM IST

थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति की दर के 19 अप्रैल को खत्म हुए हफ्ते के लिए जारी आंकड़े महंगाई की दर के मोर्चे पर सरकार का सिरदर्द और बढ़ाएंगे।


इस अवधि में मुद्रास्फीति की दर में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 7.57 फीसदी का इजाफा दर्ज किया गया है, जो अक्टूबर 2004 के बाद सबसे ज्यादा है। 19 अप्रैल से एक हफ्ते पहले महंगाई की दर 7.13 फीसदी थी।


पिछले हफ्ते मौद्रिक नीति के ऐलान के वक्त भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कैश रिजर्व रेश्यो (सीआरआर) में बढ़ोतरी की थी। आरबीआई की ओर से एक महीने के भीतर सीआरआर में की गई यह दूसरी बढ़ोतरी थी।


मौद्रिक नीति के ऐलान के वक्त आरबीआई ने संकेत दिया था कि रेपो रेट बढ़ाए जाने संबंधी कड़े कदमों से भी महंगाई दर पर काबू पाने में कोई खास मदद नहीं मिलती, उल्टे इससे विकास की दर पर बुरा असर पड़ने का खतरा है। लिहाजा रेपो रेट में किसी तरह की तब्दीली नहीं की गई।


ऐसे में महंगाई दर से निपटने की पूरा जिम्मा सरकार के खाते में ही आ गया है। महंगाई दर को लेकर राजनीतिक हलकों में तगड़ी लामबंदी शुरू हो चुकी है। वाम पार्टियां और बीजेपी इस मुद्दे को लेकर सड़क पर उतर चुकी हैं। ऐसी स्थिति में इस पूरे मामले से निपटना सरकार के लिए और भी मुश्किल भरा हो गया है।


इसका असर जाहिर तौर पर सरकारी वित्त पर भी देखने को मिलेगा। मौजूदा वातावरण में सरकार के लिए यह बिल्कुल संभव नहीं है कि वह पेट्रोलियम पदार्थों और फर्टिलाइजर की कीमतों में इजाफा करने का खतरा मोल ले। नतीजतन सरकार को फिर से तेल और फर्टिलाइजर बॉन्ड जारी करने होंगे, जैसा कि वह पहले भी इन पदार्थों के उत्पादकों के घाटे की भरपाई के लिए करती रही है।


यदि सरकार बॉन्ड जारी करती है तो राजकोषीय घाटा जीडीपी की 2.5 फीसदी के बजटीय अनुमान से ज्यादा हो जाएंगे।यह भी सच है कि कोई भी सरकार पर यह आरोप नहीं लगा सकता कि उसने महंगाई पर काबू के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया है। अप्रैल महीने के शुरू से ही सरकार ने निर्यात पर पाबंदी, आयात शुल्क में कटौती जैसे अल्पकालीन उपाए किए हैं।


सरकार द्वारा गेहूं की जबर्दस्त खरीद भी की गई है और जन वितरण प्रणाली के जरिये इसकी की जाने वाली सप्लाई के सिस्टम पर भी ध्यान दिया जा रहा है। भारत के लिए यह सुखद है कि यहां खाने के सामान की कीमतें धीरे-धीरे कम होने लगी हैं और साथ ही अच्छे मॉनसून के कयास लगाए गए हैं।


सरकार के साथ मजबूरी यह है कि वह इस स्थिति में नहीं दिख सकती कि वह इस पूरे मामले में किंकर्तव्यविमूढ़ है, जबकि सचाई यही है। पर कुछ न कुछ करने की मजबूरी के तहत उठाए जाने कदमों से कई बार समस्या का हल तो नहीं ही होता, बल्कि हालात और खराब हो जाते हैं।

First Published : May 5, 2008 | 12:07 AM IST