अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा है कि चीन और भारत की उन्नति और विकास की वजह से खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ रही है और खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह यही है। मैं इससे सहमत नहीं हूं।
भारत में वर्ष 1991 में अनाज का रोजाना प्रति व्यक्ति उपभोग 510 ग्राम था, वह बाद के वर्षों में कम होकर 440 से 420 ग्राम हो गया। यानी अनाज के प्रति व्यक्ति उपभोग में 15 से 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। जनसंख्या के मुताबिक मांग बढ़ती है, भारत में उत्पादन भी बढ़ा। लेकिन प्रति व्यक्ति उपभोग की दर में गिरावट आई।
इसका मतलब यह है कि गरीबों को पहले जितना भोजन मिलता था, अब वह भी नहीं मिल पाता है। अमीर मांसाहारी भोजन का उपभोग ज्यादा करते हैं। 1 यूनिट मीट के निर्माण में अनाज की 6 यूनिट खर्च होती है। इसी तरह, 1 यूनिट चिकन बनने के लिए 2 यूनिट अनाज की जरूरत होती है। अगर हम मीट और चिकन ज्यादा खाएं और रोटी कम खाएं तो इसका मतलब यह नहीं कि हम अनाज का कम उपभोग कर रहे हैं।
अमेरिकी ज्यादातर मांसाहारी भोजन का इस्तेमाल करते हैं। वे सीधे तौर पर अनाज का सेवन न कर, इसे मांसाहारी भोजन के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से ग्रहण करते हैं। भारत में असंगठित क्षेत्र से संबंधित एक रिपोर्ट आई है। इसके मुताबिक, इस क्षेत्र के 77 प्रतिशत लोग रोजाना 20 रुपये से कम खर्च में अपनी जिंदगी बसर करते हैं।
हमारे यहां उच्च वर्ग के 5 या 6 प्रतिशत लोग मीट और चिकन खाते हैं और यह वर्ग अप्रत्यक्ष रूप से ज्यादा अनाज का उपभोग कर रहा है। यानी खानपान के मोर्चे पर गरीबों की हालत खस्ता है। ऐसा नहीं है हम ज्यादा अनाज आयात कर रहे हैं और इस वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ी है। अगर आप पिछले 10 साल के औसत आंकड़ों पर नजर डालें तो हमारा सकल आयात महज 3 प्रतिशत रहा है।
हम गेहूं का आयात करते हैं, क्योंकि उसकी थोड़ी कमी है। चावल की बेहतर किस्मों का हम निर्यात करते हैं। पिछले 15 सालों में ऐसा नहीं है कि कुल आयात बढ़ रहा हो।पिछले कुछ साल में अमेरिका और दूसरे देशों में बायो ईंधन की वजह से एग्री शिफ्ट हुआ है। ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में जलवायु परिवर्तन की वजह से सूखा पड़ रहा है। इन वजहों से आपूर्ति में स्थिरता आई है।
बुश को यह नहीं पता है कि भारत में अब भी प्रति व्यक्ति सालाना आय 700 से 750 डॉलर है। भारत परचेजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी) के लिहाज से अब भी गरीब देशों की सूची में नीचे से 50वें पायदान पर है। अगर डॉलर के टर्म में देखें तो और भी नीचे होगा। मानव विकास के लिहाज से हमारा स्थान 58वां है और प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से हम और भी नीचे हैं।
बुश साहब को यह बात शायद समझ में नहीं आ रही है। हमारे खिलाफ प्रोपेगैंडा किया जा रहा है कि देश तेजी से तरक्की कर रहा है, समृद्ध हो रहा है। यहां अरबपतियों की संख्या ज्यादा हो रही है। सच तो यह है कि यह अमीरी-गरीबी की बढ़ती हुई खाई को ही दर्शाता है।
अगर हम ट्रिकल डाउन थ्योरी की बात करें तो निचले स्तर के लोगों की क्रय शक्ति भी नहीं बढ़ी है और न ही निचला तबका ज्यादा उपभोग करने में सक्षम है। इन वजहों से भी बुश का बयान तार्किक नहीं लगता है। उच्च वर्ग के महज 5 या 6 प्रतिशत लोगों की उपभोग मांग बढ़ जाने से यह समझा जाना कि खाद्यान्न संकट भारत की वजह से है, यह सही नहीं है।
बुश असली मुद्दों पर बात नहीं करना चाहते। आंकड़े बताते हैं अमेरिका में प्रति व्यक्ति अनाज की खपत भारत के मुकाबले चार गुना ज्यादा है। अगर अमेरिकी अपने खाने में एक तिहाई की कटौती कर दें, तो दुनिया में खाद्य पदार्थों की कमी ही नहीं रहेगी। दुनिया में खाद्यान्न संकट की वजह तो वास्तव में विकसित देश ही हैं, पर वे अपनी प्राथमिकताओं को कम भी नहीं करना चाहते हैं।
बुश ने खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों के असर को कम करने के लिए 77 करोड़ डॉलर की खाद्य सहायता की पेशकश की है। इसके जरिये अमेरिकी किसानों को सब्सिडी दी जाएगी। सहायता किस रूप में आ रही है, उसे तो देखना ही पड़ेगा। हम विकसित देशों से यह मांग कर रहे हैं कि कृषि में सब्सिडी कम कर दें, ताकि हमारे किसानों को भी अनाज का वाजिब दाम मिल पाए। लेकिन वे इसके लिए भी तैयार नहीं होते हैं।
संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न संस्थाओं द्वारा की जा रही कोशिशों का भी कुछ खास असर देखने को नहीं मिलेगा। यह सच है कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर कृषि का भी निगमीकरण हो गया है। दुनिया में कारॅपोरेट नियंत्रण पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। भारत में निगमीकरण की वजह से भी खाद्य संकट बढेग़ा। मिसाल के तौर पर, विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) को ही लें।
इससे किसानों को कोई रोजगार तो मिलेगा नहीं और वे अपने परंपरागत काम को छोड़ने पर भी मजबूर होंगे। इस तरह उनके लिए खाने के लाले भी पड़ जाएंगे। कृषि क्षेत्रों का ऐसा कॉरपोरेटाइजेशन बेहद खतरनाक होगा। इससे छोटे और मझोले किसान हाशिये पर चले जाएंगे। पिछले 15-16 साल में हमने कृषि को वैसा महत्व नहीं दिया, जैसा दिया जाना चाहिए था।
1980 के बाद कृषि में निवेश बेहद कम हुआ है। कृषि पर देश की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या निर्भर है और उसमें महज 3 प्रतिशत निवेश हो रहा है। इस क्षेत्र में पब्लिक सेक्टर का निवेश भी जरूरी है। संगठित क्षेत्र, जैसे कॉरपोरेट सेक्टर, में महज 5 प्रतिशत लोग ही काम करते हैं। लेकिन वहां 80 प्रतिशत तक निवेश होता है। इसी वजह से यह असंतुलन है। अगर खाद्य संकट को हल करना है, तो कृषि सुधार की नीतियों को तव्वजो देना ही पड़ेगा।
सरकार आज कॉरपोरेट सेक्टर के दबाव में है। पर कृषि को कॉरपोरेट कृ षि की तरह न देखा जाए तो बेहतर है। यदि कृषि क्षेत्र में सरकारी निवेश बढ़े और इसमें बुनियादी संरचना का विकास हो (मसलन सड़कों, सिंचाई, वाटरशेड प्रोग्राम, बायोमास डेवलपमेंट आदि) तो इसका सकारात्मक असर होगा। इससे हम आत्मनिर्भर हो सकेंगे। गांधी जी ने कहा था कि अंतिम व्यक्ति को पहले राहत चाहिए। आज इसी बात को अमल में लाए जाने की जरूरत है।
बायो ईंधन के लिए फसलों का उपयोग भी खाद्य संकट की एक वजह है। हालांकि हमारे देश में यह प्रयोग उस कदर नहीं हो रहा, जितना विदेशों में है। कुछ देश ईंधन में काम आने वाली फसलों की पैदावार पर ही जोर दे रहे हैं, जिससे असंतुलन की-सी स्थिति बन रही है, जो सही नहीं है।