ऐसा कहा जा रहा है कि जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल होने की वजह से ‘दी परफेक्ट स्टॉर्म’ (1997 में यह मुहावरा इसी नाम की एक किताब से लिया गया था) मुहावरे पर रोक लगा दी जानी चाहिए।
फिर भी यह सवाल उठाना गलत नहीं होगा कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था वाकई में ऐसे ही तूफान की ओर बढ़ने का संकेत दे रही है। भले ही देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली सभी प्रतिकूल ताकतें एक समय में न आई हों, पर एक-एक कर आने के बाद भी इनका असर जोरदार हो सकता है।
तो आखिर इस तूफान को बल प्रदान करने वाले तत्व कौन कौन से रहे हैं? निश्चित तौर पर पहला तत्व तो पिछले एक साल के दौरान तेल की कीमतों में आया जबरदस्त उछाल रहा है। इस दौरान तेल की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं। और तो और हाल फिलहाल कीमतों के घटने की कोई गुंजाइश नहीं है और भारत आयातित तेल पर निर्भरता को कम करेगा, इसकी संभावना भी नहीं के बराबर है।
इसके परिणाम भी भयावह दिख रहे हैं: महंगाई की दर का दहाई के आंकड़े को छूना, बढ़ता कारोबारी घाटा, दिन पर दिन चढ़ता राजकोषीय घाटा। वर्ष 1991 के बाद से ही भारत का मैक्रोइकोनॉमिक्स संतुलन इस तरह से नहीं गड़बड़ाया है। पर प्रतिकूल प्रभावों का सिलसिला यहीं रुक जाता तो क्या बात थी। महंगाई की दर जिस रफ्तार से बढ़ी है, उसकी वजह से ही रिजर्व बैंक को ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ी है (आने वाले समय में इसमें और बढ़ोतरी की उम्मीद की जा सकती है)।
पर अगर इसका असर विकास दर पर पड़ता है तो बहस छिड़नी स्वाभाविक है। फिर भी महंगाई के हिसाब से बैंकों में जमा खातों पर मिलने वाले ब्याज की दर अब भी नहीं बढी है। निश्चित है कि इन्हें भी आने वाले समय में इन्हें बढ़ाना ही होगा नहीं तो बैंकों को नकदी की कमी से जूझना होगा। राजकोषीय घाटा बढ़ने के बावजूद अगर ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं तो यह नुकसानदायक हो सकता है।
देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाला तीसरा कारक वैश्विक स्तर पर नकदी का बढ़ना है। नकदी बढ़ने की वजह से ही कमोडिटीज की कीमतों में तेजी आई है और सीमेंट, स्टील, कागज, कार और दूसरे टिकाऊ उपभोक्ता सामानों के दाम बढ़े हैं। एक बार फिर ऐसा कोई मर्ज नजर नहीं आता जिससे नकदी की समस्या से तत्काल कोई समाधान मिल सके। ऐसा इसलिए, क्योंकि अत्यधिक नकदी की एक बड़ी वजह अमेरिका रहा है।
अब आप इस स्थिति को वैश्विक आर्थिक मंदी, अमेरिकी बाजार में वित्तीय संकट और पूंजी बाजार पर उसके असर से जोड़ कर देखें, आपको पता चलेगा कि जैसा सोचा जा रहा था, हालात उससे भी बदतर हो चुके हैं। पूंजी बाजार पर इसका सबसे पहला असर देखने को मिला है: शेयर कारोबार वॉल्यूम में 50 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है। प्राथमिक बाजार का हाल बुरा है और ऐसा माना जा रहा है कि शेयर बाजार में और गिरावट जारी रहेगी।
फिर भी दूसरे देशों की तुलना में भारत एक महंगा बाजार है और चूंकि प्रॉफिट मार्जिन का गिरना तय है तो इस हिसाब से दबाव भी कुछ कम है। इस कॉकटेल में आखिरी तत्व अस्वीकृति है जिसमें ज्यादातर लोग जी रहे हैं। दरअसल, पिछले पांच सालों में अर्थव्यवस्था में इतनी बेहतर स्थिति होने के कारण सहसा लोगों के लिए मौजूदा हालात को अपना पाना अटपटा सा लग रहा है।
सभी सर्वेक्षण इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि कारोबार और उपभोक्ता के मिजाज दोनों ही में नरमी है। पर इस सच्चाई को समझने और फिर इसे स्वीकार करने में थोड़ा समय लगेगा, यह तय है। इन पूरे हालात के बीच अगर कोई राहत वाली बात है तो वह कर वसूली में बढ़ोतरी है, कंपनियों की बैलेंस शीट सुधरी है, प्रॉफिट मार्जिन घटने के बावजूद बैंकों के पास कंपनियों को कर्ज देने के लिए पैसा है। माना कि यह सब सच है फिर भी अगर कोई तूफान के इन संकेतों को नहीं समझ पा रहा है तो उसके लिए खतरा हो सकता है।