मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन को प्रवासी भारतीयों के मंत्रालय की ओर से भारतवंशियों और प्रवासी भारतीयों के वास्ते एक यूनिवर्सिटी शुरू करने का काम दिया गया है जिसमें उनके लिए 65 फीसदी सीटें आरक्षित रहेंगी।
भारतीय मूल के लोगों (पीआईओ) के लिए एक अलग यूनिवर्सिटी खुलने जा रही है। मणिपाल यूनिवर्सिटी वर्ष 2011-12 तक इस विश्वविद्यालय को खोल देगी। इसमें 600 करोड़ रुपये का खर्चा आएगा। मणिपाल यूनिवर्सिटी ने इस योजना से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर ली है और इस महीने के आखिर तक वह इस प्रोजेक्ट रिपोर्ट को प्रवासी भारतीयों के मंत्रालय को सौंप देगी।
परिभाषा के मुताबिक प्रवासी भारतीय (एनआरआई) वह भारतीय नागरिक है जो किसी दूसरे देश में जाकर बस जाता है जबकि भारतीय मूल के व्यक्ति (पीआईओ) वे हैं जिनका जन्म भारत से बाहर हुआ है। केरल, पंजाब, गुजरात, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा एनआरआई और पीआईओ हैं।
मंत्रालय ने विदेशों मंर बसे भारतीय मूल के छात्रों के लिए यूनिवर्सिटी बनाने के लिए मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन (माहे) ट्रस्ट में भरोसा दिखाया है। दरअसल पीआईओएनआरआई के लिए विशेष यूनिवर्सिटी खोलने का सुझाव सबसे पहले प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने दिया था।
उन्होंने 2006 के प्रवासी भारतीय दिवस के दौरान इस बात का जिक्र किया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि ऐसे लोगों के लिए एक ऐसी यूनिवर्सिटी बनाई जाए जिसमें कई विषयों की पढ़ाई कराई जाए और इस यूनिवर्सिटी में इन लोगों के लिए सीटें आरक्षित की जाएं। फिलहाल भारतीय विश्विद्यालयों में पीआईओ और एनआरआई के दाखिले को लेकर अलग-अलग कायदे-कानून बने हुए हैं।
एक अनुमान के मुताबिक दुनिया के लगभग 130 देशों में भारतीय मूल के 2.5 करोड़ लोग (पीआईओ) हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में 1,133 विश्वविद्यालयों की और जरूरत पड़ेगी। भारत में मौजूदा 367 विश्वविद्यालयों में 18 से 24 साल के छात्रों में से 7 फीसदी का ही दाखिला हो पाता है।
अनुमान के तौर पर देश में इस समय तकरीबन 100 देशों से आए 40,000 विदेशी छात्र (एनआरआई और पीआईओ को मिलाकर) पढ़ाई कर रहे हैं। इसमें भी इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस, नई दिल्ली के जरिये 2,000 विदेशी छात्रों को भारत सरकार की स्कॉलरशिप मिल रही है।
एक विश्लेषक का कहना है, ‘ऐसे देशों में जहां शिक्षा व्यवस्था बहुत कमजोर है या फिर बहुत सीमित है, ऐसे विकासशील देशों के अधिकतर छात्र अपनी शैक्षिक जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत का रुख करना पसंद करते हैं। वहीं अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में जहां उच्च शिक्षा खासी महंगी है, वहां के छात्र भी डिग्री लेने के लिए भारत को तरजीह दे रहे हैं।’
माहे, प्रस्तावित विश्वविद्यालय को 200 एकड़ जमीन में दो चरणों में विकसित करेगी। यह विश्विद्यालय पूरी तरह से स्व-वित्त पोषित होगा जिसमें 50 फीसदी सीटें पीआईओ के लिए, 15 फीसदी सीटें एनआरआई के लिए और बाकी भारतीय छात्रों के लिए होंगी। पहले चरण में इंजीनियरिंग, सूचना प्रौद्योगिकी, मानविकी, बायोटेक्नोलॉजी, और एमबीए जैसे पाठयक्रम चलाए जाएंगे साथ ही 100 सीटों वाला एक मेडिकल कॉलेज भी खोला जाएगा जिसके साथ में ही मल्टी स्पेशिएलटी हॉस्पिटल भी बनेगा।
यह विश्वविद्यालय एक विशेष ट्रस्ट द्वारा चलाया जाएगा जिसमें एनआरआई बतौर ट्रस्टी शामिल रहेंगे। पाठ्यक्रमों की फीस विदेशी मुद्रा में ली जाएगी, यहां तक कि भारतीय छात्रों को भी विदेशी मुद्रा में ही फीस चुकानी पड़ेगी। वर्तमान में भी मणिपाल यूनिवर्सिटी की फीस दूसरे विश्वविद्यालयों की तुलना में काफी अधिक है।
मणिपाल यूनिवर्सिटी एनआरआई और पीआईओ छात्रों से जहां 8.6 लाख रुपये वसूल कर रही है तो दूसरे भारतीय विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों से 4.8 लाख रुपये वसूल कर रहे हैं। गौरतलब है कि प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्री वयलार रवि ने मई 2008 में पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि सरकार एनआरआई और पीआईओ के लिए बनने वाले विश्वविद्यालय में बिलकुल भी निवेश नहीं करेगी।
उन्होंने इतना जरूर कहा था कि सरकार कई तरह के दूसरे मामलों में जरूर मदद करेगी। बिजनेस स्टैंडर्ड ने अक्टूबर 2006 में ही बता दिया था कि प्रवासी भारतीयों का मंत्रालय इस तरह की योजना पर काम कर रहा है और इसमें माहे ट्रस्ट महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है।