ओलंपिक में भारत को पहली बार तीन पदक मिले हैं, जिसे लेकर देशवासी उत्साह से लबरेज हैं।
हालांकि अगर पदक तालिका पर गौर करें तो यह संख्या काफी कम है। पदक जीतने वाले देशों की सूची में भारत इस समय 42वें स्थान पर है, जबकि चीन को 79 अमेरिका को 81 और रूस को 45 पदक मिले हैं, जो भारत से बहुत आगे हैं। लेकिन दूसरी नजर से देखें तो आधा गिलास भरा नजर आता है, बजाय इसके कि आधा गिलास खाली है।
सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार के समर्थन के बगैर यह जीत मिली और नाउम्मीदी के बीच भारत के प्रतिस्पर्धी पदक लेकर आए। उन्होंने यह सब कुछ कमोबेश अपने दम पर किया। परंपरागत रूप से भारतीयों को जिस तरह का समर्थन मिलता है, कुछ वैसा ही समर्थन इन विजेताओं को मिला। उनके अपने परिवार वालों, मित्रों, शुभचिंतकों और छोटे शहरों के- उनके समुदाय के लोगों ने उनका साथ दिया।
खेल की रिपोर्टिंग करने वाले कुछ सहयोगी उस अखाड़े में गए, जहां पर कांस्य पदक विजेता सुशील कुमार कुश्ती लड़ता था। दिल्ली के उस अखाड़े की स्थिति और प्रशिक्षण की सुविधाएं इतनी घटिया हैं कि उसे देखकर दुख होता है। पहलवान जहां पर कुश्ती लड़ते हैं, वहां चूहों ने बड़े बड़े बिल बना रखे हैं और पहलवानों का साथ देने के लिए वहां पर हमेशा चूहे और तिलचट्टे मौजूद रहते हैं।
इस तरह के अखाड़े में अत्याधुनिक सुविधाएं जैसी कि जिम में होती हैं, या आहार विशेषज्ञ या मानसिक प्रशिक्षक (फिटनेस साइकोलॉजिस्ट) होना तो सपने देखने जैसी बात होगी। खास बात यह भी है कि भिवानी के मुक्केबाजों की तरह सुशील ऐसे परिवार से भी नहीं है, जहां के खिलाड़ियों के परिवार में उस खेल के प्रशिक्षक हों। उसके पिता वाहन चालक हैं, उसका भाई साधारण कद काठी का सामान्य सा लड़का है।
इन विपरीत परिस्थितियों में सुशील ने जो सफलता हासिल की है उसे असाधारण ही कहा जा सकता है। शायद किसी ने भी नहीं सुना होगा कि कभी कुश्ती संघ ने कुछ किया हो, इन सब खामियों के बावजूद सुशील कुमार की विजय हुई। ऐसी हालत में उसका पदक लेकर लौटना उसकी व्यक्तिगत इच्छाशक्ति के कारण ही संभव हो सका।
हरियाणा का भिवानी जिला इस समय ‘छोटा क्यूबा’ के रूप में विख्यात हो चुका है। वहां के लड़कों विजेंदर और अखिल कुमार को कम से कम अपने परिवार और मित्रों और यहां तक कि वहां के स्थानीय समाज का समर्थन मिलता रहा। हालांकि अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि भिवानी में कब, कैसे और क्यों मुक्केबाजी के प्रति रुझान शुरू हुआ।
लेकिन यह हकीकत है कि वहां पर मुक्केबाजी को लेकर लोगों में एक जुनून और प्रतिबध्दता है। विजेंदर के भाइयों और चाचा ने मुक्केबाजी का प्रशिक्षण लिया था और यह परंपरा आगे बढ़ती गई। अब तो हरियाणा के इस छोटे से कस्बे में इसका प्रचलन बढ़ गया है और यह एक परिवार से निकलकर वहां के कई परिवारों तक अपनी पहुंच बना चुका है।
हकीकत यह है कि लक्ष्मी मित्तल ट्रस्ट से युवकों के प्रशिक्षण के लिए थोड़ा सा धन पाकर वहां का पूरा समुदाय ओलंपियन बनने की फिराक में है। खेल जगत के इतिहासकार हो सकता है कि कोई ऐसा सूत्र जोड़ सकें, जिससे भिवानी और मुक्केबाजी के बीच कोई संबंध निकलकर सामने आ जाए, लेकिन सामाजिक मानववैज्ञानिकों को इस गुमनाम से कस्बे से विश्वस्तरीय मुक्केबाज मिल सकते हैं।
इसके लिए सामूहिक उद्देश्य और लक्ष्य, संरक्षण और आत्मविश्वास बहुत जरूरी है, जिससे यहां के बेटों को नई ऊंचाइयां मिल सकें। उत्तर भारत में हरियाणा का बाजार वहां के नेताओं के स्वार्थपरक और आयाराम गयाराम स्वभाव के चलते धूल-धूसरित हो गया था, जो एक बार भिवानी के लड़कों के चलते फिर चमक उठा है। एक और ओलंपियन की बात करते हैं, जिसने भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया है।
26 साल के अभिनव बिंद्रा ने यह उपलब्धि हासिल कर देश का नाम रोशन किया है। लेकिन इसका एक स्याह पहलू यह है कि कितने ऐसे माता-पिता हैं जो अपने बच्चे के लिए अपने घर में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर कीवातानुकूलित शूटिंग रेंज बनवा सकते हैं, जिससे कि उनके बच्चे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने लायक बन सकें? क्या यह व्यक्तिगत संसाधनों से संभव है? इसका श्रेय भारतीय परिवारों को जाता है, जिनकी वजह से हमें यह सफलता हासिल हुई।
एक दशक से ज्यादा समय से बिंद्रा के माता पिता उसे वह सब कुछ मुहैया करा रहे थे, जिससे वह निशानेबाजी की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में भाग लेने योग्य बन सके। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं, यहां तक कि सिडनी और एथेंस ओलंपिक को लक्ष्य बनाकर उनके द्वारा संसाधन उपलब्ध कराए गए, जिसका परिणाम हुआ कि अभिनव बिंद्रा ने पेइचिंग ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीत लिया। यह एक ऐसे परिवार की भावनात्मक कहानी है, जिसने पारिवारिक स्तर पर विजेता तैयार किया और उनकी कोशिशों से स्वर्ण पदक हासिल करने में कामयाबी मिली।
अब नजारा देखिए कि जो खिलाड़ी जीतकर देश में वापस लौट रहे हैं उन पर पैसे लुटाए जा रहे हैं। चाहे वह सार्वजनिक या निजी कंपनियां हों या सरकारें, सभी खिलाड़ियों को नकद पैसा दे रही हैं। ऐसे भी राज्य नकद पुरस्कार की घोषणा कर रहे हैं जो अध्यापकों की तनख्वाह देने में सक्षम नहीं हैं और दिवालिया से नजर आते हैं। इसे उस स्थिति में ही सही ठहराया जा सकता था, जब खेल प्राधिकरणों जैसे पटियाला के प्रशिक्षण संस्थान को विश्वस्तरीय और ओलंपिक के स्तर का बनाया जाता।
ऐसी स्थिति में जब कि प्रमुख प्रशिक्षण संस्थान भी ओलंपिक को देखते हुए स्तरहीन हैं, कोई भी विजेता नहीं तैयार कर सकता और न ही वैसी तैयारी करा सकता है जिससे कि हमारे देश के युवक ओलंपिक खेलों में कड़ी टक्कर दे सकें। ओलंपिक में अप्रत्याशित जीत के बाद अभिनव बिंद्रा ने कहा था, ‘लेकिन भारत में ओलंपिक के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है।’
बिंद्रा का यह छोटा सा वक्तव्य नख से शिखा तक प्रहार करता है। भारत में ओलंपिक पदक आने के पीछे खिलाड़ियों के परिवार, उनकी व्यक्तिगत कोशिशों और उनके समुदाय की ही अहम भूमिका रही है। इसमें राज्य की भूमिका बहुत कम, या कहें कि नहीं के बराबर रही है।