तीन महीने में चीजें कितनी बदल जाती हैं न? अभी तो मार्च की शुरुआत तक हम 9 फीसदी की विकास दर पर सीना फुलाए घूम रहे थे।
महंगाई की दर भी फरवरी के आखिरी हफ्ते तक ‘केवल’ 5 फीसदी के ‘ठीक-ठाक’ स्तर पर थी। वित्त मंत्री पी. चिंदबरम भी लोकलुभावन बजट पेश करने के बाद काफी खुश नजर आ रहे थे। वह बड़े आत्मविश्वास के साथ विकास के बारे में यह बताते घूम रहे थे कि मुल्क नौ फीसदी की ‘जबरदस्त रनरेट के साथ बैटिंग’ करता रहेगा।
सब प्राइम संकट से विकसित देश भले ही परेशान रहे हों, लेकिन इसका हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था पर बेहद कम प्रभाव दिख रहा था। साथ ही, ओईसीडी देशों की कम विकास दर का भी असर अपने वतन में होता दिखाई नहीं दे रहा था। यह बात सच है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के तिलिस्म को तोड़ चुकी थी, लेकिन भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत जस की तस थीं।
सरकारी तेल कंपनियां अपने घाटे के जरिये और सरकार तेल बॉन्ड्स के रास्ते इसकी कीमत चुका रही थी। हालांकि, कुछ अर्थशास्त्रियों ने इस साल के राजकोषीय रूप से कमजोर लोकलुभावन बजट की कड़ी निंदा की थी। उनका कहना था कि इसमें तेल, उर्वरकों और खाद्य पदार्थों पर सब्सिडी की घोषणा तो कर दी गई थी, लेकिन उसकी उगाही कैसे होगी, इस बारे में सरकार ने चुप्पी साध ली थी। इसमें किसी प्रकार के सुधार की भी बात नहीं की है।
उनके मुताबिक कर्जमाफी योजना की वजह से अब आगे बैंक कृषि सेक्टर में कर्ज देने से हिचकेंगे। लेकिन भाई साहब, अर्थशास्त्रियों की सुनता कौन है? लोग तो अपनी मस्ती में झूम रहे थे। लेकिन आज तीन महीने के बाद तस्वीर बिल्कुल बदल चुकी है। रोजाना अखबारों की सुर्खियों पर नजर दौड़ाएं तो हर कहीं विकास दर कम होने के संकेत मिल रहे हैं। सिर्फ सरकार और रिजर्व बैंक को ही अभी तक उम्मीद है कि 2009-09 में विकास दर 8.5 से लेकर 9 फीसदी तक की रहेगी।
ज्यादातर स्वतंत्र विश्लेषकों का मानना है कि असल में इस साल विकास दर केवल 7 से लेकर 8 फीसदी तक के ही बीच में रहेगी। इनमें से भी ज्यादातर लोगों का यही मानना है कि विकास दर केवल सात फीसदी के ही आस-पास रहेगी। शेयर बाजार गर्दिश में हैं और शेयरों की कीमत जमीन की धूल फांक रही हैं। लेकिन सबसे तगड़ा झटका लगा है, आसमान छूती महंगाई को देखकर।
मार्च के मुकाबले जून के पहले हफ्ते में यह 11 फीसदी के दुखदायी स्तर तक पहुंच चुका था। हालांकि, महंगाई के इस दानव को साधने के लिए राजकोषीय, मौद्रिक और प्रशासनिक नियमों की एक पूरी फौज खड़ी कर दी गई है, लेकिन इसके आतंक से कोई राहत मिलती नहीं दिखती। अब तक महंगाई के चढ़ने की असल वजह खास तौर पर खाद्यान्न, धातु, उर्वरकों और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में आया उछाल है।
माना कि बढ़ती महंगाई की असल जड़ विदेशों में छुपी हुई है, लेकिन इससे तो हमारे मुल्क के ही आम लोगों का जीना मुहाल हो रहा है। सरकारी खजाने की बुरी हालत से भी सारा मजा किरकिरा हो चुका है। फरवरी में बजट पेश करते वक्त जब चिदंबरम साहब ने 2008-09 के लिए जीडीपी के 2.5 फीसदी के बराबर राजकोषीय घाटे रहने की घोषणा की थी, तब यह आसान लक्ष्य लग रहा था।
लेकिन फिर मार्च आया और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन, उर्वरक और खाद्य पदार्थों की कीमतों में इजाफा होने, लेकिन अपने मुल्क में इन चीजों की कीमत नहीं बढ़ाई गई। इसलिए इन चीजों पर सब्सिडी भी बढ़ता गया। आंकड़ों की मानें तो अब तक जीडीपी का करीब 3 फीसदी तेल पर, 2 फीसदी उर्वरक पर और शायद एक फीसदी खाद्यान्न सब्सिडी देने पर खर्च हो चुके हैं।
अगर रुपये की कीमत बढ़ा भी देते हैं, तो भी केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा इस साल जीडीपी छह से सात फीसदी के हिस्से के बराबर रहने की उम्मीद है। मौजूदा स्तर पर तो यह 9 से 10 फीसदी के स्तर तक पहुंच सकता है। तेल बॉन्ड जारी करके या इस जैसे दूसरे जरिये अपना करके भी इसके बुरे प्रभावों को कम नहीं किया जा सकता है। न ही यह जानकार विश्लेषकों को बेवकूफ बना सकते हैं।
अप्रैल और मई तक बजट के आंकड़ों तो मुंह चिढ़ाते हुए कई विश्लेषक और वित्तीय संस्थान ऊंचे राजकोषीय घाटे की भविष्यवाणी करने लगे थे। इससे एक बात तो साफ हो रही है कि सरकार आने वाले वक्त में बाजार से काफी पैसा उठा सकती है, जिससे ब्याज दरें और भी बढ़ेंगी। राजकोषीय घाटे के तेजी से बढ़ने की असल वजह दरअसल कच्चे तेल, उर्वरकों और खाद्यान्न की बढ़ती कीमत है। इन्हीं की वजह से विदेशी व्यापार और भुगतान के संतुलन को भी भारी घाटा हो रहा है।
अगर इस साल कच्चे तेल की औसत कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो भारत का जिंस कारोबार घाटा जीडीपी के 20 फीसदी के बराबर होगा। चालू खाते की नजर से देखें तो यह घाटा 4 फीसदी का होगा। यह देखकर कोई हैरत नहीं हो रही है कि चालू खाते के घाटे के बढ़ने के बाद से विदेशी से भारी मात्रा में आने वाले पैसों की समस्या खत्म हो चुकी है।
इस साल के पहले 5 महीनों में विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजारों से करीब 5 अरब डॉलर की मोटी ताजी रकम वापस खींच चुके हैं। अचानक हालत 1987-90 के काले वक्त की याद दिला रहे हैं। सुधारों की गति धीमी पड़ चुकी है, राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है, भुगतान का संतुलन भी असंतुलित हो चुका है और राजनीतिक रूप से देश में उथल-पुथल मचा हुआ है।
हालांकि, हालात इतने बुरे भी नहीं हुए हैं। इसकी तीन वजहें हैं। पहली बात तो यह है कि रिजर्व बैंक के पास आज की तारीख में 300 अरब डॉलर का मोटा ताजा विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। अगर हालत ज्यादा नहीं बिगड़े तो हम कुछ सालों तक वित्तीय उथल-पुथल को बड़े आराम से सह सकते हैं। दूसरी बात यह है कि मुल्क का प्राइवेट सेक्टर 20 साल पहले के मुकाबले आज काफी अच्छी हालत में है।
कम से कम सिध्दांत में ही सही, लेकिन हम आर्थिक जगत में तात्कालिक उथल पुथल को तो सह ही सकते हैं। तीसरा यह है कि ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2007-08 के दौरान कुल मिलाकर जीडीपी के 41 फीसदी के बराबर निवेश हुआ।
अगर हम कमजोर हुए भी तो निवेश जीडीपी के 34 या 35 फीसदी से ज्यादा कम नहीं होगा, जिससे हमारे मुल्क की विकास दर कम से कम एक साल तक को 7 फीसदी के आस-पास रहेगी ही। हालांकि, सब्सिडी के बढ़ते बोझ को देखते हुए लग तो यही लग रहा है कि सरकारी खजाने में 4 से 5 फीसदी की कमी आएगी। इससे निवेश में कमी होगी, जिसकी वजह से निवेश और बचत के बीच में एक खाई पैदा हो सकती है।