सपना सा हो गया है कर्ज लेना
अरविंद सक्सेना
सीनियर वाइस प्रेसीडेंट, हुंडई मोटर इंडिया लि.
फिलहाल अर्थव्यवस्था की जो तस्वीर दिख रही है उसमें आम आदमी की मुश्किलें तो बढ़ ही रही है। कुछ दिन पहले तक आम आदमी के लिए घर और कार का सपना पूरा करना थोड़ा आसान था।
लेकिन अब ऐसी स्थितियां नहीं हैं। ये सपने लोन लेकर पूरे किए जाते थे लेकिन यह लोन इतना महंगा हो गया है कि आम आदमी अपनी सपनों के साथ समझौता करने को मजबूर है। इससे आम आदमी की मुश्किलें तो बढ़ी ही हैं और जो उद्योग आम आदमी के बलबूते अपना कारोबार करते हैं उनकी हालत भी खस्ता हो रही है।
पिछले कुछ महीनों से बदली आर्थिक तस्वीर ने ऊंचे विकास दर की उम्मीदों पर तो पानी फेर ही दिया। बढ़ती महंगाई के मद्देनजर भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें बढ़ा दी है। आरबीआई ने रेपो रेट में आधा प्रतिशत और नकद सुरक्षित अनुपात यानी सीआरआर में एक चौथाई प्रतिशत की बढ़ोतरी की हैं।
निश्चित तौर पर इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि रेपो रेट बढ़ाए जाने से खुदरा कारोबार करने वाले बैंकों पर भी ब्याज दर बढ़ने का दबाव बनेगा। इससे होम लोन, निजी लोन और वाहन लोन और महंगे हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में आप यह समझ सकते हैं कि लोन लेना अब आम आदमी के बलबूते से बाहर की चीज हो गई है।
आरबीआई ने महंगाई को काबू में लाने के लिए जो कदम उठाएं हैं उसकी वजह से अल्पावधि का ऋण काफी महंगा हो गया है। अब अगर कोई घर या गाड़ी के सपने देखता है तो यह सपना पूरा करना बेहद मुश्किल हो गया है। जिन लोगों ने पहले से ही बैंक से कर्ज ले रखा है उनके लिए ब्याज की बढ़ती दरों का बोझ और भी ज्यादा बढ़ जाएगा।
मुझे ऐसा लगता है कि ब्याज दर बढ़ने से मांग पर उसका असर साफ तौर पर पड़ेगा। यह असर कार इंडस्ट्री पर तो जबरदस्त रूप से पड़ेगा। अगर लंबे समय तक ऐसी ही स्थिति बरकरार रही तो ऑटोमोटिव क्षेत्र में भी मंदी के आसार नजर आएंगे। जहां तक इस क्षेत्र की वृद्धि दर की बात है उसमें पहले से ही कमी आ चुकी है। सामान्य लोन भी बहुत महंगा हो गया है।
वास्तव में लोन के ब्याज दर का बोझ पिछले साल से ही बढ़ रहा है। इसकी वजह से उपभोक्ताओं के लिए लोन का बोझ उठाना काफी मुश्किल हो गया है। ऑटोमोटिव इंडस्ट्री की मुश्किलें और भी बढ़ जाएंगी। इसकी वजह यह है कि ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में लगभग 70 प्रतिशत खरीद के लिए लोन लिया जाता है।
वे लोन लेकर अपना सामान तैयार करेंगे और अगर उनकी बिक्री नहीं हो पाती है तो उनकी मुश्किलें और भी बढ़ जाएंगी। इस तरह महंगे लोन की वजह से ऑटोमोटिव सेल्स में मंदी आने जैसी स्थिति केवल इसी क्षेत्र की परेशानी तक ही सीमित नहीं है।
अगर होम लोन ही महंगा होगा तो इससे लोगों की खरीद क्षमता पर इसका असर पड़ेगा। उसका असर बढ़कर ऑटोमोबाइल की बिक्री पर और उपभोक्ता टिकाऊं वस्तुओं की बिक्री पर भी पड़ेगी। इसके अलावा भी रियल एस्टेट पर भी इसका ज्यादा असर हो रहा है। इंडस्ट्री की वृद्धि में सकारात्मक नतीजे देखने के लिए यह बेहद जरूरी है कि कर्ज आम आदमी की पहुंच के बाहर न हो और उपभोक्ता आसान शर्तो पर कर्ज लेने में सक्षम रहे।
प्रस्तुति: शिखा शालिनी
बेहतर प्रबंधन से पूरा होगा सपना
रॉबिन रॉय
एसोसिएट डायरेक्टर, प्राइसवाटरहाउस कूपर्स
बैंकों को मजबूरीवश ब्याज दरों में इजाफा करना पड़ा है। यह तथ्य तो सभी जानते हैं कि व्यावसायिक बैंक, अपने कारोबार के लिए केंद्रीय बैंक से कर्ज लेते हैं। वहीं तेजी से बढ़ती महंगाई को कम करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने कड़ी मौद्रिक नीति अपना रखी है।
व्यावसायिक बैंकों को रिजर्व बैंक से पैसा लेना महंगा पड़ रहा है। ऐसे में वाणिज्यिक बैंकों ने मजबूरी में बढ़ती ब्याज दरों का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल दिया है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बैंकों से कर्ज लेना आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गया है। कर्ज लेने की प्रक्रिया अभी भी आसान बनी हुई है।
ऐसा केवल अभी हाल-फिलहाल में नहीं हुआ बल्कि पिछले सात-साठ साल से बढ़ते उपभोक्तावाद ने रिटेल बैंकिंग के चलन को तेज गति दी है। जरूरत बस इस बात की है कि कर्ज लेते वक्त थोड़ी समझदारी दिखाई जाए। और कर्ज लेने के समय उपभोक्ता को अपनी हैसियत का खयाल जरूर रखना चाहिए नहीं तो उसके और बैंक के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
हमारे देश की तकरीबन 50 से 60 फीसदी आबादी 30 साल से कम लोगों की है। मध्य वर्ग में इसी आयु वर्ग के लोगों के बीच पिछले पांच साल में कर्ज लेने का चलन बहुत बढ़ा है। पहले लोग जिंदगी भर की कमाई को जोड़कर रिटायरमेंट के वक्त मकान बनाने और कार खरीदने के लिए सोचते थे लेकिन आजकल के युवाओं की राय तो एकदम बदल गई है।
वे जल्द से जल्द अपना मकान और कार खरीदना चाहते हैं और इसमें उनकी मदद बैंक कर रहे हैं। बैंक धड़ल्ले से उनको कर्ज दे रहे हैं। बैंकों ने पिछले कई सालों में बड़े पैमाने पर लोन मेले लगाए हैं जिसके जरिये बैंकों ने बड़े पैमाने पर लोगों को कर्ज भी दिए।
दरअसल पिछले कुछ साल में बैंकिंग क्षेत्र में जो तेजी आई है उसकी एक बड़ी वजह रिटेल बैंकिंग ही है क्योंकि बैंक बड़ी कंपनियों या कारोबारी घरानों को जो कर्ज देते हैं, उससे उन्हें उतना फायदा नहीं मिलता जितना कि रिटेल बैंकिंग के जरिये मिलता है। इसलिए बैंकों ने कर्ज देने की प्रक्रिया को आसान कर दिया जिससे कि लोगों को आसानी से कर्ज मिल सके।
बैंकों का भी इसमें फायदा है क्योंकि उनके जितने ग्राहक बनेंगे, उनका मुनाफा भी उतना ही बढ़ेगा। जो लोग बढ़ती ब्याज दरों का रोना रो रहे हैं उसके लिए काफी हद तक तो वे खुद जिम्मेदार हैं और कुछ हद तक बैंक भी। मान लीजिए किसी की कमाई 10,000 रुपये महीना है तो बैंकों ने उसे 1,00,000 रुपये का कर्ज 2,000 रुपये की ईएमआई पर दे दिया लेकिन उस व्यक्ति ने ऐसा ही कर्ज दो और बैंकों से ले लिया।
ऐसे में उसकी कमाई के 6 हजार रुपये तो कर्ज की अदायगी में ही चले गए और बढ़ती ब्याज दरों के साथ ईएमआई का बोझ भी बढ़ता गया। ऐसे में उपभोक्ता की गलती तो इतनी है कि उसने अपनी हैसियत से अधिक कर्ज ले लिया और बैंकों की इतनी कि उनके पास ऐसा कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं होता जिससे यह पता लग जाए कि अमुक व्यक्ति ने कितने बैंकों से कितना-कितना कर्ज लिया हुआ है?
कुछ देशों में बैंक क्रेडिट इनफॉर्मेशन ब्यूरो से ऐसी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं लेकिन भारत में बैंकों को इस तरह की जानकारी मिलना धीरे-धीरे संभव हो रहा है। कुल मिलाकर मेरा यही कहना है कि कर्ज लेना अभी भी आम आदमी की पहुंच में है, जरूरत है सही जानकारी और सही एप्रोच की।
प्रस्तुति: प्रणव सिरोही