रिजर्व बैंक उन मौद्रिक प्राधिकारों में शामिल होना चाहता है जो मुद्रा के इतिहास में एक संभावित बदलाव की अगुआई कर रहे हैं। दुनिया भर के केंद्रीय बैंक इस संभावना का आकलन कर रहे हैं कि कैसे केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्रा (सीबीडीसी) की शुरुआत की जा सकती है। अगर वे आश्वस्त हैं और डिजिटल मुद्रा को पेश करना चाहते हैं तो यह एक बड़ा बदलाव होगा। हालांकि इसके संभावित प्रभाव के बारे में काफी बहस हो सकती है।
जुलाई तक दुनिया भर के 100 देश डिजिटल मुद्रा शुरू करने की संभावनाएं तलाश रहे थे। इस संदर्भ में रिजर्व बैंक ने गत सप्ताह एक अहम कदम उठाते हुए अवधारणा पत्र प्रस्तुत किया। उसने संकेत दिया कि वह किसी भी संभावित उथलपुथल की संभावना को सीमित करने के लिए विभिन्न प्रारंभिक स्तरों से निपटने के बाद इसे चरणबद्ध तरीके से पेश करेगा। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फरवरी 2022 के बजट में यह घोषणा की थी कि डिजिटल रुपया चालू वित्त वर्ष में प्रस्तुत किया जाएगा। रिजर्व बैंक भी इस विषय पर पिछले काफी समय से काम कर रहा है और उसने अक्टूबर 2020 में इसे लेकर एक आंतरिक कार्य समूह गठित किया था।
विभिन्न केंद्रीय बैंकों द्वारा डिजिटल मुद्रा की संभावना तलाशे जाने के पीछे अलग-अलग वजह हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका और जापान जैसे कुछ देश नकदी पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना चाहते हैं। स्वीडन जैसे दूसरे देश जहां नकदी का इस्तेमाल कम हो रहा है, वे इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन का बेहतर विकल्प पेश करना चाहते हैं।
डिजिटल मुद्रा से यह उम्मीद भी की जा रही है कि वह सीमापार के लेनदेन को सस्ता और किफायती बनाएगी। बहरहाल, इसके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा शायद तथाकथित निजी आभासी मुद्राओं का विस्तार हो सकता है जो वित्तीय स्थिरता के लिए खतरा बन सकती हैं। ऐसे में केंद्रीय बैंक चाहते हैं कि मौद्रिक स्थिरता के बचाव के लिए एक व्यवहार्य विकल्प प्रस्तुत किया जा सके जो तकनीक की बदौलत अन्य लक्ष्यों को पूरा करने में भी सहयोग कर सके।
डिजिटल मुद्राओं को अपनाने और उनका प्रबंधन करने के क्रम में कई तरीके अपनाए जा सकते हैं। पर्चे में कहा गया है कि डिजिटल मुद्रा-थोक और डिजिटल मुद्रा-खुदरा जारी करना अधिक उपयुक्त होगा। खुदरा डिजिटल मुद्रा की मदद से जहां सुरक्षित भुगतान किया जा सकेगा वहीं थोक डिजिटल मुद्रा की सहायता से वित्तीय क्षेत्र के निपटान को अधिक किफायती अंदाज में अंजाम दिया जा सकेगा।
इसके अलावा डिजिटल मुद्रा जारी करने के अलग-अलग मॉडल भी हैं। उदाहरण के लिए प्रत्यक्ष मॉडल में केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा के सभी पहलुओं के प्रबंधन के लिए उत्तरदायी होगा। यह मॉडल जोखिम भरा है। इससे न केवल केंद्रीय बैंक का बोझ बढ़ेगा बल्कि वित्तीय मध्यस्थहीनता की स्थिति निर्मित होगी क्योंकि फंड बैंकिंग प्रणाली से बाहर जाएंगे। अप्रत्यक्ष मॉडल में केंद्रीय बैंक बैंकिंग और वित्तीय तंत्र के जरिये वैसे ही डिजिटल मुद्रा जारी करता है जैसा कि वह नकदी के साथ करता है। इनके अलावा एक हाइब्रिड मॉडल भी है।
बहरहाल, इस नोट में उचित ही कहा गया है कि भारत के लिए अप्रत्यक्ष मॉडल को अपनाना बेहतर होगा। इसके अलावा नकदी की तरह डिजिटल मुद्रा ब्याज वहन नहीं करेगी। इसके साथ ही डिजिटल मुद्रा टोकन आधारित या खाता आधारित हो सकती है। टोकन आधारित डिजिटल मुद्रा बैंक नोट की तरह बैरंग तरीके से व्यवहार में लाई जाएगी। खाता आधारित व्यवस्था में मुद्रा और लेनदेन का रिकॉर्ड रखना होगा। डिजिटल मुद्रा को अपनाने में सबसे बड़ी चिंता निजता की होगी।
हालांकि दलील दी जा रही है कि टोकन आधारित डिजिटल मुद्रा का इस्तेमाल छोटे खुदरा लेनदेन के लिए किया जा सकेगा लेकिन यह संभावना है कि डिजिटल लेनदेन फिर भी कुछ निशान छोड़ जाएगा। ऐसे कई मसले हैं जिन्हें हल करना होगा। सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगी तकनीक का इस्तेमाल। रिजर्व बैंक तथा अन्य अंशधारकों को प्रारंभिक परियोजनाओं के दौरान तमाम नयी बातें पता चलेंगी। सारी बातों को ध्यान में रखकर देखें तो आरबीआई का इस मामले में सावधानी बरतते हुए आगे बढ़ना ही उचित होगा। हड़बड़ी करने की कोई जरूरत नहीं है।