भारतीय उद्योग जगत भले ही मानव संसाधन (एचआर) को अपना मजबूत स्तंभ मानता हो लेकिन बिजनेस स्कूलों के छात्रों की सोच इससे जुदा है।
करियर के तौर पर एचआर उनको बहुत अधिक नहीं लुभाता। इसकी बजाय वे फाइनैंस और मार्केटिंग जैसे सामान्य प्रबंधन कोर्स करने को तरजीह दे रहे हैं। आईआईएम लखनऊ के नोएडा कैंपस के मौजूदा बैच के 277 छात्रों में से केवल तीन छात्र ही एचआर में डिग्री हासिल करना चाहते हैं। कुल छात्रों में यह आंकड़ा महज 1.08 फीसदी बैठता है।
गाजियाबाद के इंस्टीटयूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी (आईएमटी) में प्रबंधन के 540 छात्रों में से केवल 30 एचआर में विशेषज्ञता हासिल करना चाहते हैं। इस संस्थान के कुल छात्रों में यह आंकड़ा केवल 5.5 फीसदी बैठता है। पिछले सत्र में इसमें 53 छात्र थे।
आईएमटी गाजियाबाद के निदेशक बी एस सहाय कहते हैं कि इस समय छात्रों में इंटरनेशनल बिजनेस और फाइनैंस का बहुत क्रेज है। इस सत्र में आईएमटी में 60 छात्रों ने इंटरनेशनल बिजनेस को चुना है। केपीएमजी में पार्टनर और हेड (मानव पूंजी सलाहकार सेवा) गणेश शेरमॉन कहते हैं, ‘एचआर लगातार छात्रों की दूसरी पसंद बनता जा रहा है और मार्केटिंग का वर्चस्व और बढ़ता जा रहा है।’
ज्यादातर बिजनेस स्कूलों से इसी तरह के रुझान आ रहे हैं कि छात्र, मार्केटिंग और फाइनैंस में ही प्रबंधन की डिग्री लेने को वरीयता दे रहे हैं। एचआर को परंपरागत तौर पर नियुक्तिओं और प्रशासन से जोड़कर देखा जाता है। उद्योग जगत के एक जानकार के मुताबिक करीब एक दशक पहले तक भारत में मुख्य उद्योग मैन्युफैक्चरिंग ही था, उस वक्त मानव संसाधन बहुत महत्वपूर्ण काम नहीं समझा जाता था।
जैसे-जैसे सेवा क्षेत्र की तस्वीर बदलती गई वैसे-वैसे एचआर की अहमियत भी बढ़ती चली गई। ऐसे में जब बिजनेस स्कूलों में मार्केटिंग और फाइनैंस का चलन जोर पकड़ता जा रहा है तो क्या एचआर विभागों में काम करने वालों की कमी पड़ने वाली है।
एबीसी कंसल्टेंट के सीईओ शिव अग्रवाल इस बात से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि बिजनेस स्कूल कभी भी एचआर में कोर्स करने वालों की पहली पसंद नहीं रहे हैं। टाटा इंस्टीटयूट ऑफ सोशल साइंसेज और जेवियर लेबर रिलेशंस इंस्टीटयूट एचआर मैनेजर्स की पहली पसंद रहे हैं।