एक वक्त था, जब मुल्क में नौकरियों की कमी नहीं हुआ करती थी। लेकिन अब सूरज ढल रहा है। भारत में नौकरी की तादाद उस रफ्तार से घटती जा रही है, जिसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी।
जाहिर है इसका इल्जाम भी मंदी पर जा रहा है। लेकिन हैरत की बात यह है कि अब टेलीकम्युनिकेशन और वित्तीय सेवाओं जैसे उन सेक्टरों में भी लोगों की जरूरत कम हो रही है, जिन्हें आने वाले कल का सूरज माना जा रहा था।
अभी पिछले साल की ही तो बात है, जब ये सारे सेक्टर बड़े उत्साह के साथ लोगों को ज्यादा से ज्यादा नौकरियां मुहैया करवाने के मामले में सीना ठोंक कर दावा किया करते थे। अब इन सेक्टरों ने लोगों की अपनी जरूरतों को कम कर दिया है। अब तो वित्तीय जगत से लोगों को नौकरियों से निकाले जाने या कर्मचारियों की छंटनी किए जाने की खबरें लगातार आ रही हैं।
एक स्टाफिंग सॉल्यूशंस कंपनी, टीमलीज सर्विसेज और साइनोवेट रिसर्च एजेंसी की जुलाई-सितंबर तिमाही के लिए जारी की गई रोजगार संबंधी रिपोर्ट का प्रमुख थीम यही है। इस रिपोर्ट को देखकर पहली नजर में लग जाता है कि कैसे नियोक्ताओं का जोश ठंडा पड़ रहा है। दरअसल, अप्रैल-जून की तिमाही के बारे में इसी सर्वे ने यह बताया था कि टेलीकॉम सेक्टर और वित्तीय जगत से नौकरियों की बारिश बदस्तूर जारी रहेगी। बस तीन महीने में ही सर्वे कंपनियों का जोश ठंडा पड़ गया। जुलाई-सितंबर तिमाही में सर्वे के मुताबिक टेलीकॉम और वित्तीय सेवा सेक्टर में नौकरियों में केवल पांच और 10 फीसदी का इजाफा होगा।
नौकरियों की तादाद में आई कमी और इस तादाद में गिरावट जारी रहने की वजह को सबसे अच्छी तरह से नागरिक उड्डयन सेक्टर को देखकर समझा जा सकता है। कुछ साल पहले उद्योग जगत के बड़े-बड़े पंडित खुलेआम यह भविष्यवाणी कर रहे थे कि 2010 तक भारतीय एयरलाइंस कंपनियों के बेड़े में कम से कम 440 नए हवाई जहाज होंगे। इस वजह से कम से कम 3200 नए पायलटों की जरूरत तो होगी ही।
केबिन क्रू, ग्राउंड स्टाफ और एयरपोर्ट हैंडलिंग स्टाफ की तादाद में तो लोग-बाग अनुमान लगाने से भी डर रहे थे। कहा तो यहां तक जा रहा था कि अकेले केबिन क्रू स्टाफ के लिए अगले तीन-चार सालों में कम से कम 40 हजार नए लोगों की जरूरत पड़ेगी। लेकिन तेल की ऊंची कीमत और जरूरत से ज्यादा क्षमता की मौजूदगी ने सब गुड़ गोबर कर दिया।
हालांकि, संकट के इन बादलों के बीच राहत की किरणें आईटी सेक्टर,, बीपीओ, बुनियादी ढांचा और विनिर्माण व इंजिनियरिंग सेक्टरों के रूप में आई हैं। इन सेक्टरों की कंपनियां मुसीबत के वक्त में भी मुनाफा काट रही हैं। इनकी वजह से ही पिछली तिमाही के मुकाबले जुलाई-सिंतबर तिमाही में रोजगार की संभावित दर कम नहीं हो पाई। लेकिन जमीनी हकीकत पर नजर डालें तो तस्वीर की सारी खूबसूरती गायब हो जाती है। इससे टीमलीज सर्वे की बात ही सच साबित होती लग रही है।
क्षेत्रीय कॉलेजों को ही ले लीजिए, जहां से अब बड़ी कंपनियों ने मुंह मोड़ लिया है। पिछले चार सालों में बड़ी कंपनियों के लिए छोटे शहरों के इन कॉलेज से लोगों को लिया करते थे। कई कॉलेजों के लिए नियोक्ताओं को अपने यहां बुलाने में काफी दिक्कत आ रही है। जो मान-मनौव्वल के बाद आ भी रहे हैं, तो वे ज्यादा वेतन देने की इच्छा नहीं रखते।