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बस इतना सा ख्वाब है

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 2:44 AM IST

जब हम आंध्र प्रदेश के कुवुर गांव में पहुंचते हैं तो वहां 21 वर्षीय नुक्काथोटि कोंडैया हमें मिनरल वाटर पेश करते हैं। साथ ही हमें ताजे फल बढ़िया ढंग से कटे हुए और प्लास्टिक के ग्लासों में कोल्ड ड्रिंक भी मिलती है।


वैसे यह कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन इन सभी चीजों को स्टोर से लाने में कोंडैया को काफी पसीना बहाना पड़ा। कोंडैया के लिए ये अभी भी बहुत बड़ी चीजें हैं। अगले महीने से कोंडैया को एक ट्रेनी के तौर पर विप्रो के सॉफ्टवेयर विभाग में काम करना है, और वह अपने साथ अपनी बीमार मां को भी ले जाएंगे ताकि उनका ठीक ढंग से इलाज हो सके।

हमने बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर कोंडैया से बात की। हमारे इर्द-गिर्द गांव वालों की भीड़ भी जमा हो गई थी। गांव वालों के लिए कोंडैया किसी सिलेब्रिटी से कम नहीं हैं। गांव के बच्चे बड़े होकर कोंडैया जैसा बनना चाहते हैं। छोटी उम्र में ही कोंडैया के सर से उसके पिता का साया उठ गया तो दूसरी ओर उसके भाई-बहनों को भी अकाल मौत ने नहीं बख्शा।

कोंडैया का कहना है कि इन्हीं सब बातों ने उसकी मां की दिमागी हालत बिगाड़ दी है। कोंडैया अपनी मां की अकेली उम्मीद हैं। उनका कहना है कि उनके परिवार पर वक्त हमेशा से बेरहम रहा है।कोंडैया के पिता कुली का काम करते थे। पिता की मौत के बाद कोंडैया ने अपने चाचा के साथ मिलकर कुली का काम भी किया।

वैसे उसके परिवार की सालाना आय मुश्किल से 12,000 रुपये के आसपास रही है। लेकिन कोंडैया की विप्रो में नौकरी लगने के बाद तो हालात पूरी तरह बदल जाएंगे। अब अकेले कोंडैया अपनी नौकरी के जरिये साल भर में 3.5 लाख रुपये कमाएंगे। कोंडैया हंसते हुए कहते हैं कि यह एक खूबसूरत सपने की शुरुआत जैसी है। वह जल्द से जल्द अपनी नौकरी की शुरुआत करना चाहते हैं।

वह हमेशा जवाहर ज्ञान केंद्र के  शुक्रगुजार रहेंगे। जवाहर ज्ञान केंद्र (जे के सी) कार्यक्रम आंध्र प्रदेश सरकार ने वर्ष 2005 में शुरू किया था जिसका मकसद ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चों को सूचना प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और नेटवर्किंग का प्रशिक्षण देना था। इनकी सबसे खास बात यही है कि इनके जरिये प्रशिक्षुओं को सीधे नौकरी मिल रही है।

एक ऐसे देश में जहां शिक्षा को अच्छे भविष्य के साथ जोड़कर देखा जाता है, जे के सी जैसे केंद्र समाज के उस वर्ग  के लिए बेहद फायदेमंद हैं जिनके पास इस तरह का प्रशिक्षण लेने के लिए संसाधन नहीं हैं। नौकरी मिलने की  वजह से ये संस्थान इन दिनों युवाओं के आकर्षण के केंद्र बनते जा रहे हैं।

नेल्लोर के झोपड़ पट्टी वाले इलाके में एक छोटे से मकान में रहने वाले प्रसाद चिंताला की कहानी भी इसी तरह की है। चिंताला के पिता रिक्शाचालक हैं। चिंताला की मां घरों में बर्तन और कपड़े साफ करने का काम करती हैं, जबकि उनके पिता को शराब की लत लगी हुई है।

उनका कहना है कि वैसे मेरे माता-पिता दोनों ही अनपढ़ हैं बावजूद इसके उनकी मां उन्हें पढ़ाना चाहती है। उन्होंने हमें बताया कि उनकी मां, उनको पढ़ाने के लिए ओवर टाइम काम करने को तैयार रही। उन्होंने जिन घरों में काम किया वहां भी टयूशन और स्कूल के बारे में पूछताछ करती रही। 100 वर्ग फीट का एक कमरा ही उन तीनों लोगों के लिए एक मकान है।

यही कमरा उनका बेड रूम है, इसी कमरे में उनकी पूजा होती है और इसी कमरे में चिंताला पढ़ाई करते हैं। चिंताला का कहना है कि  उनकी मां उनके लिए तो नए कपड़े खरीदती है, लेकिन खुद पुराने कपड़े पहनती है। चिंताला को अपनी पहली तनख्वाह का बेसब्री से इंतजार है ताकि वह अपनी मां के लिए कांजीवरम साड़ी खरीद सके। 21 साल का यह नवयुवक ऐसा जरूर कर सकेगा क्योंकि वह अगले महीने ही 3.5 लाख रुपये के पैकेज पर इन्फोसिस में नौकरी करने जा रहे हैं।

चिंताला की मां बताती हैं कि उनका बेटा ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। वह याद करती हैं कि बेटे को पढ़ाने के लिए उनको कितने पापड़ बेलने पड़े। पहले जान-पहचान और रिश्तेदारों में उनका मजाक उड़ाया जाता था, लेकिन अब उनकी नौकरी लगने के बाद ऐसे लोगों को सही जवाब मिल गया है। नेल्लोर से काफी दूर मुंबई का रुख करते हैं। मुबई के ठाणे क्षेत्र में रहने वाले श्रीनिवास मागिडी पिछले एक साल से टीसीएस कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम कर रहे हैं। 

उनके पिता कोयले की खान में काम करते थे और उनकी मां खेतों में मजदूरी करती थीं। मागिडी को अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बात करना पसंद नहीं हैं। चिंताला और कोंडैया की तुलना में वह थोड़ा भाग्यशाली हैं कि वह ऐसे परिवार में पैदा हुए जहां शिक्षा के महत्त्व को समझा जाता है। डिग्री मिलने के बाद मागिडी और उनका परिवार काफी खुश था। लेकिन डिग्री मिलने का उत्साह जल्द ही फीका पड़ गया जब उनको 6 महीने बेरोजगारी झेलनी पड़ी।

मागिडी का कहना है कि उनके घर वालों के लिए वह दौर बेहद मुश्किल था क्योंकि उनकी पढ़ाई की वजह से परिवार कर्ज में डूबा हुआ था। श्रीनिवास याद करते हैं कि  9 घंटे कोयले की खान में काम करने के बाद उनके पिता की हालत कितनी खराब हो जाया करती थी। उनका कहना है कि वह उस सबको याद करके बहुत रोते हैं, उनको इस बात पर गुस्सा आता था कि उन लोगों के पास पैसा क्यों नहीं है।

वैसे जब श्रीनिवास अपने पैरों पर खड़े हुए तो उनके पिता अपने पैरों से चलने में लाचार हो गए। उनकी पहली वरीयता एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में करियर बनाने की थी लेकिन जब उनको टीसीएस में नौकरी मिल गई तो उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी की ओर कदम बढ़ाना ही मुनासिब समझा। अब जबकि श्रीनिवास का सालाना वेतन 3 लाख रुपये है, वह अपने छोटे भाई-बहिनों को पढ़ाने की जिम्मेदारी उठा रहे हैं।

मागिडी का कहना है कि वह अपनी तनख्वाह में से केवल 4,500 रुपये अपने लिए रखते हैं, बाकी तनख्वाह घरवालों के पास और बचत खाते में चली जाती है। उनका कहना है कि काम के अवसरों के लिहाज से मुंबई बढ़िया जगह है, लेकिन यहां खर्च करने के बारे में सोचना पड़ता है।

उसको अफसोस है कि उसके पास पब में जाने, फिल्म देखने और सप्ताहांत पर पार्टी करने के लिए पैसे नहीं बचते हैं। इसलिए वह अपने ऑफिस में ओवरटाइम करते हैं और लंच के लिए केवल 15 मिनट ही खर्च करते हैं। श्रीनिवास को शुरू में ऑफिस के माहौल में ढलने में कुछ दिक्कतें आईं। दरअसल उनकी पृष्ठभूमि की भी इसमें कुछ भूमिका रही।

हैदराबाद में नौकरी करने वाले एक गरीब किसान के  बेटे सुनील कुमार रेड्डी का भी कुछ इसी तरह का अनुभव रहा है। सुनील का कहना है पहले वह अपने परिवार को काफी समय दिया करते थे लेकिन अब उन्हें अपने लिए वक्त की जरुरत महसूस होती है। अब उनको अपनी ‘आजादी’ की चाह है। लेकिन उनका यह भी कहना है कि वह 5 लाख रुपये सालाना जो कमा रहे हैं उसमें उनके परिवार का बहुत योगदान है।

बड़े शहर में रहने के बाद उनके अंदर काफी परिवर्तन आए हैं। अब उनको अपने पर पैसा खर्च करने के बारे में सोचना नहीं पड़ता। वह अपने लिए बेधड़क कपड़े खरीदते हैं, फिल्म देखने जाते हैं और वह सब करते हैं जिसमें उनको आनंद आता है। उनकी अगस्त में शादी होने वाली है और मंगेतर चेन्नई की एक आई टी कंपनी में काम करती हैं। रेड्डी स्वीकार करते हैं कि वैसे उनकी बहनें  दसवीं से आगे नहीं पढ़ पाई थीं लेकिन वह किसी कम पढ़ी लिखी लड़की से शादी करने के मूड में नहीं थे।

अपनी बहनों की अधिक पढ़ाई न होने के  लिए वह अपने आप को कसूरवार ठहराते हैं। उनका कहना है कि वह अपनी बहनों के बच्चों को पढ़ाकर इस कमी को पूरा करने की कोशिश करेंगे। उनकी एक बेटी की भी हसरत है जिसको वह मनमुताबिक पढ़ाना चाहते हैं। नेल्लोर में हमारी मुलाकात श्रीधर से होती है, उनकी योजना भी जल्द ही हैदराबाद का रुख करने की है।

श्रीधर की जिंदगी में मुश्किलें तबसे बढ़ गई जब उनके बस परिचालक पिता की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। पिता की मौत के ठीक एक महीने बाद ही उनकी बहन ने आत्महत्या कर ली। उनकी मां ने घरों में काम करना शुरू किया और कुछ उनके पिता की पेंशन आती है, इसी से घर चलता है। दूसरी ओर श्रीधर अपनी पढ़ाई को जारी रखने के लिए साल दर साल से छात्रवृत्ति मिलने की आस लगाए बैठे हैं।

श्रीधर का कहना है कि जब उन्हें सत्यम से ऑफर लेटर मिला तब उन्होंने सालों बाद अपनी मां को हंसते हुए पाया। वह जल्द ही हैदराबाद में रहने के लिए जाने वाले हैं। उन्हें लगभग 2 लाख रुपये का कर्ज भी लौटाना है। श्रीधर अकेले ही हैदराबाद नहीं जाएंगे बल्कि उनकी मां भी उनके साथ जाएंगी। उनका दोस्त हेमचंद भी कुछ इसी तर्ज पर सोच रहा है। हेमचंद भी सत्यम कंपनी के लिए बतौर कंप्यूटर इंजीनियर हैदराबाद जाएगा और उनको 3 लाख रुपये सालाना का वेतन मिलेगा।

उनका कहना है कि वह अपने दादा को छुट्टी पर ले जाने की सोच रहे हैं। हेमचंद के पिता को कारोबार में नुकसान होने की वजह से तगड़ा मानसिक झटका लगा। उनका कहना है कि उस समय में दादा की पेंशन से ही परिवार ने जैसे-तैसे गुजारा चलाया था। कई बार ऐसा होता है कहानियों का अंत हो पाना मुश्किल होता है। लेकिन चिंताला, मागिडी, रेड्डी, श्रीधर और हेमचंद जैसे छिपे हुए हीरो की कहानी से प्रेरित होने का वक्त आ गया है। उनकी परिवार की कमाई कम थी। उनके वक्त ने अब रफ्तार पकड़ ली है, अब देखना है कि यह कहां जाकर रुकती है।

श्रीनिवास मगाडी: वह आंध्र प्रदेश के सबसे पिछड़े इलाके के  एक गांव मंचिरियाल से आते हैं। फिलहाल मुंबई में टीसीएस में काम करते हैं। अभी भी बड़े शहरों की जिंदगी से उतने रूबरू नहीं हैं। उनके वेतन से ही उनके भाइयों की पढ़ाई हो पा रही है और उनके पिता जो कोयला खान के मजदूर हैं उनके लिए भी दवाइयों का इंतजाम हो जाता है। 

प्रसाद चिंताला: उनकी मां लोगों के घरों में काम करती हैं और पिता रिक्शा चलाते हैं। अब इन्फोसिस के सॉफ्टवेयर डिर्पाटमेंट में आने के बाद चिंताला की हसरत है कि वह पुराने कपड़ों में अपनी गुजर करने वाली मां और पिता के लिए नए कपड़े खरीदें।

नुक्काथोटि कोंडैया: जब उनके पिता गुजर गए तब उन्हें मां के साथ अपने चाचा के एक कमरे वाले घर में रहना पड़ा। उस समय घर की सालाना आय थी महज 12000 रुपये। जल्द ही कोंडैया विप्रो में शामिल हो जाएंगे और उनकी सालाना आय होगी 3.5 लाख प्रतिवर्ष।

हेमचंद: उनकी पढ़ाई दादा जी की पेंशन की वजह से बड़ी मुश्किल से पूरी हुई। सत्यम में शामिल होने के बाद उनकी इच्छा दादाजी को कहीं छुट्टी पर ले जाने की है।

श्रीधर: उनके पिता बस कंडक्टर थे और एक्सीडेंट में उनकी मौत हो गई। उसके बाद बहन ने भी खुदकुशी कर ली। सत्यम में शामिल होने के बाद उनकी इच्छा है कि वह दो लाख रुपये का कर्ज जल्द चुका दें।

सुनील कुमार रेड्डी: अपने परिवार में एकमात्र शिक्षित। रेड्डी जिस गांव के हैं वहां बस भी नहीं जाती। पिछले दो साल से हैदराबाद में कंप्यूटर एसोसिएट्स में काम कर रहे हैं। उन्हें कपड़े खरीदने और फिल्में देखने का काफी शौक है। अगस्त में उनकी शादी एक आईटी प्रोफेशनल से होने वाली है।

First Published : May 30, 2008 | 10:58 PM IST