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विकास का इंजन बनती जमीन

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 4:02 PM IST

क्या भारत के बुनियादी ढांचे की समस्याओं का समाधान रियल एस्टेट का तेज विकास है? हाल के कुछ नजीरों पर गहराई से गौर करें तो कुछ ऐसा ही लगता है।


2006-07 में दिल्ली मेट्रो ने मुसाफिरों से होने वाली कमाई से ज्यादा पैसे तो स्टेशनों पर मौजूद जगह को किराए पर चढ़ाकर कर कमा लिए। उसने अपने यातायात किराये से 233 करोड़ रुपये कमाए, जबकि रियल एस्टेट क्षेत्र से 252 करोड़ रुपये की कमाई की। उसके पिछले साल तो मेट्रो ने रियल एस्टेट की बिक्री और उसे पट्टे पर देकर इससे भी ज्यादा, तकरीबन 296 करोड़ रुपये की कमाई की थी।

हैदराबाद मेट्रो का निर्माण निजी क्षेत्र की कंपनियां कर रही हैं. जिस पर राज्य सरकार को एक पैसा भी नहीं खर्च करना पड़ रहा है। इसके निर्माण के बाद व्यावसायिक कार्यों के लिए दसियों लाख वर्गफुट जमीन मिलेगी, जिससे मोटी कमाई हो सकती है। दिल्ली एयरपोर्ट परियोजना में भी कुछ ऐसा ही होने जा रहा है।

यहां भी निर्माण के बाद इस पर आने वाले खर्च का एक भारी-भरकम हिस्सा जमीनों को पट्टे पर देने और बेचने से उगाहा जाएगा। इस जमीन पर बाद में होटलों, दफ्तरों और एयरपोर्ट से संबंधित कंपनियों को व्यावसायिक उपयोग के लिए दिया जाएगा। स्वाभाविक है कि इसमें खतरे भी बहुत हैं। खासकर उस समय विवाद होता है जब रियल एस्टेट के सौदे ब्लैक मनी के शामिल होने की पूरी उम्मीद होती है।

अब बेंगलुरु-मैसूर हाइवे के मामले को ही ले लीजिए। एक निजी कंपनी को इसके निर्माण का ठेका दिया गया। मतभेद तब उभरे जब यह आरोप लगा कि कंपनी को हाइवे के अगल-बगल की बहुत ज्यादा जमीन सौंप दी गई है, जिसे कंपनी को रियल एस्टेट के रूप में विकसित करने का अधिकार दिया गया।

हो तो यह भी सकता है कि कंपनियां बोली लगाते वक्त काफी ऊंची बोली लगा दें और बाद में उनके लिए पैसे उगाहना मुसीबत का सबब बन जाए। वैसे, अब यह टे्रंड तेजी से बढ़ रहा है। दिल्ली ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन को उम्मीद है कि वह दिल्ली में मौजूद अपने बस डिपो को मल्टी पर्पस सेंटर के रूप में विकसित करके अपने घाटे को पाट सकता है।

2010 के कॉमनवेल्थ खेल को देखते हुए यमुना के किनारे अपॉर्टमेंट्स बनाए जा रहे हैं, जिसमें खेलों के दौरान एथलीट रहेंगे। बाद में उन फ्लैट्स को बेंच दिया जाएगा। कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण विशेष आर्थिक क्षेत्रों को बड़े शहरों के आस-पास ही बनाया गया है, ताकि वे रियल एस्टेट विकास के लिहााज से भी ज्यादा फायदेमंद साबित हों। हालांकि, इसके लिए आईटी पार्कों और इंड्रस्ट्रियल एस्टेटों के रूप में चुकानी पड़ेगी।

हकीकत तो यही है कि आज की तारीख में बड़ी-बड़ी कंपनियों को भी अब ज्यादा से ज्यादा जमीन चाहिए। अब टाटा मोटर की सिंगूर फैक्टरी को ही ले लीजिए, जिसकी जमीन, कंपनी ने बेहद कम कीमत पर राज्य सरकार से खरीदा था। अब तो सॉफ्टवेयर कंपनियां भी सस्ते दामों पर अपनी जरूरत से काफी ज्यादा जमीन खरीद रही हैं।

आज तो हर कंपनी रियल एस्टेट डेवलपर की तरह काम कर रही है, भले ही उनका काम डीएलएफ या यूनिटेक से मिलता-जुलता न हो। उनके पास इसके लिए अच्छे तर्क भी हैं। आखिर हर कोई जानता है कि दुनिया के बड़े हिस्से में बड़े शहरों को ज्यादा पसंद नहीं किया जाता है। तो फिर इन कंपनियों को अपने दफ्तरों के आस-पास की जगह का इस्तेमाल करने की इजाजत क्यों न दी जाए, ताकि वे अपना खर्चा खुद निकाल सकें।

या फिर सरकार को विकास कार्य पर मोटी-ताजी रकम खर्च करनी होगी। अब हैदराबाद मेट्रो को ही ले लीजिए। यहां काम कर रही कंपनियों को दुकानों को बनाने और उन्हें किराए पर चढ़ाने की इजाजत दी गई है। साथ ही, मेट्रो के डिपो पर भी दफ्तर बनाने की इजाजत दी गई है। इसके अलावा, उन्हें कोई और जमीन नहीं दी गई है। कंपनियों को उसी जमीन से अपना खर्च निकालना होगा।

वैसे इस कहानी का दूसरा पहलू भी है। आज सरकार और डेवलपरों ने फ्लैट्स की कीमत इतनी चढ़ा दी है कि लोगों के लिए एक छोटा सा फ्लैट लेना भी टेढ़ी खीर बन चुका है। वैसे, इसी ऊंची कीमत की वजह से ही तो बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं के लिए पैसा आ पाता है।

First Published : August 8, 2008 | 10:59 PM IST