जब आप आर्थिक संकट और महंगाई से चौतरफा घिरे हों, तो खुशी के मारे ‘याहू’ चिल्लाना अच्छी बात नहीं होती।
लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) और उसकी सरकार अपनी कामयाबियों के बारे में सोचे भी नहीं। गठबंधन और केंद्र सरकार, दोनों इस वक्त अपनी कामयाबियों को छोड़ अपनी असफलताओं पर ज्यादा जोर दे रहे हैं।
साथ ही, हर बहस में हिस्सा लेकर वे आग में घी डालने का ही काम कर रही हैं। ऐसा करके सरकार अपनी कब्र खुद खोद रही है। सबसे पहले बात करते हैं, सरकार के आर्थिक प्रदर्शन की। पिछले साल मुल्क ने 9 फीसदी की रफ्तार से विकास किया। मतलब पिछले चार सालों में मनमोहन सिंह के राज में हिंदुस्तान की औसत विकास दर 8.9 फीसदी रही।
मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई सरकार होगी, जो इस जबरदस्त कामयाबी के बारे में जोर-शोर से जनता को बताना पसंद नहीं करेगी। उसके पहले के छह सालों में देश ने केवल 5.9 फीसदी की औसत रफ्तार से विकास किया था। यानी कि इन चार सालों में विकास की रफ्तार में लगभग 50 फीसदी का इजाफा हुआ है।
कृषि को ही ले लीजिए। संप्रग सरकार के दौरान कृषि ने औसतन 3.6 फीसदी की रफ्तार से विकास किया। मतलब इस मामले में भी 50 फीसदी का इजाफा। यह 1980 के दशक के बाद से सबसे अच्छा रिकॉर्ड था, लेकिन कृषि मंत्री ने इस बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। या फिर 1991 के आर्थिक सुधारों पर लगते उन आरोपों को ही ले लीजिए। इनके मुताबिक सुधार अपने साथ विकास तो लेकर आए, लेकिन इससे लोगों को रोजगार नहीं मिला।
मगर 2005 की आर्थिक गणना की मानें तो 1998 के बाद के सात सालों में रोजगार की तादाद में हर साल औसतन 2.78 की दर से इजाफा हुआ है। वहीं 1990-98 के दौरान रोजगार की तादाद में केवल 1.75 फीसदी से इजाफा हुआ है। माना कि 1998-2005 के दौरान सबसे ज्यादा समय में राजग का राज था, लेकिन सरकार के किसी नेता ने भी यह नहीं कहा कि ‘रोजगार बिन विकास’ का कलंक अब धुल चुका है और 2005 के बाद और भी तेजी से रोजगार पैदा हुए हैं।
अब महंगाई के मुद्दे को ही लेते हैं। महंगाई 8.24 फीसदी के स्तर पर है और सरकार बचाव की मुद्रा में है। लेकिन सरकार के किसी नेता ने यह नहीं कहा कि 2004 में जब उन्होंने सत्ता संभाली थी, तब भी महंगाई की दर 7.5-8 फीसदी के स्तर पर थी। भाजपा ने पेट्रोल की कीमतों में हुए इजाफे को आर्थिक आतंक का नाम दिया है, लेकिन अपने शासनकाल में हुए इससे भी बड़े इजाफे को वह क्या नाम देगी।
चुपचाप रहने को कामचोरी की संज्ञा नहीं दी जा सकती। मर्ज काफी अंदरुनी है। 2004 में जब विकास दर 8.5 की थी, राजग ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे के साथ चुनाव में उतरी थी। तब कांग्रेस और उसके साथियों ने इसे एक भुलावे का नाम दिया था। अब वह खुद यह नारा कैसे अपना सकती है। साथ ही, उसने पेट्रोल की कीमतों में इजाफे से लड़ने के लिए मनमोहन सिंह को अकेला छोड़ दिया है और खुद सोनिया और राहुल गांधी के पीछे खड़ी है।