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व्यापार गोष्ठी: छोटे कारोबारियों को निगल जाएंगे मॉल

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 12:40 PM IST

मुनाफाखोर दलालों से राहत मिलेगी
प्रवीर राय, साफ्टवेयर इंजीनियर, लखनऊ


मॉल ने मुनाफाखोरी दलालों से जनता को राहत दी है। इनका रहना जरूरी है। छोटे कारोबारी मौका देख शोषण करते हैं। मॉल आने के बाद ये चेते हैं। अब स्कीम और छूट का लाभ हम सभी को मिल रहा है। खुदरा व्यापारी केवल अपना हित देखते हैं। जनता से कोई सरोकार नहीं है। उदाहरण के लिए देखें तो मॉल में रद्दी दोगुना दामों पर बिक रही है। कबाड़ी जनता को लूट रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा मॉल खुलें तब जनता का भाल होगा। छोटे कारोबारी का दिमाग दुरुस्त करना जरूरी है।

‘समरथ को नाहिं दोष गोसाईं’
हर्ष वर्ध्दन कुमार, डी-5556, द्वितीय तल, गांधी विहार, नई दिल्ली

मॉल की वजह से पिछले चार सालों में करीब 2 करोड़ व्यापारियों का कारोबार बंद हुआ है। नतीजतन कारोबारी आक्रोशित व आंदोलित हैं। हों भी क्यों न उनके समक्ष बेरोजगारी व भुखमरी का सवाल जो उठ खड़ा हुआ है। ऊपर से सरकार कोई ठोस पहल करने की बजाए ‘समरथ को नाहिं दोष गोसाईं’ वाली नीति का पालन कर रही है। भारत एक ‘लोक कल्याणकारी राज्य’ है, जहां प्रत्येक के हितों की रक्षा करना सरकार का दायित्व है। ऐसे में जरूरी तो यही दिखता है कि मलेशिया व पोलैंड की तर्ज पर भारत सरकार भी शॉपिंग मॉल्स रेग्यूलेशन एक्ट अविलंब बनाए ताकि छोटे कारोबारियों और कॉरपोरेट मॉल्स के बीच संतुलन बना रहे।

मॉल में रोजगार की क्षमता कम
डॉ. सूर्य प्रकाश अग्रवाल (डी. लिट्), 44, आदर्श कॉलोनी, मुजफ्फरनगर

देश में फुटकर व्यापार से प्राप्त रोजगार में करीब 5 करोड़ लोग लाभान्वित हो रहे हैं। मॉल में रोजगार देने की क्षमता कम है। भारत में 40 फीसदी लोग अभी भी निम्न मध्यम व निम्न आय वर्ग में आते हैं, जिनकी संख्या 50 करोड़ के आस-पास पहुंच जाती है।

फिलहाल नहीं पड़ेगा मॉल का असर
मनोज कुमार ‘बजेवा’, गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार, उत्तरांचल

छोटे कारोबारियों पर मॉल का ज्यादा असर फिलहाल नहीं पड़ने वाला है। क्योंकि भारत में अच्छी -खासी आय वाले लोग ही मॉलों की ओर आकर्षित होते हैं।

मॉल सामाजिक विनाश को आमंत्रण
डॉ. जी. एल. पुणताम्बेकर, रीडर, वाणिज्य विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश

देश के लगभग 2 करोड़ 20 लाख छोटे कारोबारियों से मिले 4.5 करोड़ रोजगार तथा 20 करोड़ लोगों की आजीविका पर मॉल संस्कृति जैसे संगठित खुदरा व्यापार की गाज आर्थिक ही नहीं, सामाजिक विनाश को भी आमंत्रण है। दुनिया में सर्वाधिक प्रति हजार व्यक्तियों पर 11 खुदरा दुकानें देश में 8 फीसदी रोजगार सृजन करती हैं।

मॉल कर रहे उपभोक्ता को गुमराह
विकास कासट, 373, विवेक विहार, सोडाला, जयपुर

रिटेलिंग एक ऐसा व्यवसाय है, जिसमे छोटे कारोबारियों द्वारा लिया जाने वाला मुनाफा उचित है, लेकिन बड़े उद्योगपतियों एवं मॉल में कुछ वस्तुएं सस्ती बेचकर उपभोक्ता को गुमराह किया जा रहा है।

सरकार भी चाहती है मॉल का जाल
ओ. पी. मालवीय, भोपाल, मध्य प्रदेश

शुरू-शुरू में मॉल का काफी विरोध किया गया था। लेकिन पूरे भारत में मॉलों का ऐसा जाल फैला हुआ है कि सरकार भी इसे बने रहने देना चाहती है।  इससे छोटे कारोबारियों का काफी शोषण हो रहा है।

कम ब्याज पर मिले कर्ज तो बात बने
प्रवीण कुमार हिबड़ेवाल, किराना व्यापारी, हरी की चुंगी, आजमगढ़

छोटा कारोबारी वो सुविधाएं नहीं दे पाएगा, जो ग्राहक को मॉल में मिलेगा। छोटे कारोबारी के पास सीमित पूंजी होती है। सरकार अगर छोटे कारोबारियों को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराए तो कुछ हद तक स्थिति सामान्य हो सकती है।

जगह नहीं ले सकता मॉल
ओंकार नाथ मिश्र, 301, शिवकुटी, इलाहाबाद

छोटे कारोबारियों को मॉल कभी भी प्रतिस्थापित नहीं कर सकते। हालांकि छोटे शहरों में भी इन मॉल के प्रवेश से छोटे कारोबारी कुछ प्रभावित जरूर होंगे। इसलिए सरकार को निरंतर निगरानी रखनी चाहिए।

मॉल कल्चर में भी हैं कुछ खामियां
मोनिका मेहता, अध्यक्ष, द ग्रेट सर्किल एंड स्ट्रेड इंक सांताक्रूज, मुंबई

किरानावाला हम को देखते ही दुआ सलाम करता जो मॉल कल्चर में संभव नहीं है। अगर किराना के दुकानदार अपने को थोड़ा सा अपडेट कर ले तो लोग मॉल से खरीददारी करने जाए ही क्यों। मॉल में लोग खरीददारी के साथ साथ मनोरंजन के लिए भी जाते हैं।

छोटे कारोबारी समेट रहे हैं दुकान
डॉ. सतीश कुमार शुक्ल, पूर्व भारतीय अर्थ सेवा अधिकारी, कॉटन एक्सचेंज, द्वितीय तल, कॉटन ग्रीन, मुंबई

मॉल चलाने वाली कंपनियों के पास संसाधन है और ये थोक में से भी कम मूल्यों पर वस्तुएं खरीदते हैं, उन्हें संग्रहित करते हैं। जबकि छोटे कारोबारी इनकी तुलना में कम संसाधन वाले हैं। पिछले कुछ सालों में भारत भर में सैकड़ों छोटे कारोबारी अपना धंधा समेट चुके हैं।

दोनों साथ-साथ चलते रहेंगे
राजेंद्र प्रसाद मधुबनी, स्वतंत्र लेखक व पत्रकार, फ्रेंड्स कॉलोनी, मधुबनी, बिहार

दुनिया में अमीरी-और गरीबी दोनों साथ-साथ रहेगी, जैसे जीवन में सुख और दुख है। रिटेलर और थोक विक्रेता, बड़ी दुकानें और छोटी दुकानें दोनों रहेंगी। ये आज चल रहे हैं, कल भी चलते रहेंगे।

सस्ता माल नहीं दे पाएंगे मॉल्स
ठाकुर सोहन सिंह भदौरिया, भदौरिया भवन, मुख्य डाकघर, बीकानेर, राजस्थान

जमीन, बिल्डिंग मैटेरियल तथा मजदूरी बढ़ने से मॉल्स के भवनों की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि वे सस्ता माल नहीं दे पाएंगे। छोटे दुकानदार व्यक्तिगत जानकारी व जान-पहचान के आधार पर छोटी-मोटी उधारी दे सकते हैं लेकिन मॉल्स नहीं दे सकते हैं।

मॉल: अमीरों के लिए, अमीरों द्वारा
मुनीश्वर, बेगूसराय, बिहार

‘मॉल्स धनाढयों के लिए पूंजीपतियों द्वारा संचालित केंद्र है।’परंतु भारत की अधिसंख्यक जनता उपभोक्ता व कारोबारी अति साधारण श्रेणी की है। छोटे व्यापारी को सामान विभिन्न माध्यमों से पहुंचता है, जिससे उनका क्रय मूल्य बढ़ जाता है, फलत: वह मॉल हॉउस से प्रतिस्पर्धा के काफी पिछड़ता जा रहा है।

मॉल में होता है हर चीज का ख्याल
संतोष मंडराई हरदा वाले,मध्य प्रदेश, जिला हरदा

वैसे देखा जाए तो आजकल हर बड़े शहरों में लगातार जनता की मांग पर और ग्राहक की पसंद पर हर चीज पर ध्यान रखा जा रहा है। हर राज्य में बड़ी-बड़ी प्राइवेट कंपनियों ने अपने मॉल खोल रखे हैं। कारण यह है कि किसी के पास किसी के हित में सोचने की फुर्सत नहीं है।

मॉल: समय की मांग
सुशीला देवी, सृष्टि रूपा भवन, पूर्वी लोहानीपुर, पटना, बिहार

बाजारवाद, प्रतिस्पर्धा पर टिका होता है। ऐसे में जो ‘फिट’ होगा वही मार्केट में ‘हिट’ होगा। छोटे कारोबारियों के वस्तुओं में जहां क्रेता को वजन, सामान की गुणवत्ता, मेल व मूल्य के मोल-जोल को लेकर समस्या बनी रहती है, वहीं मॉल्स में ऐसी बातें नहीं है। उपभोक्ता मॉल की ओर आकर्षित होंगे ही। साथ ही समयाभाव के कारण हर व्यक्ति चाहता है कि उसे एक ही दुकान में आवश्यकता की अधिकांश वस्तुएं मिल जाए। मॉल में यह सुविधा है। ऐसे में अगर छोटे व्यापारियों का नुकसान होता है, उन्हें भी प्रतिस्पर्धा में शामिल होते हुए कारोबार-व्यवहार को अद्यतन करना चाहिए न कि आंदोलन व हल्ला बोल, जो लखनऊ में हो रहा है।

किराना वालों का भी हुआ विकास
उमंग गर्ग, उपाध्यक्ष, डोमेस्टिक बिजनेस आलोक इंडस्ट्री लिमिटेड, मुंबई

छोटे कारोबारी कभी खत्म नहीं होंगे। ये भारतीय ग्राहकों की पहली पसंद हैं। रही बात मॉल की तो ये हमारी अर्थव्यवस्था के साथ छोटे कारोबारियों के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहे हैं। किराना वालों के लड़के, जिनके पास अनुभव तो जन्मजात रहता है अब शिक्षित भी हो रहे हैं, जिसके कारण उनके अंदर प्रतियोगिता की भावना बढ़ी है। विकास की यह ललक छोटे कारोबारियों के साथ-साथ विकास को भी एक नई दिशा देगी।

उपभोक्ता के लिए तो हैं मॉल अच्छे
अमर मल, निरंकारी कॉलोनी, दिल्ली विश्वविद्यालय

बड़े स्तर पर रिटेल मॉलों और चेनों के खुल जाने के बाद खुदरा कारोबारियों को सीधे तौर पर दिक्कत होगी लेकिन उपभोक्ता के लिए यह काफी अच्छा है। क्याेंकि उपभोक्ता को टिकाऊ वस्तु वाजिब दामों में उपलब्ध हो सकेगी। रही बात खुदरा कारोबारियों की तो ऐसे में उनके लिए प्रतिस्पर्धा अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों से हो जाएगी।

छोटी खरीदारी मॉल में संभव नहीं
प्रभात कुमार वर्मा, वकील, लखनऊ

शॉपिंग मॉल अमीरों के लिए है।  दो रुपये की खरीद के लिए मॉल में जाना संभव नहीं है। खुदरा व्यापारी और छोटा कारोबारी ही सबका हित देखता है। मॉल में 1000 की खरीद पर 2 किलो चीनी मुफ्त मिल रही है। लेकिन हर गरीब एक बार में 1000 की खरीद कहां कर पाता है।

भारत में यह असंभव है
कपिल अग्रवाल, पूर्व वरिष्ठ उप संपादक दैनिक जागरण, 1915 थापर नगर मेरठ

मॉल्स संस्कृति अब पूरी तरह फलॉप हो रही है। ठीक म्यूचुअल फंडों की तरह। इसके कई बेसिक कारण हैं। भारत की 80 फीसदी जनता गरीब व मध्यमवर्गीय है। इस जनता की मानसिकता मोल-भाव, वापसी, बदलना उधार करना, छांटना, कम पैसे देना, फ्री होम डिलीवरी आदि की है।

कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता
सुनील जैन ‘राना’, छत्ता जम्बू दास, सहारनपुर, उत्तर प्रदेश

मॉल कल्चर 10 फीसदी बड़े शहरों तक ही कामयाब है। 90 फीसदी मध्यम या छोटे शहरों में यदि मॉल बन भी गए हैं तो वह कामयाब नहीं हैं। मध्यम वर्ग तो मॉल में घूमने-फिरने जाता है, खरीदारी तो वह अपनी जानकारी की दुकान से ही करता है। बड़े शहरों में खरीददार ज्यादा होने से बाकी कारोबारियों को फर्क नहीं पड़ता है।

पुरस्कृत पत्र

छोटे कारोबारियों का भी रखें ख्याल
बॉबी- बॉबी किराना स्टोर, इन्द्रा विकास कॉलोनी, नई दिल्ली

छोटे शहरों की तो बात नहीं करूंगा लेकिन बड़े शहरों में जिस तरह मॉल संस्कृति अपना पांव पसार रही है, उससे तो यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले कुछ ही वर्षों में मॉल छोटे कारोबारियों को तबाह कर देगी। आज दिल्ली के हर इलाके में मॉल खुल चुके हैं। हालांकि मैं यह भी नहीं कहता कि अन्य लोगों को कमाने-खाने के लिए कदम नहीं बढ़ाए जाने चाहिए।

लेकिन सरकार से बस मेरी यही गुजारिश है कि वे जिन बड़े व पूंजीपति घरानों की मॉल खोलने में सहायता पहुंचा रही है, वह जरा हम छोटे कारोबारियों का भी ख्याल रखें। सरकार कुछ ऐसी नीतियां बनाए, जिससे हमें उबारा जाए। अभी ही जितने मॉल खुल चुके हैं, उससे ही हमारे मुनाफे में जबरदस्त असर पड़ रहा है और अगर इसी तरह खुलते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हम और हमारे बच्चे भूखे मरने को मजबूर हो जाएंगे।

सर्वश्रेष्ठ पत्र

प्रतियोगिता देख आगे बढ़ना होगा
मिहिर मेहता – उपाध्यक्ष, सिंथेटिक एंड आर्ट सिल्क मिल्स रिसर्च एसोसिएशन, वर्ली, मुंबई

छोटे कारोबारियों को निगल जाएंगे मॉल, यह सोचना ही गलत है। छोटे कारोबारी उधारी खाता और डिलिवरी जैसी सुविधाएं देते है, जिनके बारे में मॉल अभी सोच भी नहीं सकते हैं। इसके अलावा किराना वाले से हमारा भावनात्मक जुड़ाव भी रहता है। लेकिन रिटेल सर्विस इंडस्ट्री है, जो जितनी अच्छी सर्विस देगा, उतने ज्यादा ग्राहक उससे जुड़ेंगे। इसलिए समय केसाथ किराना वालों को भी बदलना होगा। वे प्रतियोगिता को स्वीकार करके बढ़ें। जिसने प्रतिस्पध्र्दा की दौड़ में अपने को शामिल किया है, उसका विकास अवश्य हुआ है।

खुदरा व्यापारी खत्म नहीं होंगे
इंदिरा भट्ट – तालकटोरा कॉलोनी, ईडी-24, राजाजीपुरम, लखनऊ

शॉपिंग माल बड़े लोगों की पसंद और पहचान हैं, लेकिन निम्न और मध्यमवर्ग आज भी खुदरा बाजार से  ही सामान खरीदता है। मॉल शहर के ज्यादातर विशिष्ट इलाकों में ही खुल रहे हैं, जहां आम मध्यमवर्गीय लोग जाने से कतराते हैं। मॉल की पहचान और सफलता संपन्नता से है, लेकिन आम भारतीय सभी संपन्नता से कोसों दूर हैं। मध्यम से लेकर निम्नवर्ग तक सभी खुदरा कारोबारी के सहारे ही रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करता है। लिहाजा मॉल तो चलेगा पर खुदरा व्यापारी को खत्म नहीं कर सकता।

ठंडा हो जाएगा यह उबाल भी
दिनेश चंद्र मिश्रा – म.न.- 58 210 हुसैन गंज, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

मॉल मात्र बच्चों को घुमाने अथवा प्रेमी-प्रेमिका के मिलन स्थल बन कर रह गया है। अगर आप गौर से देखें तो यहां लगभग 10 फीसदी लोग ही खरीददारी करते दिखेंगे। जितनी तेजी से मॉल खुल रहे हैं, उतनी ही तेजी से ग्राहकों की कमी एवं किराए में तेजी के कारण नुकसान में चल रही बड़ी-बड़ी कंपनियों के फ्रे न्चाईजीस बोरिया बिस्तर समेट चुके हैं। छोटे दुकानदार भी ग्राहक को लुभाने के लिए 4-5 फीसदी की छूट देने लगे हैं। कुछ समय के लिए मॉल भले प्रभावित कर सकें, लंबे समय में उबाल ठंडा पड़ जाएगा।

हालत पतली छोटे व्यापारियों की
प्रशांत वर्मा – गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

दिन-प्रतिदिन खुलते मॉल ने छोटे कारोबारियों को निगलना शुरू कर दिया है। ऐसा होने का सबसे बड़ा कारण है, सभी घरेलू और रोजमर्रा के सामानों का एक जगह और कम कीमत पर मिलना। साथ ही मॉल में समय-समय पर ग्राहकों को किफायती ऑफर दिया जाता है, जबकि छोटे व्यापारियों द्वारा ऐसा करना संभव नहीं होता है। सरकारी नीतियां भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। वर्तमान सरकार को केवल बड़े व्यापारी ही दिखाई दे रहे हैं। इस कारण बड़े शहरों के छोटे व्यापारियों की हालत पतली है।

बकौल विश्लेषक

छोटे खिलाड़ी के खेमे में बड़े खिलाड़ियों का न हो प्रवेश
भरत डोगरा – अर्थशास्त्री

हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि भारत के खुदरा बाजार, जिसे हम परंपरागत बाजार भी कहते हैं, उसकी अपनी कुछ विशेषताएं हैं। वर्तमान समय में पर्यावरण और ऊर्जा संरक्षण को भी लेकर काफी चर्चाएं हो रही हैं। कहने को तो मॉल बेहद साफ-सुथरा और व्यवस्थित सा लगता है और परंपरागत बाजार थोड़ा अव्यवस्थित और गंदा लगता है लेकिन आप पर्यावरण की गहराई में जाएं तो पाएंगे कि ग्रीन हॉउस गैसों का अधिक उत्सर्जन और बिजली की जबरदस्त खपत मॉल में ही होती है। इसके अलावा, मॉल की तुलना में परंपरागत बाजार में लेबर खर्च कम होता है इसलिए वस्तुओं को उचित मूल्यों पर बेचा जा सकता है।

अगर सरकार मॉल की स्थापना में विशेष सुविधाएं न दें और छोटे कारोबारियों और हॉकर पर अत्याचार न होने दें, तब तो छोटे कारोबारी मॉल का सामना कर लेगा। लेकिन हो यह रहा है कि देश के बड़े घराने और व्यापारी समूह को सरकार द्वारा सीधे और परोक्ष रूप से सब्सिडी दी जा रही है। मुख्य रूप से जो व्यवसाय छोटे कारोबारियों का है, उसमें रिलायंस, बिग बाजार सरीखे बड़े खिलाड़ी सेंध लगा रहे हैं।

वे ऐसी-ऐसी सुविधाएं देने को तैयार हैं, जिससे पहते तो छोटे कारोबारी क्षतिग्रस्त होकर हट जाएंगे और उसके बाद जब उनका एकाधिकार हो जाएगा तो वह अपने हिसाब से चीजों के  दाम बढ़ा देंगे। इससे बेरोजगारी भी बढ़ेगी। जो दैनिक जीवन की वस्तुएं-चाहे वह सब्जी या फिर किराना सामान ही क्यों न हो-उसमें बड़े कारोबारी घरानों का प्रवेश नहीं होना चाहिए।
बातचीत: पवन कुमार सिन्हा

सरकार बनाए कानून वरना मलेशिया जैसा होगा हाल
बनवारी लाल कंछल – राज्य सभा सदस्य एवं अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश व्यापार प्रतिनिधि मंडल

मॉल छोटे व्यापारियों को लगातार निगल रहे हैं। आगे हालात और खराब होने वाले हैं। कोलकाता का एक उदाहरण देता हूं जहां 300 दुकानों के कॉम्पलेक्स के ठीक सामने एक शॉपिंग मॉल खुल गया और एक साल के अंदर सारी 300 दुकानें बंद हो गईं। उत्तर प्रदेश में हमने मॉल कई जगहों पर खुलने नहीं दिया इससे छोटे कारोबारी बचे हुए हैं।

बड़े शॉपिंग मॉल देश की कृषि भूमि के क्षरण भी करते हैं क्योंकि इनका निर्माण कई लाख वर्ग फुट क्षेत्र में होता है। छोटे व्यापारी मात्र 100 वर्ग फुट की जगह पर अपना कारोबार चला लेते हैं। लगातार कृषि भूमि के क्षरण से एक दिन देश में गंभीर खाद्यान्न संकट पैदा हो जाएगा। यहां एक खास बात यह भी है कि छोटे खुदरा व्यापारी अपने यहां अनपढ़ों को भी रोजगार देते हैं जबकि शॉपिंग मॉल में ऐसा नहीं है। आज देश बिजली संकट से जूझ रहा है और एक-एक शॉपिंग मॉल में औसतन 5 लाख की बिजली हर महीने जला दी जाती है।

सबसे ज्यादा जरूरी है कि केंद्र सरकार एक शॉपिंग रेग्यूलेशन एक्ट बनाए जैसा कि मलेशिया की सरकार ने किया है। मलेशिया में भी पहले शॉपिंग मॉल को खूब बढ़ावा दिया गया पर जब बेरोजगारी बढ़ी तो वहां सरकार को कानून बनाकर इन्हें नियंत्रित करना पड़ा। पहले तय होना चाहिए कि कितनी आबादी पर कितने शॉपिंग मॉल बनें। इस सबके बावजूद अगर केंद्र सरकार सोचती है कि शॉपिंग मॉल बनाना जरूरी है तो छोटे व्यापारियों को ही इजाजत देनी चाहिए। ऐसे मॉल 3000 से 4000 वर्ग मीटर से ज्यादा पर नहीं बनने चाहिए और इसे स्थानीय व्यापारी ही बनाएं।
बातचीत: सिध्दार्थ कलहंस

…और यह है अगला मुद्दा

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First Published : July 21, 2008 | 1:26 AM IST