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प्रेम की ओर बढ़ते मार्केटिंग के कदम

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 2:06 PM IST

हॉलीवुड की फिल्म हिच की शुरुआत उसके मुख्य पात्र एलेक्स हिचेंस के इस वाक्य के साथ होती है कि हर एक लड़की को रिझाने के कुछ बुनियादी नियम होते हैं।


आप कौन हैं, क्या हैं और कहां हैं- इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आप किसी भी लड़की का दिल जीत सकते हैं, जरूरत है तो सिर्फ सही तरीके की। एलेक्स आगे यह भी कहता है कि अगर आप बुनियादी नियमों पर नहीं चलते हैं तो आप किसी भी लड़की को नहीं रिझा सकते।

मतलब यह कि किसी लड़की को रिझाने के लिए आपको जरूरत होती है एक योजना की। एक ऐसी योजना जिसके जरिए आप सीधे उस लड़की के दिल तक पहुंच जाएं। वह इस मामले में एक थुलथुल से दिखने वाले अलबर्ट ब्रेननार्मन की उसे उसकी सपनों की रानी और बेहद खूबसूरत, रईस लड़की एल्जरा कोल का दिल जीतने में मदद करता है।

यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन यही मार्केटिंग और बिजनेस का नया चेहरा है। यही वह स्वरूप है जैसा कि नई सदी में बिजनेस और मार्केटिंग नजर आना चाहिए। 80 और 90 के दशक में मार्केटिंग, युध्द जैसा लगता था। जैसा कि अल रेज और जैक ट्राउट ने अपनी पुस्तक में उपभोक्ताओं का मन जीतने के लिए और उसे संस्थागत करने के बारे में किया है।

यह कुछ इस तरह से लगता है कि प्रतियोगिता में हराने और जीत हासिल करने के लिए उत्पादों के मामले में उनके साथ विभिन्न तरह की कलाबाजियां करने, कीमतें और प्रोत्साहन योजनाएं चलाने जैसे तरीके अपनाए जाते थे। इसमें आक्रामक, रक्षात्मक और गुरिल्ला युध्द की रणनीति अपनाई गई। इस तरह से देखें तो यह सिध्दांत कहता है कि बाजार और प्रतिस्पर्धा, संचालन के विभिन्न चरण हैं।

जैसे ही हम ग्राहकों की ओर उन्मुख नीति अपनाते हैं, मार्केटिंग और बिजनेस के नए तरीकों की जरूरत होती है। यहां युध्द बहुत देर तक नहीं चलता बल्कि वास्तव में देखें तो संबंध बनाने और प्यार से रिझाने का तरीका लागू होता है। इसके बाद आप पाएंगे कि कुछ नया माहौल बन रहा है और नया परिवर्तन अपनी जगह बना रहा है।

पहली बात यह है कि इस समय दुनिया पश्चिम से पूरब का रुख कर रही है। भारत और चीन जैसे देशों में मूल रूप से संबंधों पर आधारित व्यवसाय होता है जबकि पश्चिम के देशों में इसके विपरीत स्थिति है। वहां पर मामला ज्यादा व्यक्तिगत और व्यक्तिगत उद्देश्यों पर आधारित होता है। आगे हम यह भी पाते हैं कि पश्चिम की संस्कृति में अधिक हमलावर और विजेता बनने की मानसिकता होती है, वहीं पूरब में लोगों को साथ लेकर चलने और सहयोग की रणनीति होती है।

दूसरी बात यह है कि हम पूरी तरह से प्रतियोगी दुनिया से ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं, जहां आपस में मिलने और सहयोग साथ-साथ चलते हैं। हम इसे अपने चारो ओर देख रहे हैं- कोई भी बाजार में काम करने वाला विपणनकर्ता लंबे समय तक स्वतंत्र रूप से नहीं चल सकता। एयरलाइंस कंपनियां, होटलों और जमीन पर आवागमन का संचालन करने वाले लोगों से सहयोग लेती हैं, जिससे उनके उपभोक्ताओं को ज्यादा से ज्यादा सुविधा मिल सके। 

तेजी से बढ़ रहे उपभोक्ता वस्तुओं के विपणनकर्ता लंबे समय तक अपने ब्रांड की बदौलत ग्राहकों को अपनी ओर नहीं खींच सकते। उन्हें रिटेल चेन से संबंध स्थापित करने ही होंगे, जिससे उनके ब्रांड बेहतर तरीके से ग्राहकों की नजर में आ सकें और ग्राहक खरीद के समय अपनी धारणा बना सकें। तीसरी बात यह है कि ग्राहकों के व्यवहार में भी क्रमवार परिवर्तन आ रहा है। हम क्रमश: ब्रांड की ओर से हट रहे हैं और विभिन्न कोटियों की ओर बढ़ रहे हैं, उसके बाद विभिन्न कोटियों में प्रतिस्पर्धा होती है।

पिछले दशक में हमने देखा कि जबसे मोबाइल आया है, घड़ियों, तैयार कपड़ों, क्रेडिट कार्ड यहां तक कि शराब के मामले में भी व्यक्तिगत पसंद बदल रही है। अचानक कोई भी चीज, किसी भी चीज से प्रतियोगिता करने लगी है। जैसे-जैसे बाजार में उभार आया है, महत्त्व की कोटियों का व्यापार बढ़ रहा है और मूल उत्पादों और कम महत्त्व की अन्य चीजों का व्यवसाय घट रहा है।  इस तरह से उच्च और मध्यम आय वर्ग के उपभोक्ता की श्रेणी में चुनौतियां बहुत ज्यादा हैं। इसमें सबसे बड़ी चुनौती कोटियों की जगह ब्रांड की प्राथमिकता को बनाए रखने की है। कोटियों के साथ सहयोग, महत्त्व हासिल कर सकता है।

अन्त में तकनीकी विकास और उत्पादों की संख्या बढ़ने के साथ ही युध्द का रुख उपभोक्ताओं को रिझाने की ओर हो रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि आपूर्तिकर्ताओं, वितरकों और कर्मचारियों के बीत संबंधों का जाल बुनना होगा, जिससे माल के उपभोक्ता तक पहुंचने में उच्च गुणवत्ता, समय आदि पर नियंत्रण रखा जा सके। स्पष्ट है कि अब उपभोक्ताओं के लिए प्रतिस्पर्धा और बाजार पर ध्यान दिए जाने की बजाय अब संबंधों का महत्त्व बढ़ रहा है। 

अब चुनौती यह है कि किस तरह से सभी साझेदारों यानी उपभोक्ताओं, आपूर्तिकर्ताओं, वितरकों और ब्रांड निर्माताओं (कर्मचारियों) के बीच तालमेल बिठाया जाए। इसके लिए अलग सोच, अलग भाषा और अलग शब्दावली की जरूरत होगी। युध्द की तरह से संबंधों में हराने की प्रवृत्ति नहीं बल्कि जीतने की बात होती है। यह एकबारगी नहीं किया जा सकता है, बल्कि इसमें धीरे-धीरे चलना होता है, जिसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इसमें दबाव की बात नहीं होती, बल्कि इसमें समझाने-बुझाने और लोकप्रिय बनाने की जरूरत होती है।

आखिर ऐसी सोच को हकीकत में कैसे बदला जाए? इसका मतलब है कि बिजनेस और मार्केटिंग की ओर नए सिरे से ध्यान दिया जाए। खुदरा व्यवसायियों के लिए कीमत के स्तर पर सुधार किया जाए यानी कीमतें कम की जाएं और प्रतिस्पर्धा का लाभ दिया जाए। इसका मतलब यह हुआ कि आपूर्तिकर्ताओं और सहयोगियों में बेहतर डील हो, जिससे उपभोक्ताओं को सस्ती कीमतों का लाभ मिल सके। यह हर तरफ से आक्रामक होने जैसी बात है। इसमें संबंधों को केंद्र में रखना होगा। यह इस बारे में लगातार सोचते रहने की बात है कि उपभोक्ता व्यस्त रहें। उनका विश्वास जीता जा सके। 

यह आपूर्तिकर्ताओं के साथ आपसी लाभ बनाए रखने के लिए काम करने की बात है, जिससे वे एक दूसरे के वफादार बने रहें। यह हर तरह की साझेदारी के बारे में है। अगर सरल शब्दों में कहें तो यह बिजनेस और मार्केटिंग एप्रोच है, जिसमें मित्रवत व्यवहार, लगाव का ज्यादा महत्त्व है। इसका यह भी मतलब है कि कोई भी उपभोक्ता जब खरीद करता है तो प्रतिस्पर्धियों को चाहिए कि उसकी पूरी खरीद पर ध्यान रखें। अब अलग-अलग उत्पादों में भेद करने की जरूरत नहीं है, बल्कि आपूर्तिकर्ताओं को आपसी सहभागिता से एक श्रृंखला बनाने की जरूरत है।

इसका मतलब यह हो सकता है कि ब्रांडों को अपने उत्पाद के साथ अन्य सहयोगी उत्पादों की ओर भी ध्यान देने की जरूरत है जिससे उपभोक्ताओं को खरीद के साथ पूर्ण संतुष्टि मिल सके। उदाहरण के लिए एक पेंट बनाने वाली कंपनी को फर्निशिंग ब्रांड और सेनेट्री ब्रांड के साथ मिलकर काम करना चाहिए, जिससे एक होम सॉल्यूसंश स्टोर में सब कुछ मिल सके और उपभोक्ता को एक ही जगह पर पेंटिंग की समस्या के साथ अन्य जरूरतों को भी पूरा किया जा सके।

यह प्रवृत्ति ऑटोमोबाइल और हाउसिंग सेक्टर में तेजी से बढ़ रही है, जहां विनिर्माता और बिल्डर, फाइनैंस कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं जिससे उनके उत्पादों के खरीदारों को अधिक सुविधा मिल सके! सरल शब्दों में कहें तो अब युध्द का दौर खत्म हो रहा है और प्यार अपनी जगह बना रहा है। एक बेहतर व्यवसायी या विपणनकर्ता वही होगा, जो इन तरीकों का बेहतर ढंग से इस्तेमाल कर सकता है।

First Published : July 31, 2008 | 10:04 PM IST