तमिलनाडु के दक्षिणी इलाके में शिवकाशी, कोविलपट्टी और सतूर जैसे शहरों की माचिस इकाइयों पर सेनवेट की ऊंची दर, मजदूरों की कमी और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
ये तीनों शहर राजधानी चेन्नई से लगभग 600 किलोमीटर दूर हैं जहां करीब 3000 करोड़ रुपये का माचिस उद्योग कई लोगों को रोजगार की रोशनी मुहैया करा रहा है। यहां देश के कुल उत्पादन का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा बनता है। पिछले 5 सालों में अब उसके स्तर में 50 प्रतिशत की कमी आई है।
इस परंपरागत उद्योग में स्थिति ऐसी हो चुकी है कि यहां कई इकाइयां बंद होने के कगार पर हैं और इस उद्योग से जुड़े कुछ लोग दूसरे कारोबार मसलन टेक्सटाइल्स आदि में जाने की सोच रहे हैं। ऑल इंडिया चैंबर ऑफ मैच इंडस्ट्री के वाइस प्रेसीडेंट और पाइनियर एशिया ग्रुप के निदेशक एस. अशोक का कहना है, ‘यहां माचिस उद्योगों की हालत बेहद खराब है और अब तो उसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े हो गए हैं।’ इन शहरों के संगठित उद्योग इसकी वजह मजदूरों की कमी, असंगठित इकाइयों द्वारा कर चोरी और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों को बताते हैं।
अशोक का कहना है, ‘पिछले 6 महीने में उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले सामान की लागत अनुमान से काफी बढ़ गई है। मिसाल के तौर पर माचिस में इस्तेमाल होने वाले रेड फॉस्फेट की कीमत पहले 300 रुपये किलोग्राम थी जो बढ़कर 650 रु पये हो गई है। पोटैशियम क्लोराइड की कीमत 5000 रुपये प्रति टन से 6000 रुपये हो गई है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से माचिस उद्योगों में इस्तेमाल वैक्स की कीमतों में 140 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। पहले वह 700 डॉलर प्रति टन के हिसाब से मिलता था लेकिन अब उसकी कीमत 1700 डॉलर प्रति टन है।’
उनका कहना है कि इसके मुकाबले माचिस बॉक्स की कीमत पिछले 10 सालों से 50 पैसे ही है। इससे संगठित क्षेत्र के लोगों की अपनी ही परेशानियां हैं। इस सेक्टर पर सेनवेट की दर 12 प्रतिशत है जबकि असंगठित क्षेत्र कुटीर उद्योगों की श्रेणी में आने के कारण कर के झंझट से बच जाते हैं। हालांकि खबरें ऐसी आती हैं कि ये उद्योग मशीनों से ही माचिस बनाते हैं। स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि इस छोटे असंगठित क्षेत्र के कारोबारियों द्वारा करचोरी भी की जाती है जिससे वे बाजार में कम कीमत के साथ टिके रहते हैं।
संगठित क्षेत्र के निर्माता एस.सेल्वाकुमार का कहना है कि यह माचिस मशीनों के द्वारा बनाई जाती है हालांकि इसकी पैकिंग हाथों से की जाती है। इसमें तीलियों को व्यवस्थित करना, अंदर और बाहर का बॉक्स बनाना और इन तीलियों की पैकिंग करना जैसे कई काम शामिल हैं। इसके लिए मजदूरों की काफी कमी महसूस की जाती है हालांकि उन्हें काफी वेतन का ऑफर भी दिया जाता है।
कुछ साल पहले तक माचिस उद्योग में 100,000 लोगों से ज्यादा को नौकरी मिली थी लेकिन आज शिवकाशी में केवल 20,000 लोग ही इस उद्योग से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इन छोटी इकाइयों में मजदूरों की कमी की वजह से ही काफी पैसे लगाकर मशीनों पर निवेश किया जा रहा है। यहां स्थानीय साहूकार भी काफी ऊंची ब्याज दर पर कर्ज का लेन-देन करते हैं। दूसरे कारोबार मसलन टेक्सटाइल्स आदि में जाने की उनकी कोशिशें भी कामयाब नहीं हो पा रही हैं।