अपनी एडवरटाइजिंग सेल्स कंपनी की चलाने के लिए राजीव वोहरा ने चार महीने पहले स्टार इंडिया को गुडबाय कह दिया।
वोहरा ने अपने करियर के बेशकीमती 15 साल स्टार इंडिया को दिए हैं लेकिन अब उनके निशाने पर नया मिशन है। उनकी ‘फनटाइम फिल्म्स एंड मार्केटिंग’ नाम की एडवरटाइजिंग सेल्स कंपनी के ग्राहकों की फेहरिस्त में पिछले साल टीवी और एफएम रेडियो स्टेशन जगत के कई बड़े नाम जुड़े हैं जिनमें से जूम, 9 एक्स और बिग एफएम प्रमुख हैं।
पिछले साल मार्केटिंग एजेंसी पर्ल मीडिया का नाम बदलकर इंटीग्रिड मीडिया कर दिया गया और काफी हद तक इस कंपनी की कार्यशैली में बदलाव भी आया। पहले यह कंपनी सन नेटवर्क पर निर्माताओं के लिए एड स्पेस का काम देखा करती थी। अब इसने अपना दायरा बढ़ा दिया है और यह दूसरे चैनलों पर भी एडवरटाइजिंग सेल्स का काम करने लगी है।
इस नये दौर के बाबत इंटिग्रिड मीडिया के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर संजय धर कहते हैं, ‘वैसे अभी तक पूरे तौर पर इस तरह के रुझान नहीं दिख रहे हैं लेकिन अब अधिक से अधिक चैनल अपने एडवरटाइजिंग सेल्स और मार्केटिंग के लिए आउटसोर्सिंग का सहारा ले रहे हैं। सामान्य मनोरंजन चैनलों के अलावा क्षेत्रीय भाषाओं के चैनलों के इस लिहाज से बहुत बड़े अवसर बन रहे हैं।’ यहां यह भी बता दें कि भोजपुरी के आने वाले चैनल महुआ टीवी में एडवरटाइजिंग सेल्स का काम इंटिग्रिड मीडिया ही देख रही है।
एनडीटीवी मीडिया ने इस तरह के दौर की शुरूआत की है। गौरतलब है कि वर्ष 2002 में एनडीटीवी के साथ मिलकर राज नायक ने एक संयुक्त उपक्रम के तौर पर एनडीटीवी मीडिया की नींव डाली थी। पहले पहल तो इसने एनडीटीवी के न्यूज चैनलों के साथ काम किया लेकिन बाद में इसके ग्राहकों की संख्या में इजाफा होता गया। धीरे-धीरे इस कंपनी के पास सहारा वन, फिल्मी, फिरंगी और श्री अधिकारी ब्रदर्स के मी मराठी जैसे चैनलों का काम आता गया। इसके अलावा यह कंपनी कुछ वेबसाइटों के लिए भी एडवरटाइजिंग सेल्स का काम कर रही है।
यह बिलकुल हकीकत है कि अपनी कमाई के सबसे बड़े जरिये के लिए टीवी चैनल अब बाहरी एजेसिंयों पर निर्भर होते जा रहे हैं। दुनिया भर में इसी तरह का दौर चल रहा है। इसके लिए प्रसारक इन एजेंसियों को 8 से 15 फीसदी तक कमीशन दे रहे हैं। कमजोर चैनल को 15 फीसदी तक देना पड़ सकता है तो मजबूत चैनल के लिए सौदा 8 फीसदी में भी पट सकता है। आइएनएक्स मीडिया के मुख्य रणनीतिक अधिकारी पीटर मुखर्जी कहते हैं, ‘आउटसोर्सिंग के फायदे के बारे में अधिक तर्क देने की जरूरत नहीं है।
सूचना प्रौद्योगिकी जैसे कई दूसरे क्षेत्रों में इसने काफी फायदा पहुंचाया है।’एनडीटीवी मीडिया के सीईओ राज नायक भी इस बात से सहमत नजर आते हैं। वह बताते हैं कि इस बात को मान लेना चाहिए कि मीडिया उद्योग में आउटसोर्सिंग तो पहले से ही चली आ रही है। कंटेंट (कार्यक्रम) तो पहले से ही आउटसोर्स किया जाता रहा है तो वितरण के लिए पिछले कुछ सालों से जी टर्नर, वन एलायंस और डेन जैसी कंपनियां काम कर रही हैं। अब ताजा मामला मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग सेल्स का है तो प्रसारक अब इसके लिए भी विशेषज्ञ कंपनियों की मदद लेने लगे हैं।
जी न्यूज के सीईओ बरुण दास कहते हैं, ‘टीवी और रेडियो का प्रसार इसको और भी तेजी दे रहा हैं। क्षेत्रीय भाषाओं के छोटे प्रसारक अक्सर बड़े विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों तक नहीं पहुंच पाते हैं।’ प्रतिभाओं की कमी एक दूसरा कारण है। मुखर्जी कहते हैं, ‘मीडिया में बढ़िया सेल्स माइंडेड लोगों की कीम है।’ मुखर्जी का मानना है कि पिछले कुछ सालों से मीडिया बायर्स (विज्ञापन एजेंसी के लोग जो मीडिया में विज्ञापन को लेकर मोलभाव करते हैं) मीडिया संस्थानों पर हावी रहे हैं।
ऐसे में उनसे निपटने के लिए मीडिया सेलर्स का उभरना वक्त की जरूरत है।इस चुनौती से निपटने के लिए मीडिया सेलर्स के मोर्चे पर अभी और मशक्कत करने की जरूरत है। वहीं मुखर्जी का कहना है कि जब खरीदने और बेचने वाले एक समान स्तर पर आ जाएंगे तो इस कारोबार की दिशा बदल सकती है। इस तरह देखें तो मुखर्जी अपने आइएनएक्स (इसके तले 9 एक्स, 9 एक्स म्यूजिक और न्यूज एक्स चैनल आते हैं) के लिए आउटसोर्सिंग कराने को तैयार हैं।
उन्होंने कुछ काम फनटाइम मार्केटिंग को दे भी दिया है जबकि बचे हुए के बारे में उनके आर्थिक हित तय करेंगे। दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि इस तरह के मामलों में विवाद बढ़ने से इस उद्योग की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। दास कहते हैं कि निजी तौर पर मैं इसके खिलाफ ही हूं। वह कहते हैं, ‘मैं अपने हितों के लिए किसी दूसरे पर निर्भर रहना पसंद नहीं करूंगा।’