मैं जब अपने पिछले कॉलम को अंतिम रूप दे रहा था, तो मुझे इसकी जानकारी नहीं थी कि महंगाई दर का आंकड़ा 11 प्रतिशत को पार कर चुका है। इस तरह के उछाल से मैं चकित था, लेकिन इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि मौद्रिक नीति की अपनी सीमाएं हैं।
एक बात तो स्पष्ट है कि नीति को कड़ा किया गया है और देखें तो यह स्थिति करीब 4 साल (अक्टूबर 2004) से है। दरअसल एक समय पर रिजर्व बैंक के गवर्नर इस बात को लेकर बहुत उत्साहित थे कि आगे चलकर सभी समस्याएं हल कर ली जाएंगी, इसके साथ ही यह अनुमान लगाया कि महंगाई दर 4-4.5 प्रतिशत के बीच रहेगी (एनुअल पॉलिसी स्टेटमेंट-2007)।
महंगाई दर के इस अनुमान के आस पास पहुंचने के लिए मौद्रिक नीति और कड़ी की जा सकती है, जो विकास को प्रभावित करेगा। यह संभव है कि आगे भी मौद्रिक नीति को कड़े करने के लिए कदम उठाए जाएं, भविष्य में हम यह भी देख सकते हैं कि कुछ अप्रत्यक्ष कर हटा लिए जाएं। लेकिन वित्तीय नीति की भी कुछ सीमाएं हैं।
यह एक हकीकत है कि वास्तविक घाटा जीडीपी के 10 प्रतिशत के करीब है, अगर इसमें जारी किए गए तमाम बॉन्डों, बाद में जारी किए जाने वाले संभावित बॉन्डों, कर्ज के बोझ, वेतन आयोग के प्रभाव को शामिल कर दिया जाए। इसके साथ ही औद्योगिक मंदी की वजह से निश्चित रूप से बजट में अनुमानित राजस्व आय से कम आमदनी होगी। यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों करों के मामले में होगा।
वित्तीय कदम उठाए जाने के लिए बहुत ज्यादा संभावनाएं नहीं हैं। इसमें मूल समस्या प्रत्यक्ष और परोक्ष सब्सिडी की है। प्रधानमंत्री ने कई मौकों पर कहा है कि ( 12 जून को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित बिबेक देबरॉय ने 22 ऐसे अवसर गिनाए हैं) ‘हम वर्तमान में दी जा रही सब्सिडी के स्तर को बरकरार नहीं रख सकते, इस मामले में आमूल चूल परिवर्तन करना पड़ेगा जिससे केवल जरूरतमंद लोगों को ही इसका फायदा पहुंचे। इसमें मौजूद सभी खामियों को दूर करना होगा।’
लेकिन प्रधानमंत्री ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं, अपने पिछले सालों में भी प्रशासनिक सुधार के कदम उन्होंने नहीं उठाए, जबकि इस मुद्दे पर तभी से काम शुरू हो जाना चाहिए था जब वे प्रधानमंत्री बने थे। (क्या वे वित्तमंत्री के रूप में 90 के दशक में जितने प्रभावशाली थे, उतने ही प्रभावशाली प्रधानमंत्री के रूप में हैं?)। हमारी राजनीतिक अर्थवस्था की समस्या यह है कि जो लोग इस मसले की जानकारी रखते हैं और मानते हैं कि कुछ किया जाना चाहिए, वे राजनीतिक रूप से कम शक्तिशाली है। उनका ऐसा करिश्माई व्यक्तित्व या नेतृत्व नहीं है कि वे इसे जनता के बीच ले जाएं।
दूसरी ओर लोकप्रिय राजनेता जाति और धर्म पर आधारित कोटे से केवल वोट बटोरना जानते हैं। वे मुफ्त बिजली और पानी का कोटा निर्धारित करते हैं, पेट्रोलियम और उर्वरक में सब्सिडी आदि के माध्यम से लोगों को लुभाते हैं। लेकिन इन सभी वित्तीय घाटों की याद तभी आती है जब बड़ा संकट आता है- जैसे इस समय कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। शायद यह हमारे राजनेताओं के लिए उचित समय है कि वे जनता से कहें कि उनके पास भी जनता के लिए कुछ करने की सीमाएं हैं।
यह कहना ही होगा कि वे वैश्विक घटनाओं से जनता की रक्षा एक हद तक ही कर सकते हैं, जबकि ऊर्जा की कीमतें बेतहाशा बढ़ रही हैं। यह कहना होगा कि जमीनी हकीकत का ध्यान रखते हुए वे ऊर्जा की अपनी जरूरतों को समेट लें और दुरुपयोग को बिल्कुल रोक दें। लेकिन राजनेताओं से यह अपेक्षा करना उचित नहीं होगा और क्योंकि वे यदि संरक्षण नहीं देंगे तो उनका सत्ता में बने रहना संभव नहीं होगा। क्योंकि राजनेताओं ने जनता को ऐसा बना दिया है कि वे सरकार को ही माई-बाप मानते हैं। क्या लोकतंत्र में वोट बटोरने का यही एकमात्र साधन है?
विकास से संबंधित रिपोर्टें
हाल ही में विकासशील देशों की आर्थिक नीतियों से संबंधित कई रिपोर्टें और संस्तुतियां आईं। इनमें से दो खासकर भारत के संदर्भ में आई हैं। यह विश्लेषण खासकर आर्थिक विकास दर बरकरार रखने से संबंधित है।
संभवत: इसमें सबसे गंभीर रिपोर्ट ग्रोथ कमीशन की है, जिसके अध्यक्ष नोबेल पुरस्कार से सम्मानित माइकेल स्पेंस थे और इसमें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित एक अन्य विद्वान के अलावा विकासशील देशों के कई नीति नियंता शामिल थे। विकास रिपोर्ट सैध्दांतिक नहीं है, इसमें स्वीकार किया गया है कि नीतियों के लिए कोई भी ऐसा मानक नहीं है जो सभी देशों के लिए सही साबित हो।
लेकिन इसमें कुछ तथ्य दिए गए हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। रिपोर्ट में इस पर जोर दिया गया है कि विकास को बनाए रखने के लिए, ‘विकास ही अंतिम लक्ष्य नहीं है। लेकिन यह सामाजिक और व्यक्तिगत रूप से जरूरी अन्य उद्देश्यों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाता है।’ इस रिपोर्ट में ‘नहीं करने के लिए’ जो सुझाव दिए गए हैं, वे बहुत दिलचस्प लगे। क्योंकि हम उनमें से ज्यादातर काम करते हैं, जिसके बारे में रिपोर्ट हमें सावधान करती है।
उनमें से कुछ इस प्रकार हैं- ‘ऊर्जा पर सब्सिडी देना, जो ज्यादातर लोग प्रयोग करते हैं (हम मध्य आय वर्ग द्वारा प्रयोग की जाने वाली रसोई गैस पर सब्सिडी देते हैं और कार से चलने वाले लोगों को पेट्रोल पर सब्सिडी देते हैं)। बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में चल रहे काम रोककर वित्तीय घाटा को कम करना, नौकरियों को खुला संरक्षण प्रदान करना, महंगाई को रोकने के लिए मूल्यों पर नियंत्रण करना, घरेलू कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए लंबे समय तक निर्यात पर प्रतिबंध लागू रखना।” इन सभी के जारी रहते हुए किसी भी तरह की टिप्पणी करना अनावश्यक होगा।