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पैसों की बिसात और दांव पर लगी है शिक्षा

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 1:45 AM IST

आज भी हमारे मुल्क में इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन पाना कई छात्रों के लिए जीवन का सबसे बड़ा सपना होता है।


इसी वजह से कई छात्र 11वीं में आने के साथ ही दिन-रात एक कर पढ़ाई में जुट जाते हैं। ऊपर से टयूशनों के चक्कर भी शुरू हो जाते हैं। खास तौर पर केरल में कई छात्रों के जीवन का सबसे बड़ा सपना ही यही होता है। मुल्क के दूसरे छात्रों की तरह वे भी इस सपने को पूरा करने के लिए पूरी शिद्दत से जुटे रहते हैं।

इन बच्चों के दिन तो गुजरते हैं स्कूलों में, लेकिन शामें और कभी-कभी तो रातें भी कोचिंग सेंटरों में गुजरती हैं। उनके लिए अपने भविष्य के रडार पर 12वीं के नतीजे कोई मायने नहीं रखते। उनकी आंखों में तो प्रवेश परीक्षा में ज्यादा से ज्यादा नंबर और ऊंचे से ऊंचा रैंक हासिल करने के ही सपने होते हैं।

इसलिए हाल ही में केरल सरकार की एक कमेटी ने सिफारिश की थी कि इन कॉलेजों में प्रवेश के लिए 12वीं क्लास के अंकों को भी प्रवेश परीक्षा के अंकों के बराबर ही अहमियत दी जानी चाहिए। अगर सरकार इस सिफारिश को स्वीकार कर लेती है, तो उसे 12वीं कक्षा की परीक्षा और प्रवेश परीक्षा के लिए 3000 से लेकर 5000 सवालों का एक क्वेश्चन बैंक बनाना पड़ेगा।

इस बारे में कमेटी के एक सदस्य आरवीजी मेनन का कहना है कि, ‘इससे कोचिंग सेंटरों की जरूरत ही खत्म हो जाएगी। इस वजह से छात्र स्कूलों में 12वीं के बोर्ड और प्रवेश परीक्षा के लिए तैयारी करने लगेंगे।’ लेकिन राज्य के अधिकारियों का कहना है कि इस वजह से बच्चे केवल रट्टंत विद्या में पारंगत तोते बनकर रह जाएंगे, जिन्हें केवल कुछ खास सवालों को याद रखने की जरूरत रह जाएगी।

उनके मुताबिक इससे उनकी रचनात्मकता और अलग हटकर सोचने की क्षमता कुंद हो जाएगी। साथ ही, इस क्वेश्चन बैंक की वजह से लोगों के लिए बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में डालना जरूरी हो जाएगा। उनके मुताबिक आगे का रास्ता उच्च शिक्षा में ज्यादा विकल्प देने से खुलेगा, न कि विज्ञान को महज 5000 सवालों के एक बैंक में तब्दील कर देने से। केरल के एक भी स्कूल में कमर्शियल आर्ट, डिजाइन, डांस और म्यूजिक में नहीं पढ़ाई जाता।

साथ ही, यहां आर्किटेक्चर की शुरुआती पढ़ाई मुहैया नहीं कराई जाती। वैसे, मुल्क की भी हालत इससे जुदा नहीं है। भारत के किसी राज्य में 10+2 के स्तर में इन विषयों की पढ़ाई नहीं मुहैया कराई जाती। यह बात तो सच है कि 5000 सवालों का बैंक बनाने से छात्रों की अलग सोच खत्म हो जाएगी। इसमें राज्य सरकार और शिक्षाविदों ने कल्पनाशीलता के नाम पर बस व्यवस्था को बदलने की कोशिश की है। इससे फायदा छात्रों को हो न हो, लेकिन सरकार को जरूर होगा। कैसे दरअसल, इस वजह से उसे पैसे कमाने का अच्छा-खासा रास्ता जो मिल जाएगा।

नौ साल पहले भी सरकार ने ऐसे ही एक तुगलकी फरमान के तहत रातोंरात 11वीं और 12वीं कक्षा को कॉलेजों से अलग कर स्कूलों की तरफ भेज दिया था। तब से लेकर आज तक 10वीं के बाद 11वीं कक्षा में जगह पाने के लिए उन कुछेक स्कूलों के कई चक्कर काटने पड़ते हैं, जहां सरकार ने 11वीं और 12वीं कक्षा की पढ़ाई की अनुमति दी है।

इन स्कूलों में प्रवेश के लिए लोगों को मोटी-ताजी रकम चुकानी पड़ती है। इस मामले में एकमात्र सहायता उन्हें समानांतर कॉलेजों और मुक्त विद्यालय व्यवस्था से मिलती है। इस मामले में सरकार कोई भी कदम उठाने से इसलिए हिचकिचाती है क्योंकि किसी स्कूल में उच्चतर माध्यमिक स्तर की पढ़ाई की इजाजत देने के एवज में उसे मोटी रकम मिलती है। साथ ही, यह स्कूलों के लिए फायदे का सौदा है क्योंकि वह बच्चों के माता-पिता से प्रवेश के बदले में मोटा डोनेशन वसूलते हैं।

अब एक नए फॉर्मूले के तहत सरकार ने उच्चतर माध्यमिक पाठयक्रम में प्रवेश के लिए इस साल से सिंगल विंडो सिस्टम लाने की सोच रही है। उच्चतर माध्यमिक स्तर पर इस सरकारी एकाधिकार से प्राइवेट और सरकारी, दोनों तरह के स्कूलों में सीटों की तादाद काफी बढ़ जाएगी। साथ ही सरकारी खजाने में भी करोड़ों रुपये का फायदा होगा। इसके अलावा, इससे स्कूल भी मोटी कमाई कर पाएंगे। कैसे?

दरअसल, ज्यादा सीट होने से वे ज्यादा डोनेशन भी तो जुटा पाएंगे। फायदा केवल प्राइवेट स्कूलों को ही होगा, ऐसी बात नहीं है। अच्छे सरकारी स्कूल भी डोनेशन की इस बहती गंगा में हाथ धो पाएंगे। अच्छे सरकारी स्कूलों में भी तो लोग-बाग अपने बच्चों को एडमिशन दिलाने के लिए कोई रकम चुकाने के लिए तैयार रहते हैं। इससे पैसों के लिए तरस गए इन स्कूलों को राहत मिलेगी।

एक ऐसी सरकार जो पिछले नौ सालों में उच्चतर माध्यमिक की पढ़ाई को कॉलेजों से अलग करने के बाद पर्याप्त सीट नहीं उपलब्ध करा पाई है, उम्मीद कर रही है कि इस सिंगल विंडो सिस्टम से उसकी सारी दिक्कतें खत्म हो जाएंगी। केरल सरकार तो इस प्रणाली को डिग्री कॉलेजों में भी लागू करना चाहती है। लेकिन इस वजह से समानांतर कॉलेजों का सूबे से अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।

ऐसे कॉलेज केवल गरीब बच्चों को शिक्षा ही नहीं देते, बल्कि पढ़े-लिखे लोगों को रोजगार भी देते हैं। लेकिन अगर सरकार का उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पर एकाधिकार कायम हो गया तो वे बीते हुए कल की बातें बनकर रह जाएंगे। इस हालत में स्कूलों को मोटा डोनेशन देने में अक्षम लोगों को अपने बाल-बच्चों को ओपन स्कूल सिस्टम में ही भेजना पड़ेगा, जिसे सरकार कम से कम अभी तो बंद करने के बारे में नहीं सोच रही है। 

First Published : May 26, 2008 | 11:37 PM IST