सिंगुर का भविष्य खतरे में पड़ा है।
अगर पश्चिम बंगाल सरकार जल्द से जल्द कोई बीच का रास्ता नहीं निकाल पाती है, या फिर ममता बनर्जी फजीहत से बचने के लिए अपने अड़ियल रवैये से पीछे नहीं हटती हैं तो पश्चिम बंगाल के हाथों से यह अभूतपूर्व परियोजना छिन जाएगी।
इसके साथ ही टाटा मोटर्स संयंत्र में राज्य के 4,500 लोगों को रोजगार मिलने जो संभावनाएं थीं उन पर भी पानी फिर जाएगा। टाटा मोटर्स की परियोजना के लिए 13,000 किसानों से जमीन ली गई थी जिनमें से 4,000 किसानों ने जमीन के बदले भुगतान लेने से इनकार कर दिया है और वे कारखाने के गेट के बाहर इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं।
इस परियोजना की कुल पूंजी लागत 1,500 करोड़ रुपये है और किसानों को 1,000 एकड़ जमीन के लिए 100 करोड़ रुपये चुकाये गये हैं। अगर किसानों को दिये जाने वाले भुगतान को दोगुना भी कर दिया जाता है तो भी इस परियोजना पर कोई खास बोझ नहीं पड़ेगा। ममता बनर्जी सिंगुर में जिस भीड़ के साथ परियोजना का विरोध कर रही हैं, उसे रहने और खाने पीने पर ही हर दिन 50 लाख रुपये का खर्च आता होगा।
टाटा मोटर्स ने अपनी नैनो परियोजना के लिए पहली पसंद के तौर पर पश्चिम बंगाल को चुना था क्योंकि राज्य सरकार ने कंपनी को राज्य में यह परियोजना शुरू करने के लिए आमंत्रित किया था। रतन टाटा, मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य का काफी सम्मान करते हैं।
कंपनी का इस परियोजना के लिए पश्चिम बंगाल को चुनने के पीछे एक मकसद यह भी हो सकता है कि पिछले एक दशक से राज्य की औद्योगिक विरासत धुंधली होने लगी थी। अब अगर टाटा सिंगुर से अपने कदम वापस खींच लेती है तो यह राज्य के लिए बहुत बड़ा झटका होगा और कंपनी को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा क्योंकि वह पहले ही इस परियोजना पर 350 से 500 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है।
पर यह साफ है कि इस नुकसान के डर से कंपनी सिंगुर से परियोजना हटाने में झिझकेगी नहीं क्योंकि उत्तराखंड का मौजूदा पंतनगर संयंत्र कंपनी के लिए एक विकल्प के तौर पर शुरू से ही खड़ा है। टाटा सिंगुर से कदम वापस खींचने के बाद तत्काल नैनो परियोजना के लिए पंतनगर संयंत्र का रुख कर सकती है।
अगर नैनो परियोजना को सिंगुर से हटाया जाता है तो इससे सबसे बड़ी हार ममता बनर्जी की होगी, जिनके ऊपर लोगों का गुस्सा इस बात को लेकर फूटेगा कि उन्होंने राज्य को एक ऐसी परियोजना से दूर कर दिया जिसकी चर्चा विदेशों तक में थी। हालांकि मौजूदा स्थितियां तो यही संकेत दे रही हैं कि आने वाले विधानसभा चुनावों में सिंगुर का पासा ममता पर उलटा पड़ सकता है।
हो सकता है कि वाम दल जो राजनीतिक मोर्चे पर अभी काफी पीछे चल रहे हैं, वे भले ही राज्य में औद्योगिक विकास के प्रयास में विफल रहे हों, पर उसे इस मामले का फायदा मिल जाए। माना कि सिंगुर से परियोजना हटाने से टाटा को नुकसान होगा पर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि टाटा जैसे समूह के लिए 350 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना बहुत बड़ी बात नहीं है।
इससे चोट तो जरूर पहुंचेगी पर इसका मतलब यह नहीं है कि नैनो परियोजना के पूरा होने में इससे कोई रुकावट आएगी या फिर इससे नैनो कार की कीमत पर कोई असर पड़ेगा। राज्य में कई और औद्योगिक परियोजनाएं आने वाली हैं जिनमें से तीन तो टाटा समूह की ही हैं।