कुछ दिन पहले पहले आए ब्रिटेन सरकार के बजट का अध्ययन करने के बाद मैंने महसूस किया कि भारत की राजकोषीय नीति जरूरत से अधिक पुरानी और निष्प्रभावी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में बजट तैयार करने की प्रक्रिया पर ब्रिटेन की छाप रही है और नयापन का घोर अभाव रहा है। इससे भी अधिक जरूरी बात यह है कि ब्रिटेन बहुत पहले एक सक्षम एवं आधुनिक प्रणाली की तरफ बढ़ गया था मगर भारत इस मामले में जहां था वहीं खड़ा है। भारत में बजट में पारदर्शिता का अभाव होता है और साक्ष्यों एवं ठोस बातों की तुलना में भाषणबाजी अधिक दिखती है। इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता है कि वित्त मंत्रालय की कमान कौन संभाल रहा है। आम लोग जल्द ही बजट में भारी भरकम मगर खोखली घोषणाओं के छलावे में आ जाते हैं।
ब्रिटेन में दो बजट-एक बसंत और दूसरा शीत ऋतु में- पेश किए जाते हैं। इन दोनों बजट में अगले तीन वर्षों की रूप-रेखा पेश की जाती है, इनमें कही गई बातों में परिस्थितियों के अनुसार संशोधन होते रहते हैं। हाल में बसंत ऋतु में पेश बजट में 2024 से बुनियादी आय कर दर में कमी की बात कही गई है। इसके अलावा महंगाई के कारण लोगों पर बढ़ा बोझ कम करने के तत्काल उपायों की भी घोषणा की गई है। इन प्रावधानों के लिए रकम तेल एवं गैस कंपनियों को हुए मोटे मुनाफे पर कर एवं महंगाई कर के जरिये जुटाई जाएगी। भारत में पेश बजट के विपरीत ब्रिटेन के बजट में आर्थिक हालात से जुड़ी घोषणा ऑफिस फॉर बजट रिस्पॉन्सिबिलिटी (ओबीआर) के अनुमानों पर आधारित होती हैं। भारत में कराधान में मामूली बदलावों को अधिक जोर शोर से प्रचारित किया जाता है मगर आर्थिक हालात और इन्हें बेहतर बनाने के उपायों पर अधिक जोर नहीं दिया जाता है।
ब्रिटेन में ओबीआर अपने अनुमानों के पीछे गणनाओं को सार्वजनिक पटल पर रखता है जबकि भारत में अधिकारी बिना किसी ठोस आधार एवं विश्लेषण के अनुमान व्यक्त करते हैं। ब्रिटेन में मध्यम अवधि के आर्थिक अनुमान के साथ ही मध्यम अवधि के राजकोषीय ढांचा भी तैयार किया जाता है। ओबीआर ने मध्यम अवधि के लिए आर्थिक विकास का अनुमान कम कर दिया है और यूरोप में युद्ध को देखते हुए महंगाई के अनुमान में इजाफा कर दिया है। सत्ताधारी दल की आपत्ति के बाद भी यह अपने अनुमान से नहीं डिगा है। ओबीआर ने यह भी कहा है कि यूरोपीय संघ से निकलने के बाद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव होगा।
ब्रिटेन की सरकार इस निष्कर्ष को अस्वीकार नहीं कर सकती और भविष्य की राजकोषीय नीति पर लगाई गई सीमाओं के परिणामों को भी स्वीकार करना होगा। कोई भी अधिकारी या पार्टी में राजनीतिक अर्थशास्त्री कोई विकल्प सुझाते है। हां, वे ओबीआर के विश्लेषण पर प्रश्न जरूर उठा सकते हैं। सरकारी व्यय और कराधान योजनाओं के आधार पर ओबीआर भविष्य में सरकार के उधारी कार्यक्रम का खाका पेश करती है। सरकार में सार्वजनिक क्षेत्र शामिल होता है मगर सार्वजनिक बैंक इसका हिस्सा नहीं होते हैं। यह व्यावहारिक तौर पर उधारी का अनुमान लगाकर स्थिति स्पष्ट कर देता है जिसके बाद बजट से बाहर उधारी की बातें नहीं होती हैं। भारत में बजट पेश होने के बाद भी उधारी को लेकर चर्चा चलती रहती है। मध्यम अवधि में सार्वजनिक कर्ज में कमी आने के अनुमान के आधार पर ओबीआर राजकोषीय नियम का अनुपालन सुनिश्चित करता है ताकि कर्ज ओबीआर के अनुमान से अधिक नहीं हो जाए। चूंकि, कर्ज-जीडीपी अनुपात में कमी आने का अनुमान है इसलिए सरकार को अनुमानों के अनुरूप उधारी कम करने का प्रयास करना चाहिए, यह परिचालन नियम का तालमेल तीन मुख्य बातों के साथ होना चाहिए। पहली बात यह कि तीन वर्षों में राजस्व घाटा कम होकर शून्य रह जाना चाहिए। दूसरी बात यह कि सार्वजनिक निवेश राजकोषीय क्षमता के अनुरूप रहना चाहिए और मध्यम अवधि में यह औसतन जीडीपी के तीन प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। तीसरी बात यह कि कल्याण कार्यों पर व्यय एक निर्धारित सीमा से कम रहना चाहिए। वित्त मंत्रालय इसका निर्धारण करता है और सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा करता है।
इस तरह एक तकनीक, साक्ष्य आधरित प्रभावी, मध्यम अवधि का राजकोषीय ढांचा अमल में लाया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, साक्ष्य आधारित और संस्थागत आधार पर होती है। ओबीआर तकनीकी एवं संस्थागत आधार पर उपलब्ध कराता है। वित्त मंत्रालय इन आधारों का इस्तेमाल कर मध्यम अवधि के लिए योजना तैयार करता है। अगर कोई चर्चा होती है तो वह परिणामों को लेकर होती है, न कि आंकड़ों की वैधता को लेकर। लिहाजा ऑनलाइन बजट घोषणा में विशेषज्ञों की टिप्पणियां भी शामिल होती हैं। कर और व्यय नीतियों में बदलाव का असर मध्यम अवधि में होता है और विकास तथा आय वितरण पर भी इसका असर होता है। यह स्पष्ट है कि कर ब्रिटेन में कर बोझ इस समय 1940 के बाद सर्वाधिक है। यह भी साफ है कि सरकार ईंधन की बढ़ती कीमतों के बोझ से राहत देने के लिए करों में इजाफा कर रही है। इसका लक्ष्य मुख्य रूप से गरीब और पिछड़े लोगों को राहत देना है।
कमजेार विकास दर और ऊंची महंगाई की डगर के परिणाम आने वाले समय में सरकार की अनुमानित उधारी से कम होंगे। इस अनुमान से राजकोषीय नियम का एक आधार मिलता है जो सार्वजनिक उधारी की प्रकृति और इसके घटकों को दर्शाता है।
अब प्रश्न यह है कि भारत में पारदर्शिता का अभाव वाले एवं पुराने ढंग से तैयार होने वाले बजट से बाहर निकलने में इतना संकोच क्यों देखा जा रहा है। हमारे पास राजकोषीय संरचना मजबूत बनाने के लिए आंकड़े एवं सूचनाएं मौजूद हैं। भारत में राजकोषीय लिहाज से एक उपयुक्त बजट नहीं होने की तीन वजह मौजूद हैं। इनमें पहला सरकार के भीतर असुरक्षा का भाव; दूसरा है निकट अवधि पर अधिक नजर और तीसरा है असंगठित वित्त मंत्रालय जिसमें अधिकारियों के पास विश्लेषण क्षमता का घोर अभाव है।
ऐसा नहीं है कि स्थिति सुधारने के लिए प्रयास नहीं किए गए हैं मगर हर बार इन्हें अधिकारियों की मनमानी और राजनीतिक अनदेखी का सामना करना पड़ा है। ओबीआर जैसी राजकोषीय परिषद स्थापित करने का अधिकारियों ने इस डर से विरोध किया है कि उन्हें बाद में उत्तरदायी बनना पड़ सकता है। बजट में मध्यम अवधि को लेकर ढांचे का अभाव होता है इसलिए इनका कोई इस्तेमाल नहीं होता है। वित्तीय संस्थानों की एवं एक के बाद एक वित्त मंत्रालयों के समझ नहीं होने और असंगठित वित्त मंत्रालय के कारण लालफीताशाही ने वाजिब सुधार की राह में रोड़े अटकाए हैं।
5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सपना रखने वाला देश एक औपनिवेशिक बजट प्रणाली के साथ आगे नहीं बढ़ सकता है। सरकार को राजकोषीय एवं बजट प्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देनी चाहिए।
(लेखक ओडीआई, लंदन के प्रबंध निदेशक हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)