भारत में छोटे कस्बे विकास की दिशा में बढ़ते ही जा रहे हैं। लेकिन अहम् सवाल यह है कि क्या ये शहर विकास का प्रबंधन करने में सफल होंगे या अपने भीतर से ही चरमरा जाएंगे?
शहरों में कूड़े के ढेर लग रहे हैं, कारों की बढ़ती संख्या से सड़कों पर जाम लग रहे हैं, जल निकासी व्यवस्था ध्वस्त है, गंदे पानी के शोधन की कोई व्यवस्था नहीं है।क्या ये शहर इन सबसे ध्वस्त हो जाएंगे? वर्तमान में वस्तु स्थिति यह है कि बड़े शहरों में यह व्यवस्था चौपट है। इसका कोई समाधान नहीं निकल रहा है कि इस विकास से कैसे निपटा जाए।
शहरों में मॉल बन रहे हैं, बहुमंजिले पॉश रिहायशी अपार्टमेंट बन रहे हैं, इन इलाकों में हरियाली की व्यवस्था भी की जा रही है, लेकिन यह कोई नहीं जानता कि यहां पर सभी के लिए पेयजल की आपूर्ति, सबको रहने के लिए आवास, गंदे पानी का शोधन और वाहनों की बढ़ती हुई संख्या को ध्यान में रखते हुए पार्किंग की व्यवस्था कैसे की जाए। इससे भी बड़ी समस्या यह है कि इन इलाकों में रहने वाले लोगों द्वारा लगाए जा रहे कचरे के ढेर का निस्तारण किस तरह से किया जाए।
शहरी भारत एक ऐसी सपनों की दुनिया में जी रहा है जहां यह उम्मीद की जाती है कि पैसे से सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं। यह प्रगति की ऐसी मायावी दुनिया है जिसमें कल के शहरों का पतन तो होना ही है। ऐसा तब है जब हम अलग तरीके से काम करना नहीं सीखते। इसके लिए जरूरी है कि महानगरों का अनुकरण नहीं किया जाए। यह समझना होगा कि भारत में ऐसे शहर बनाने के लिए इतना पैसा नहीं है कि वह औद्योगिक दुनिया की झलक दे सके। हकीकत यह है कि दुनिया के धनी देशों के पास भी इतना धन नहीं है कि वे हर शहर को न्यूयार्क या लंदन जैसा बना दें।
इसकी प्रमुख वजह यह है कि इस तरह के शहरी विकास में पर्याप्त धन और संसाधन, दोनों की जरूरत होती है। शहरी विकास के इस मॉडल का मतलब हुआ कि इसमें बड़ी मात्रा में ऊर्जा और सामग्री की जरूरत होती है और इससे बड़ी मात्रा में कचरे का ढेर तैयार होता है। इसका प्रभाव यह होता है कि पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने के लिए मोटी रकम की जरूरत होती है, जो एकमुश्त नहीं बल्कि लगातार खर्च करनी पड़ती है।
वहीं दूसरी ओर इसका एक प्रभाव यह भी होता है कि पूंजी का असमान वितरण होता है और गरीब तथा अमीर की एक रेखा खिंच जाती है। इससे शहरी इलाकों में जल आपूर्ति, जल निकासी, कचरे के निस्तारण और ट्रांसपोर्ट के खर्चे बढ़ जाते हैं। इससे समाज के हर वर्ग के खर्चे बढ़ जाते हैं। अगर भारत के विकास के लिए शहरी विकास के इस मॉडल को अपनाया जाए तो सवाल उठना लाजिमी है। इसका तकनीकी जवाब यह होगा कि फ्लाईओवर, सड़कों, पेयजल आपूर्ति जैसे छोटे और बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश किया जाए।
इसका एक उपाय और है कि राज्य को प्रभावी बनाया जाए, जिससे वे सेवाएं देने में सक्षम हों या इसकी आउटसोर्सिंग की जाए या इस काम में निजी क्षेत्र को लगाकर तेजी से काम कराया जाए। इसके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण साबित होगा सार्वजनिक-निजी हिस्सेदारी, जिसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक एजेंसियों की स्थिति में सुधार आएगा। लेकिन इससे भी ज्यादातर शहरों में पूरी तरह से समस्या का समाधान नहीं होगा। हमें यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि हमारे शहरी इलाकों में सेवा की हालत इसलिए नहीं बिगड़ी है कि गरीबों के लिए सब्सिडी दी जाती है।
ऐसा इसलिए है कि यह सब्सिडी धनी लोगों के लिए दी जाती हैं। इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। यह पूंजी और संसाधन दोनों ही मामलों में सही साबित होती है। हम सबके लिए स्वच्छ जल की आपूर्ति करते हैं, सबका कचरा एकत्र करते हैं या सबके लिए सड़कें बनाते हैं, यहां तक कि तुलनात्मक रूप से धनी लोगों के लिए पार्किंग स्थल बनाते हैं। हम कुछ लोगों को ही सुविधाएं देने के लिए सारा पैसा खर्च कर देते हैं जबकि शेष लोग यानी ज्यादातर आबादी जो अनधिकृत, अवैध कालोनियों और झुग्गी झोपड़ियों में गुजारा करती है, उन्हें मूलभूत बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल पाती हैं।
इस हालत में स्पष्ट है कि शहरों में जीवन स्तर गिरता जा रहा है। ऐसी हालत उन छोटे शहरों में है, जो बड़े हो रहे हैं। सवाल यह है कि क्या कुछ बेहतर किया जा सकता है। कारों का उदाहरण लेते हैं, जो शहरों के विकास के लिए स्टेटस सिंबल बन गई हैं। उभरते हुए शहरों में कारों की बढ़ती हुई संख्या से प्रदूषण बढ़ रहा है। सवाल यह है कि क्या छोटे शहर, कारों की संख्या में बढ़ोतरी करके बड़े शहरों की श्रेणी में छलांग लगा सकते हैं। जरूरी यह है कि ये शहर अपनी यातायात व्यवस्था को बसों, रेलगाड़ियों, साइकिल मार्गों और पैदल यात्रियों के लिए रास्ते विकसित करके करें।
दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसा आज ही से कर लिया जाए जैसा वैंकूवर से लेकर बर्लिन तक के पुराने धनी शहर आने वाले दिनों के लिए करने पर विचार कर रहे हैं। प्रदूषण और जाम को देखते हुए ऐसे छोटे उपायों पर विचार किया जा रहा है, जबकि उभरते हुए शहरों में भी यातायात के इस तरह के उपायों पर विचार करना चाहिए। ऐसा ही जल, जल निकासी, कचरे और अन्य समस्याओं के मामले में भी हमारे शहरों में किए जाने की जरूरत है।
स्पष्ट है कि भारत के छोटे शहर अब बड़े बन रहे हैं। ऐसे में इन शहरों के लिए बेहतर और अलग किए जाने की जरूरत है। लेकिन इसके लिए यह जरूरी होगा कि यहां के लोग इस बात के लिए तैयार हों कि वे एक और शंघाई, न्यूयार्क या मुंबई नहीं चाहते। इसकी जगह पर उन्हें अपने सपनों का शहर बनाना होगा, जो उनकी उम्मीदों, जरूरतों और हकीकत पर आधारित हों। अब सवाल यह उठता है कि क्या उनके अंदर यह साहस है कि वे अलग तरह के सपने देखें और उसे हकीकत में तब्दील कर दें?