नई अन्वेषण एवं लाइसेंसिंग नीति (नेल्प) के तहत तेल एवं गैस ब्लॉक के आवंटन में सातवें दौर की बोली को आंशिक कामयाबी के रूप में ही देखा जा सकता है।
हालांकि इसका एक सकारात्मक पहलू यह रहा कि बोली में सात अन्य कंपनियों के साथ दो अंतरराष्ट्रीय कंपनियों- ब्रिटिश पेट्रोलियम (रिलायंस की साझेदारी में) और बीएचपी बिलिटन (जीवीके के साथ) ने भी भाग लिया। बोली तो ब्रिटिश गैस जैसी बड़ी कंपनी ने भी लगाई थी, जो भारत में तेल-गैस अन्वेषण के मैदान में अपना खाता खोल चुकी है। यह बात दीगर है कि उसे कामयाबी नहीं मिली।
एस ब्लॉक नाम के इस नए ब्लॉक के लिए 100 कंपनियों की ओर से बोलियां लगाई गई थीं, जिसके लिए अन्वेषण का पूर्व अनुभव होना जरूरी नहीं था। हर बार की तरह इस बार भी क्षेत्र की प्रमुख घरेलू महारथी कंपनी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) की ओर से सशक्त दावेदारी पेश की गई थी, जो अब तक 57 प्रस्तावित ब्लॉक में से एक तिहाई को अपनी झोली में डाल चुकी है। अन्वेषण उद्योग अब तक के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है और पिछले साल की तुलना में इस बार गहरे पानी में भंडारों को ढूंढ निकालने में 40 फीसदी अधिक खर्च करना पड़ रहा है।
कंपनियों को भी हर दिन करीब 2,50,000 डॉलर तक की रकम खर्च करनी पड़ रही है। इसके बाद भी कंपनियों ने अब तक संयुक्त रूप से इस क्षेत्र में करीब तीन अरब डॉलर का निवेश किया है, जो बड़ा निवेश माना जा सकता है। पर इन अच्छी खबरों के साथ कुछ बुरी खबरें भी मिल रही हैं। वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने फरवरी में अपने बजटीय भाषण में अनुमान लगाया था कि इस क्षेत्र में निवेश का आकार 3.5 से 8 अरब डॉलर के बीच रहेगा, लेकिन असल में जो निवेश सामने आया है, वह तो न्यूनतम अनुमान से भी कम निकला।
अनुमान तब व्यक्त किया गया था जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं। लेकिन अब तो कच्चे तेल में जबरदस्त उबाल आया है और कीमतें भी 145 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा छू चुकी हैं। लेकिन उसके बाद भी तेल और गैस के ज्यादा से ज्यादा भंडार ढूंढने के लिए निवेश को बढ़ाया नहीं जा रहा है। इसके लिए कुछ हद तक भ्रम की वह स्थिति भी है, जो गैस उत्पादन पर कर में छूट के आखिरी दिन की स्पष्ट घोषणा नहीं करने की वजह से पैदा हुई। साथ ही दो बार बोली की तारीख टाल देने से भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, क्योंकि इसी बीच लीबिया और मलेशिया ने अपनी बोली वापस ले ली थी।
यदि दोनों देश ऐसा नहीं करते, जो जाहिर तौर पर हमारे पास निवेश के और भी ज्यादा विकल्प होते। उम्मीद से कम निवेश प्राप्त होने की एक वजह यह भी रही कि 12 ब्लॉकों के लिए किसी ने बोली ही नहीं लगाई। वहीं इटली की ईएनआई जैसी कुछ कंपनियां भी इसके पीछे कारण रहीं, जिन्होंने नेल्प 6 के लिए तो बोली लगाई थी पर नेल्प 7 के लिए उन्होंने दावेदारी पेश नहीं की।
दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी एक्सन मोबिल कंपनी ने इस बार केवल आंकड़े ही खरीदे और बोली में शामिल नहीं हुई। इस दिग्गज कंपनी की हिस्सेदारी को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने अपनी झोली में डाल लिया वह भी काफी कम कीमत पर। इससे निजी क्षेत्र की कंपनियों पर निश्चित तौर पर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने अपना दबदबा कायम कर लिया।