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रिश्तों की नई डगर

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 06, 2022 | 11:04 PM IST

नेपाल के चुनाव में माओवादी दलों की अप्रत्याशित विजय से बेहतर भविष्य की संभावनाओं के लिए अवसर मिला है।


पाकिस्तान सहित भारत के पड़ोसी देशों में लोकतंत्र बहाल हुआ है। अगर अवसर मिलता है तो इससे शान्ति और समृध्दि के नए द्वार खुलेंगे। सीमा पार के देशों में हुए परिवर्तनों से भारत के लिए संभावनाओं के नए द्वार खुले हैं।


दुनिया के तमाम देश और भारतीय, बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में संभावनाओं के नए द्वार देख रहे हैं। भारत को उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है जो कुछ दशकों से अपना स्वरूप बदल रही है। इस ऊर्जा के सार्थक प्रयोग के लिए भारत, वैश्विक पटल पर अपनी जगह तलाश रहा है।


इससे यह बात भी उभरकर सामने आती है कि भारत अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों को नया स्वरूप प्रदान करे। भारत तेजी से वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है। इससे हर शिक्षित भारतीय खुश है। इससे नए दायित्व भी उभरकर सामने आए हैं।


नेपाल के माओवादियों की इच्छा है कि भारत के साथ 1950 में शान्ति और मित्रता के लिए हुए भारत-नेपाल संधि को नए सिरे से परिभाषित किया जाए। भारत को इसे एक बेहतर अवसर के रूप में लेना चाहिए, जिससे वैश्विक उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के संचालन के लिए नियम बन सकें।


पिछले साल हुए ‘इंडिया एट 60’ के आयोजन के अवसर पर खुद भारत का विचार था कि भारत एक सॉफ्ट पॉवर है।  इसकी शक्ति 3-डी यानी डेमोक्रेसी (लोकतंत्र), डाइवर्सिटी (विविधता) और डेमोग्राफिक्स (जनांकिकी) पर निर्भर है। इसकी शक्ति इस बात पर भी निर्भर करती है कि विविधता को बरकरार रखते हुए लोकतंत्र को किस तरह से मजबूती मिले और युवा शक्ति का किस तरह से उपयोग हो।


भारत चाहता है कि उसके विभिन्न इलाकों में समृध्दि आए, हर इलाके में त्वरित विकास हो, सुरक्षा का माहौल बने और गरीबी के दुष्चक्र को तोड़ा जा सके। इन चाहतों को पूरा करने के लिए कुछ पुराने और गलत फैसलों को दफन किए जाने की जरूरत है। भारत की नेपाल नीति अब तक संवैधानिक राजशाही में बने लोकतंत्र के अनुरूप रही है। अब वह राजशाही अपनी अनुपयुक्तता और बुराइयों की वजह से खुद ही शिथिल हो गई है।


भारत ने नेपाल में फैले माओवाद को कुचलने के लिए रॉयल नेपाल आर्मी का सहयोग किया, जिनका संबंध कहीं न कहीं से भारतीय माओवादियों के साथ था। आज नेपाल के माओवादियों ने लोकतंत्र में गहरी पैठ बना ली है और चुनावों में उन्हें विजयी बढ़त मिल गई है। वे नेपाल की राजशाही को खत्म करना चाहते हैं। 


बहरहाल भारत की सहयोगी नेपाली कांग्रेस को चुनाव के बाद बने सत्ता समीकरण में गहरा धक्का लगा है। आर्थिक मोर्चे पर भी खतरनाक सड़कें बनाने और माल आपूर्ति के क्षेत्र में भारत कुछ खास नहीं कर सकता है। वहीं चीन ने नेपाल को बेहतर सुविधाएं प्रदान की हैं। माओवादियों के शासन में नेपाल ने वह सब कुछ छोड़ने का मन बना लिया है, जो शाह के शासनकाल में हुआ था।


जब उसने उचित समझा तो भारत के मामले में चीन कार्ड खेल दिया। ऐसा इसलिए है कि भारत, चीन से असुरक्षित महसूस करता है। भारत और चीन इस समय आपसी विश्वास बनाने में लगे हैं और धीरे-धीरे व्यापार के रास्ते खोल रहे हैं। चीन के पास इस समय भारी मात्रा में व्यापार अतिरेक और धन है, जिसके माध्यम से वह वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने में लगा है।


अब उसके पास नेपाल में भारत के लिए संकट खड़ा करने के लिए न तो समय है और न ही कोई जरूरत। इसकी जगह पर वह अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को नया आयाम देने में जुटा है, जैसा कि उसने हाल ही में जापान के साथ किया। आज नेपाल के नेता दूसरी भाषा बोल रहे हैं।


माओवादियों की इच्छा है कि भारत और चीन दोनो ही नेपाल के नए लोकतंत्र का समर्थन करें। हाल ही में नेपाल के एक मंत्री ने अपने बयान में कहा था कि वे चाहते हैं कि नेपाल, भारत और चीन के बीच बफर स्टेट की बजाय पुल का काम करे। बीते दिनों में भारतीय उपभोक्ताओं के  विदेशी सामानों के इस्तेमाल करने की भूख को पूरा करने का केंद्र बना हुआ था।


आज न केवल भारत में विदेशी माल मौजूद है, बल्कि छुट्टियां बिताने के लिए लोग विदेशों में जाने लगे हैं और वे उन देशों में खरीदारी करते हैं। एक बार अगर दोनों पक्षों ने अपनी नई जरूरतों को महसूस कर लिया तो उन्हें भविष्य की जरूरतों को नए सिरे से परिभाषित करना होगा। समझौते की फिर से व्याख्या करना या नए सिरे से समझौता करना न केवल माओवादी शासकों की मांग है, बल्कि वहां का शिक्षित तबका भी ऐसा ही चाहता है।


भारतीय अधिकारी और जो लोग उससे जुड़े हैं, उनकी भी राय है कि यह समझौता भारत की जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं। भारतीय लोगों को नेपाल में उस तरह का राष्ट्रीय मान सम्मान नहीं मिलता, जैसा एक संप्रभु देश के नागरिक को दूसरे देश से मिलता है। नेपाली भी भारत के बारे में कुछ ऐसा ही सोचते हैं। अगर सभी लोग यह सोचते हैं कि समझौता किसी काम का नहीं रह गया है, तो इससे छुटकारा पाना आसान है।


असली चुनौती यह है कि किस तरह के समझौते कर इसका नया विकल्प तैयार किया जाए। दोनों पक्षों की कुछ ऐसी महत्वपूर्ण जरूरते हैं, जिन्हें आगे की बातचीत के लिए चिन्हित किया जा सकता है। चारो ओर स्थल से घिरा नेपाल चाहता है कि उसे समुद्र मार्ग से सुरक्षित कारोबार का अवसर मिले। भारत चाहता है उसके इलाकों में आतंकी गतिविधियों का संचालन करने वाले तत्वों को नेपाल की जमीन पर जगह न मिले।


कुछ ऐसी ही उम्मीद नेपाल भी भारत के साथ करता है। भारत के लिए महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि वह इस बात को महसूस करे कि देश में चल रही नक्सली और माओवादी गतिविधियां गरीबी से जुड़े मुद्दे हैं। इसका लंबे समय के लिए एक मात्र उपचार यह है कि गरीबी को दूर किया जाए। अगर नेपाल के हाइड्रो पावर को भारत के सहयोग से संचालित किया जाता है तो इससे भारत में ऊर्जा की मांग को पूरा किया जा सकता है और नेपाल को भी इससे आर्थिक लाभ मिलेगा।


बाढ़ को रोकने के लिए दोनों देशों में आपसी सहयोग की जरूरत है, जो दोनों देशों के लिए लाभदायक होगा। तमाम विशेषज्ञों ने राय दी है कि दवाओं के अवैध कारोबार और मानव कारोबार को रोकने तथा मानसून परिवर्तन पर दोनों देशों के बीच सहयोग की अपार संभावनाएं हैं। इन समझौतों के लिए ज्यादातर भारतीय नेपाल की ओर देखते हैं। नेपाल में छुट्टियां बिताने के लिए बेहतर पर्यटन स्थल हैं, वहां शान्ति की जरूरत है और वहां के जंगलों और पहाड़ों को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए।

First Published : May 13, 2008 | 10:40 PM IST