लोकसभा ने मॉनसून सत्र में जो कुछ अंतिम विधेयक पारित किए उनमें से एक था ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) विधेयक 2022। इस विधेयक के कई पहलू रुचि जगाते हैं लेकिन संभवतः उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है देश में एक कार्बन बाजार का प्रस्ताव जिसमें उत्सर्जन का कारोबार किया जा सके और उसमें कमी लाई जा सके। खासतौर पर यह कानून केंद्र सरकार को यह इजाजत देगा कि वह कार्बन क्रेडिट के कारोबार की व्यवस्था बना सके और साथ ही यह उसे अधिकार देगा कि वह उत्सर्जन या कार्बन प्रमाणपत्र जारी कर सके जिनका बाद में कारोबार किया जा सकेगा।
कार्बन बाजार को ऐसा कानूनी समर्थन काफी देर से आया है। दुनिया भर में पहले ही तीन दर्जन से अधिक उत्सर्जन कारोबार योजनाएं हैं। इन सभी की क्षमताएं और विश्वसनीयता अलग-अलग है। इसमें अमेरिका जैसी रुकावटें भी हैं और इसमें कोई आश्चर्यचकित करने वाली बात नहीं है क्योंकि अमेरिका संघीय स्तर पर लगातार बुनियादी प्रगतिशील उपाय तक अपनाने में विफल रहा है। भारत ऐसी बाधा बनने वाले देशों में शामिल नहीं हो सकता है और इसकी तमाम वजहें हैं।
एक सक्रिय कार्बन बाजार कम से कम ऐसे कुछ क्षेत्रों में कार्बन का मूल्य तय करता है जहां उत्सर्जन में कमी करना काफी महत्त्वपूर्ण है। यह बात भविष्य की अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं की दृष्टि से भी काफी महत्त्वपूर्ण साबित होने वाली है। कार्बन कारोबार का इस प्रकार अंतरराष्ट्रीयकरण करने की कोशिश की जा रही है ताकि समूची आपूर्ति श्रृंखला को अकार्बनीकृत किया जा सके। अगर ऐसा किसी विधान के द्वारा न भी किया जाए तो भी कई बड़े संस्थानों द्वारा ऐसा स्वैच्छिक आधार पर किया जाएगा तथा जो देश तथा क्षेत्र ऐसा करने में विफल रहेंगे उन्हें प्रतिस्पर्धी नुकसान का सामना करना पड़ेगा। सीमेंट और स्टील जैसे क्षेत्रों से जुड़ी चिंताएं भी ऐसे व्यापक व्यापार समझौतों को रोक सकती हैं जो भारत के हित में हैं।
यही कारण है कि मार्च में भारत और यूरोपीय संघ के बीच घोषित व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद के एजेंडे का एक बड़ा हिस्सा इन क्षेत्रों के साझा मानकों को लगातार नुकसान पहुंचा रहा है। भारत चीन को इन क्षेत्रों पर काबिज नहीं होने दे सकता है। हाल के दिनों में उसने अपनी क्षेत्रीय उत्सर्जन कारोबार योजनाओं का विस्तार और एकीकरण किया है। इसका संबंध भारतीय उद्यमी जगत की वर्तमान बाजार हिस्सेदारी का संरक्षण करना नहीं है। बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय कंपनियों के पास ऐसे समय में वैश्विक स्तर पर विकास की गुंजाइश है जब आपूर्ति श्रृंखला में कार्बन की मौजूदगी प्रतिस्पर्धी सफलता का अहम निर्धारक होगा।
बहरहाल, कुछ अहम घरेलू कदम उठाना भी आवश्यक है। सबसे पहले, एक ही उद्देश्य के लिए एक से अधिक प्रणालियां नहीं होनी चाहिए। वर्तमान परफॉर्म, अचीव ऐंड ट्रेड (पीएटी) व्यवस्था को किसी भी नयी उत्सर्जन कारोबार प्रणाली में समाहित किया जाना चाहिए। ऐसी किसी भी प्रणाली को पेरिस समझौते के अधीन देश के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान के अनुरूप किया जाना चाहिए।
कार्बन बाजार के नियामकीय सिद्धांत और एक अधिकारप्राप्त नियामक की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि इसे शुरुआत से ही व्यवस्थित किया जा सके तथा बाद में डिजाइन होने वाली किसी अंतरराष्ट्रीय योजना में आसानी से शामिल किया जा सके। अंत में, भारत को अपने तकनीकी ज्ञान का भी लाभ लेना चाहिए ताकि यह निर्धारित करने के आधुनिक तरीके निकाले जा सकें कि बाजार प्रतिभागी उत्सर्जन में कमी के अपने वादे पूरे कर सकें। दूसरे शब्दों में कहें तो नियामकों द्वारा कम लागत वाली, तकनीक संपन्न और पारदर्शी निगरानी, रिपोर्टिंग और प्रमाणन की योजना विकसित करने की आवश्यकता है। अभी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना शेष है।