एक समय था जब वैज्ञानिक और तकनीकी मानव संसाधन के मामले में हम विश्व में तीसरे स्थान पर थे। भारत को अपनी इस उपलब्धि पर गर्व था। इस पूल से जुड़े हुए लोग अपनी शिक्षा के मुताबिक अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे थे।
गुणवत्ता के मामले में भी इनकी वैश्विक स्वीकार्यता थी, जिन्हें भारत में डॉक्टरेट या पीएचडी (उच्च स्तर के मानवीय ज्ञान में शोध उपाधि) की उपाधियां मिलती थी। अब ऐसा लगता है कि भारत न केवल प्राथमिक शिक्षा के मामले में पीछे जा रहा है, बल्कि पीएचडी जैसी उपाधियों के मामले में भी दुनिया से पिछड़ रहा है।
रक्षा सेवाओं के मामले में, पोस्ट ग्रेजुएट शोध में भी उच्च शिक्षा पाने की इच्छा रखने वाले छात्रों की संख्या कम हो रही है। यह अनुपात अब पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई पूरा करने वाले 1000 छात्रों में एक छात्र का रह गया है, जो डॉक्टरेट की उपाधि लेना चाहते हैं।
हाल ही में बिजनेस स्टैंडर्ड ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसके मुताबिक कार्पोरेट सेक्टर में वेतन बहुत तेजी से बढ़ा है और इससे भी तेजी से और तेज अनुपात में शोध कार्यक्रमों में आवेदन करने वाले छात्रों का अनुपात घटा है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि कुछ अपवादों को छोड़कर वे ही छात्र पीएचडी का विकल्प चुनते हैं, जो बेरोजगार रहते हैं।
यह पूरी तरह से तर्कसंगत व्यवहार है, जिसके बारे में कोई शिकायत नहीं कर सकता। यह देखकर थोड़ी सी राहत मिल सकती है कि पीएचडी की उपाधि के लिए घटती संख्या सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में अधिक है। लेकिन अगर देखें तो यह गिरावट हर क्षेत्र में आई है, चाहे वह विज्ञान हो, इंजिनियरिंग हो, मेडिकल हो या फिर कानून। इससे भी बुरी बात यह है कि आज की तारीख में यूनिवर्सिटी में जो रिसर्च हो रही है, वह किसी काबिल नहीं है।
करीब दो दशकों से देखा जा रहा है कि खुद रिसर्च सुपरवाइजरों की गुणवत्ता भरोसे के लायक नही हैं (जाहिर है, कुछेक मामलों को छोड़कर)। हकीकत में विश्वविद्यालयों ने मानकों को इतना ढीला कर दिया है कि कुछ विश्वविद्यालय आज की तारीख में आंखें बंद करके पीएचडी की डिग्री जारी कर रहे हैं। कुछ जगहों पर तो इन डिग्रियों को केवल 25 हजार रुपये तक में खरीदा तक जा सकता है। मतलब हमारा मुल्क आज दोहरी मार झेल रहा है।
एक तरफ, असल और उम्दा पीएचडी डिग्रियों की तादाद गिरती जा रही है, वहीं घटिया और नकली पीएचडी डिग्रियों की तादाद तेजी से बढ़ती जा रही है। अर्थशास्त्र के नजरों से देखें तो यह बस एक बड़े संकट के लक्षण भर हैं, जिसकी वजह से मुल्क में उच्च शिक्षा में कुशल लोगों की भारी कमी आ सकती है। यह ऐसे वक्त में हो रहा है, जब देश में उच्च शिक्षण संस्थानों में सीटों की तादाद बढ़ाई जा रही है। इसका मतलब यह हुआ कि इससे अंडर ग्रैजुएट छात्रों और ग्रैजुएट्स की गुणवत्ता पर भी काफी असर पड़ेगा।
यह अक्सर कहा जाता है कि हमें पीएचडी की पढ़ाई से ज्यादा जोर अच्छी पोस्ट ग्रैजुएट पढ़ाई और प्राइमरी शिक्षा पर होनी चाहिए। लेकिन यह तो हकीकत ही रहेगी कि अगर हम अच्छे विश्वविद्यालय चाहते हैं, तो अच्छे डिग्रियों से लैस, अच्छे फैकल्टी मेंबर होने चाहिए। इस मुश्किल लक्ष्य को पाने का एक रास्ता यह हो सकता है कि हम मुल्क को छोड़कर बाहर जा चुके हजारों रिसर्च छात्रों को वापस लाने की कोशिश करें। लेकिन अपने विश्वविद्यालयों में वेतन को बढ़ाए बिना यह लक्ष्य हासिल करना नामुमकिन है।