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अब आया मोनसैंटो को बाल श्रमिकों का ख्याल

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 7:05 AM IST

एक ओर सरकार देश में बाल श्रम को रोकने के लिए कानून बना रही है तो दूसरी ओर एक हकीकत इससे काफी जुदा है।


बड़े पैमाने पर नन्हें बच्चों के कोमल हाथ कपास के बीजों के उत्पादन के काम में जुटे हुए है। कपास के बीजों के उत्पादन से जुड़ा एक बड़ा नाम मोनसैंटो भी बाल श्रमिकों से अपने यहां काम कराने के मामले में आलोचना का केंद्र बन रहा है।

इस कंपनी पर आरोप लगा है कि कंपनी के बाल श्रमिकों के द्वारा ही देश के 50 प्रतिशत बीजों का उत्पादन होता है। आलोचना के घेरे में आए इस कंपनी ने यह फैसला किया है कि वह कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर)के तहत कुछ ऐसा काम करना चाहती है जिसके जरिए वह अपनी आलोचना को कम कर सकती है। पिछले ही हफ्ते ही  कंपनी अपने पहले प्रोजेक्ट के तहत बाल श्रमिकों को हटाने की घोषणा की है।

इस कंपनी के सीएसआर की इकाई मोनसैंटो फंड ने आंध्र प्रदेश में किसानों के बच्चों को पढ़ाने के लिएमोनसैंटो फंड लर्र्निंग सेंटर बनाया है। कंपनी ने यह रेसिडेंशियल लर्निंग सेंटर कुरनूल और महबूबनगर जिलों के अधिकतम 120 छात्रों की पढ़ाई का बीड़ा उठा रही है ताकि उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके। मोनसैंटो फंड के प्रेसीडेंट डेबोरा जे. पैटरसन का कहना है कि इसके जरिए बच्चे खेतों का काम छोड़ कर पढ़ाई करेंगे और माता-पिता के पास भी बच्चों को पढ़ाने का विकल्प होगा।

कंपनी का कहना है कि इस कंपनी का ध्यान केवल कपास के खेतों में काम करने वाले बच्चे पर ही नहीं है बल्कि सभी बच्चों पर है। हालांकि कंपनी की आलोचना करने वाले लोगों ने बाल श्रमिकों को कपास के खेत पर से हटाने की बात कही है। यह सीएसआर प्रोजेक्ट कुरनूल के एनजीओ वोडर्स और ऑस्ट्रेलिया फाउंडेशन फॉर पीपुल इन एशिया पैसेफिक के साथ साझेदारी कर लॉन्च करना चाहती है।

मोनसैंटो फंड के पुर्नवास कार्यक्रम में औपचारिक और व्यवसायिक शिक्षा को भी शामिल किया गया है। यह सेंटर ब्रिज स्कूल की तरह काम करेगा जहां बच्चों को खेत से लाकर शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जाता है। इसके तहत तीन साल के लिए 2.2 करोड़ का फंड दिया जाता है। पैटरसन ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा कि मोनसैंटो दूसरे राज्यों के लिए दूसरे मॉडल की खोज कर रही है।

हैदराबाद के ग्लोकल रिसर्च के कृषि शोर्धकत्ता और कंपनी के बाल अधिकार टीम के सदस्य वी. दावुलुरी का कहना है, ‘कंपनी किसी समस्या का हल खोजने के लिए हमेशा सकारात्मक रही है हालांकि अभी भी कुछ ऐसी मुद्दे हैं जिसके लिए ठोस कदम उठाना जरूरी है।’ उनका मानना है कि स्कूल प्रोग्राम में काफी अंतर आ जाता है क्योंकि वहां 70 वैसे छात्र आते हैं जिसमें से शायद ही कोई कपास के खेत में काम करने वाला होता है।

इसमें से कोई काम करने वाले छात्र भी नहीं होते। इसीलिए उन्होंने अपनी कंपनी को काम करने वाले बच्चे को अपना टारगेट बनाने को कहा है जो कपास के खेत में काम करते हैं। हालांकि दूसरी ओर कंपनी का कहना है कि वे बाल श्रमिकों को केवल कपास के खेतों में काम करने वाले बाल श्रमिकों की समस्या को व्यापक तौर पर देखते हैं। कंपनी के सार्वजनिक मामलों के सिनियर मैनेजर क्रिस्टोफर सैमुअल का कहना है, ‘किसी स्कूल को  केवल कपास के खेतों में काम करने वाले छात्रों तक ही सीमित करना एक छोटा नजरिए को ही दर्शाता है। उनके मुताबिक स्कूलों का परिसर अक्षम बच्चों के लिए भी होना चाहिए।’

मोनसैंटो फंड की योजना दूसरे राज्यों के बाल श्रमिकों के लिए ज्यादा स्कीम बनाने की है। पैटरसन का कहना है, ‘इसका लक्ष्य और काम करने का दायरा मोनसैंटों के बिजनेस से अलग है, हम जब बिजनेस के लाभ से अलग कोई सीएसआर का काम करते हैं तो हम थोड़ा अलग तरह से सोचते हैं।’ सामान्य फसलों के मुकाबले कपास के बीज की खेती में एक एकड़ जमीन पर 25 गुना ज्यादा मेहनत की जरूरत पड़ती है।

मसलन किसी भी फसल में अगर एक एकड़ जमीन पर एक दिन में 60 आदमी काम करते है तो कपास का बीज उपजाने के लिए एक दिन में 1500 आदमियों को काम करना पड़ेगा। इसी वजह से उत्पादन लागत का 60 प्रतिशत मजदूरी के साथ भी जोड़ा जाता है। इसी वजह से खेतों के मालिक अपनी लागत में थोड़ी कमी लाने के लिए बाल श्रमिकों को ज्यादा पसंद करते हैं। मोनसैंटों ने जब अपने खेतों में पुनर्वास इंसेंटिव का ऑफर दिया तब कहीं जाकर उसे बाल श्रमिकों की समस्या को पहचाना।

उसने किसानों को बतौर 15 रुपये प्रति किलो कॉटन के लिए इंसेंटिव देने का ऑफर दिया ताकि बाल श्रमिकों को दूर रखा जाए। वर्ष 2005 में मोनसैंटो फार्म के बाल श्रमिकों के सर्वेक्षण के दौरान तमिननाडु और आंध्रप्रदेश में 20 प्रतिशत की कमी देखी गई। यहां किसान क पास के बीजों का उत्पादन कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के आधार पर करते हैं। पिछले तीन सालों में कंपनी ने किसानों को जो इंसेंटिव दी गई है इसकी वजह से ही यहां बाल श्रमिकों की दर महज 0.5 रह गई है।

First Published : June 24, 2008 | 10:41 PM IST