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अब फिर से उग रहा है पूरब का सूरज

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 6:46 PM IST

एक हजार साल पहले तक एशिया, खास तौर पर भारत और चीन को दुनिया में सबसे अमीर और काफी उन्नत माना जाता था।


लेकिन 17 वीं सदी के आते-आते एशिया के आर्थिक दबदबे का सूरज पश्चिम की औद्योगिक क्रांति की वजह से अस्त हो गया। अब अर्थव्यवस्था पर यूरोप का झंडा लहरा रहा था, जो 20वीं सदी के आते-आते अमेरिकी झंडे के रूप में तब्दील हो गया।

आज 21वीं सदी में भी पश्चिमी मुल्कों की आर्थिक ताकत का झंडा लहरा रहा है, लेकिन अब एशियाई मुल्कों की ताकत में भी तेजी से इजाफा हो रहा है। चीन आज पूरी दुनिया में आर्थिक ताकत के रूप में तेजी से उभर रहा है।

अगर 1964 के ओलंपिक ने जापान को आर्थिक महाशक्ति का दर्जा दिला दिया था और अगर 1988 के सोल ओलंपिक ने दक्षिण कोरिया को विकसित मुल्क का तमगा दिलवा दिया था, तो हाल ही में खत्म हुआ 2008 का ओलंपिक भी चीन के लिए भी ऐसे ही वादे लेकर आया है।

पिछले लगभग 25 सालों से उसकी विकास की दर 10 फीसदी से ऊपर रही है। निर्माण और निर्यात के क्षेत्र में इसकी तरक्की की कहानी किसी से छुपी हुई नहीं है। लेकिन इसकी संगठनात्मक ताकत से काफी कम लोग परिचित थे, जिसने चीन की आर्थिक तरक्की में अपनी जबरदस्त भूमिका निभाई है।

इस संगठनात्मक ताकत की वजह से ही चीन एक बहुराष्ट्रीय सप्लाई चेन को बना सका और उसका अच्छी तरह से प्रबंधन भी कर रहा है। इस जबरदस्त संगठनात्मक ताकत का अंदाजा आप पेइचिंग ओलंपिक की धमाकेदार शुरुआत और उसके जबरदस्त प्रबंधन को देखकर लगा सकते हैं। इस वजह से अब लंदन के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

अगले ओलंपिक खेल औद्योगिक क्रांति की इसी जन्मभूमि पर होने वाले हैं और पेइचिंग की यादों को धुंधला करने के लिए उसे काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। अगर आर्थिक आधार पर बातें करें तो दुनिया अब काफी हद तक बदल चुकी है। पहले अमीर मुल्क मिलकर दुनिया में कारोबार के नियम तय करते थे और गरीब मुल्कों के पास उन्हें मानने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं रहता था।

लेकिन दोहा दौर की वार्ता एक बड़े बदलाव के रूप में सामने आई। भारत और चीन ने अपने राष्ट्रीय हितों के मुकाबले इस वार्ता को अहमियत देने से साफ इनकार कर दिया। अब तक तो अमेरिकियों और यूरोपियों के बीच एक अलिखित समझौता है कि केवल अमेरिकी ही विश्व बैंक का अध्यक्ष बनेगा और कोई यूरोपीय ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का मुखिया बन सकता है। लेकिन यह अब कुछ ही दिनों की बात है।

वैसे, इससे कोई खास असर भी नहीं पड़ेगा क्योंकि कभी काफी ताकतवर रही इन एजेंसियों की विकासशील मुल्कों पर से पकड़ छूटती जा रही है। चीन की अर्थव्यवस्था की विकास दर सचमुच काफी जबरदस्त है। चीन आज की तारीख में जापान और जर्मनी जैसे मुल्कों को पीछे छोड़ते हुए कारों का दूसरा सबसे बड़ा बाजार बन चुका है। इससे आगे केवल अमेरिका है।

आंकड़ों की मानें तो 2012 तक तो दुनिया भर के कुल लौह अयस्क उत्पादन के 50 फीसदी हिस्से का इस्तेमाल चीन अपनी भूख मिटाने के लिए करेगा। कुल एल्युमिनियम उत्पादन का 42 फीसदी हिस्सा भी सीधे चीन की तरफ रुख करेगा। साथ ही, निकल के वैश्विक उत्पादन का एक तिहाई हिस्से का इस्तेमाल केवल चीन ही करेगा।

खनिजों की इसकी भूख कुछ इस कदर बढ़ चुकी है कि पश्चिमी मुल्कों के विश्लेषक तो चीन को अफ्रीका की नई औपनिवेशिक ताकत की संज्ञा देने लगे हैं। हाल के भूकंप की वजह से चीन में काफी तबाही हुई थी, लेकिन सरकार के काम करने के तरीके से तो पूरी दुनिया भौचक्की रह गई। उसने तीन महीने के भीतर ही 10 लाख से ज्यादा मकान बनवा डाले।

कोई दूसरा मुल्क तो इस स्तर पर निर्माण कार्य के बारे में सपना भी नहीं देख सकता है। थ्री जॉर्ज नदी परियोजना जैसे बड़े प्रोजेक्ट को पूरा करने के बाद तो चीन पूरी दुनिया के लिए डैम बिल्डर बन चुका है। यहां हर हफ्ते, दस दिनों में हजार मेगावॉट की बिजली परियोजनाओं की शुरुआत हो रही है।

पक्की और चौड़ी सड़कों का एक लंबा चौड़ा जाल भी पूरे मुल्क में बिछाया जा चुका है, जिस पर ट्रक 70 किलोमीटर प्रति घंटा रफ्तार की बेखटक दौड़ सकते हैं। चीन सरकार ने 2015 तक पूरे मुल्क में 1.2 लाख किलोमीटर का लंबा चौड़ा रेल नेटवर्क बिछाने का लक्ष्य रखा है। इसमें कई सारे हाई स्पीड लिंक भी होंगे। यह सूची यहीं खत्म ही नहीं हो रही।

चीन अपने बुनियादी ढांचे का विकास वाकई काफी जबरदस्त तरीके से कर रहा है। चीन उभरते हुए एशिया का इकलौता ऐसा मुल्क है, जिसने इतने बड़े स्तर पर और इतनी अहमियत के साथ कामयाबी पाई है। ज्यादातर एशियाई मुल्कों को कामयाबी मिली भी है तो उसकी वजह भूमंडलीकरण, विदेशी पूंजी निवेश और बाहरी मुल्कों की तकनीक है।

इसमें कोई शक नहीं है कि इसमें उनकी बचत की दर और अच्छी नीतियों ने इसमें अपनी भूमिका निभाई है। लेकिन बड़े स्तर पर अर्थव्यवस्था में बदलाव के साथ-साथ सोच में भी बदलाव और खुद पर भरोसा रखना भी जरूरी है। तो चीन में यह बदलाव कैसे आए? जाहिर सी बात पहले जापान और बाद में चारों एशियन टाइगर्स की कामयाबी ने एक रोल मॉडल के तौर पर काम किया।

हालांकि, इसमें वियतनाम में अमेरिकी फौज की हार ने भी काफी अहम भूमिका निभाई। आखिर पिछले 300 सालों में पहली बार किसी बड़ी ताकत ने किसी एशियाई मुल्क से मात खाई थी। अगर एक छोटा सा गरीब मुल्क उन्हें जंग के मैदान पर हरा सकता है, तो बाजार के मामले में भी पश्चिमी मुल्कों को पीटना कोई मुश्किल काम नहीं होना चाहिए, क्यों?

अर्थव्यवस्था की तस्वीर की तरफ देखें तो एशिया और पश्चिमी मुल्कों के बीच अंतर साफ नजर आता है। यूरोप को नकारात्मक विकास का सामना करना पड़ा रहा है, जबकि जापान की हालत पतली हो रही है। वैसे तो जापान तो एक एशिया मुल्क है, लेकिन रंगभेद के चरम के दिनों में दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने जापानियों को ‘गोरों’ का दर्जा दिया था।

अमेरिका की हालत भी अच्छी नहीं रही है। इसकी वित्तीय व्यवस्था आज अव्यवस्था में बदल चुकी है और इसका राजकोषीय घाटा बढ़ता ही जा रहा है। दूसरी तरफ, वियतनाम की तरह अफगानिस्तान में भी अमेरिका के सिर पर हार की तलवार लटक रही है। वहां उसे तालिबान और अल कायदा से पार पाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

First Published : August 26, 2008 | 10:42 PM IST