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भारत के लिए तेल बाजार में है बहुत फिसलन

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 1:43 AM IST

लाख टके का सवाल


कच्चे तेल की आग से कैसे बचा जाए? यह आज सरकार के सामने लाख टके का सवाल है, जिसका जवाब गठबंधन की राजनीति में सरकार भी खोज रही है।

तेल और महंगाई जैसे चीली-दामन का साथ है, ऐसे में एक ऐसे समाधान की तलाश जो सर्वमान्य हो। मेरे हिसाब से दो सुझाव हो सकते हैं। पहला यह कि सरकार कच्चे तेल का आयात शुल्क खत्म करे और एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए, जिसमें सभी दलों के नेता और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हो।

मीटिंग का सभी चैनलों पर सीधा प्रसारण हो जिससे कि लोगों को पता चले कि उनके राज्यों में प्रतिनिधियों का क्या विचार है। दूसरा सुझाव कुछ अटपटा सा है लेकिन कारगर है। पेट्रोलियम पदार्थों को लेने के लिए इलेक्ट्रानिक कार्ड जारी किए जाएं, जिसमें मोटरसाइकिल पर हर महीने पहले 10 लीटर पेट्रोल सब्सिडी वाली कीमत पर और उसके बाद के पेट्रोल बिना सब्सिडी के दिए जाएं।

कारों पर यह 40 लीटर पेट्रोल सब्सिडी वाली कीमत पर दिया जाए उसके बाद के पेट्रोल बिना सब्सिडी के दिए जाएं, नहीं तो आने वाले दिनों में स्थिति बद से बदतर होती जाएगी। – सुरेंद्र सिंह कच्छ, स्वतंत्र पत्रकार, 9ए96 साकेत नगर, भोपाल (मध्य प्रदेश)

सरकारी खजाने का खाली होना तय


भारत का आने वाले छह माह बहुत ही संवेदनशील रहेगा। जहां तक अर्थव्यवस्था का सवाल है, कच्चे तेल के भाव 135 डॉलर के ऊपर जा पहुंचा है, जिससे अब न केवल भारत वरन सभी एशियाई देशों का तपना तय है। भारत की अर्थव्यवस्था में तेल की कीमत के नुकसान का अंदाज इस बात से पता चलता है कि मात्र तीन महीनों में तेल कंपनियों का घाटा हजारों करोड़ से ऊपर पहुंच गया है।

जहां  पेट्रोल पर सरकारी सब्सिडी 21 रुपये प्रति लीटर है वहीं डीजल पर 33 रुपये और घरेलू गैस पर यह 350 के आस-पास है, जिससे सरकारी खजाने का खाली होना तय है। अब अगले छह महीने में इसी तरह तेल के  दाम बढ़ गए  तो यह घाटा करीब 2 लाख करोड़ रुपये तक जा पहुंचेगा और सरकार के चल रहे सभी दूसरे अघोसंरचना कार्यों पर इनका प्रभाव पड़ना तय है। लिहाजा अब भारत को तेल की आग से बचना बहुत ही मुश्किल नजर आ रही है। – मनोज मोदी, 86, मालवीय नगर, भोपाल

और भी मुद्दों में लगी है आग

आग केवल कच्चे तेल में नहीं लगी है, वरन हर चीज में लगी है। इतना जरूर है कि कच्चे तेल की आग बहुत ज्यादा गर्म है। खाद्यान्न स्टील, सीमेंट, प्रापर्टी, सोना, चांदी…. सबमें आग लगी है। हर वस्तु महंगी हो गई है, आम आदमी की पहुंच से दूर एक ही वस्तु है, जो बहुत सस्ती है और वह है ‘स्वयं आदमी’ आदमी का जीवन तथा जीवन के मूल्य बहुत सस्ते गए हैं।

जब जब बाजार की वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, जीवन के मूल्य सस्ते हो जाते हैं। सवाल कच्चे तेल की आग से भारत को बचाने का नहीं है, वरन आज की सबसे बड़ी आवश्यकता आतंकवाद, हिंसा, भ्रष्टाचार, अराजकता , अन्याय और कलहपूर्ण प्रतिस्पर्धाओं की आग से विश्व को बचाने की है। जब ये आग ठंडी होगी, तो सभी तरह की आग ठंडी हो जाएंगी। – विकास वात्सल्य (मैनेजमेंट विशेषज्ञ) , विकास ऑफसेट प्रिंटर्स, बुधवारी बाजार, छिन्दवाड़ा, मध्य प्रदेश

खपत पर ध्यान देना बेहद जरूरी

आज के मशीनरी युग में तेल के उपयोग में कमी नहीं की जा सकती है। परन्तु सालाना खपत का 78 फीसदी आयात पर निर्भर रहना पड़ता हो तो तेल का उपयोग सही तरीके से करते हुए बचत करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में सबकी सलाह पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा उपयोग एवं तेल विपणन कंपनियों को बचाने के लिए सब्सिडी में कमी करना इत्यादि हो सकता है।

लेकिन जब यह उपाय अमल में लाए जाएंगे तो सलाह देने वाले खुद भी नहीं मानेंगे, पहले आप पहले आप करते रह जाएंगे। इसके अलावा सब्सिडी को कम करने के विरोध से जनता की नाराजगी सरकार मोल नहीं लेना चाहेगी। ऐसे में कुछ अलग तरह के उपायों की नाराजगी सरकार मोल नहीं लेना चाहेगी।

ऐसे में कुछ अलग तरह के उपायों को अपनाकर 365 दिनों में से 50 दिन के 450 करोड़ रुपये दैनिक के हिसाब से 22500 करोड़ रुपये बचाए जा सकते हैं एवं तेल कंपनियों के सालाना 180000 के घाटे का कांटा 200000 करोड़ रुपये की तरफ पहुंचने के बजाए वहीं पर रोका जा सकता है। इसके अलावा जरूरत है आईओसी, बीपी, एचपी के प्रबंधक तथा सरकार एवं इन सुझावों के बीच चेन बनाने की ताकि इस दिशा में सार्थक पहल हो सके। – अरूणोंपुत्र हूली, जयपुर

ऊर्जा के अन्य स्रोतों को विकसित करें


आज कच्चे तेल की आसमान से भी ऊपर हो चुकी कीमतों और आज की अर्थप्रणाली एवं जीवनयापन की शैली में कच्चे तेल की अपरिहार्यता एवं इस के अर्थव्यवस्था पर बहुगामी प्रभावों के स्थिति विकट हो चुकी है। अल्पअवधि में इस आग से बचने के लिए सब से बड़ा बचाव कच्चे तेल की बचत है। विकासोउन्मुख कच्चे तेल की मांग और उपभोग पर नियंत्रण।

मध्यम एवं भारी वाहनों को सौर ऊर्जा से प्रचलित करने के लिए शोध, कार्यवाहन एवं प्रोत्साहन के लिए समयबध्द योजना। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा एवं प्रोत्साहन, सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट प्रणाली के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों का डिजाइन उत्पादन एवं प्रयोग। हाइड्रो, थरमल  और न्यूक्लियर ऊर्जा में बढ़ोतरी।

विशाल समुद्र तट और हिमालय तराई तलहटी में तेल और गैस खोज अभियान में तेजी लाई जाए। निस्संदेह इस दिशा में कदम बढ़ाने से कुछ न कुछ तो सकारात्मक चीजें निकल कर जरूर सामने आएंगी। – नरेंद्र कुमार, 284, राजा गार्डन, जलंधर (पंजाब)

पुराने वाहनों पर पाबंदी लगाई जाए


इस दिशा में तो सरकार सिर्फ जागरूक कर सकती है तथा कुछ सख्त कदम उठा सकती है। इसके लिए पेट्रोल का विकल्प ढूढ़ने का प्रयास करना चाहिए, पूरे देश में सीएनजी के उपयोग को प्रोत्साहन देना चाहिए, दस वर्ष से ज्यादा पुराने वाहनों को प्रतिबंधित कर देना चाहिए और जनता को पेट्रोल बचत के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। सरकार यदि सिर्फ अपने अंतर्गत आने वाले सरकारी वाहनों में ही पेट्रोल का उपयोग पर लगाम लगाएं तो भी बहुत बचत हो सकती है। – अनवर अंसारी, वाणिज्य निरीक्षक, उत्तर रेलवे, अंबाला मंडल

हर व्यक्ति में हो रोड सेंस

हर व्यक्ति को रोड सेंस और ट्रैफिक सेंस होना चाहिए। आज यदि हम दौर से देखें तो कितने ही वाहनों, ऑटो रिक्शा, स्कूटर, मोटर साइकिल, कार आदि द्वारा अनावश्यक तेल फूंका जाता है। सरकार को चाहिए कि वह प्रत्येक परिवार के वाहनों की संख्या को सीमित करें तथा जहां तक संभव हो सके सार्वजनिक वाहनों में यात्रा करनी चाहिए जिससे अतिरिक्त ऊर्जा के खर्च से बचा जा सके। वाहन चालकों को तेल के संरक्षक के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारियां दी जानी चाहिए।  – मनोज कुमार ‘बजेवा’, शोधार्थी एवं प्राध्यापक, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार

आग तो खाड़ी देशों में लगी है


कच्चे तेल में आग तो वहां खाड़ी देशों में लगी है, जिसका सिर्फ धुंआ ही भारत में आ रहा है। अब सवाल है कि भारत इस आग से कैसे बचे? कच्चे तेल के उत्पादन के नए-नए विकल्प पैदा करें। रतनजोत तथा की तरह की वनस्पतियों से अपने ही देश में कच्चा तेल बनाया जा सकता है। तेल के अनावश्यक उपयोग तथा कच्चे तेल के आवश्यकता से अधिक भंडारण में कमी करके कच्चे तेल की आग के धुंएं से भारत को बचाया जा सकता है। – श्रीमती प्रभा वात्सल्य, गृहिणी, विकास ऑफसेट प्रिंटर्स, बुधवारी बाजार, छिंदवाड़ा

तालमेल बिठा पाना आसान नहीं

एक तरफ आम चुनाव और दूसरी ओर तेल की बढ़ती कीमतें, सरकार के लिए इनमें तालमेल बिठा पाना आसान नहीं है। देर-सबेर तेल की कीमतें बढ़नी हैं ऐसे में सरकार उत्पाद शुल्क में कटौती कर फौरी राहत जरूर दे सकती है पर यह टिकाऊ रास्ता नहीं है। ईंधन की कम खपत पर जन जागरण, सार्वजनिक यातायात दुरुस्त करना और वैकल्पिक ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल अब समय की आवश्यकता है। तेल की बढ़ती कीमतें औद्योगिक विकास को भी प्रभावित करेंगी। – रोली सिंह, निदेशक, एंपायर प्लाइवुड, लखनऊ

अभी तक गंभीरता से नहीं सोचा गया


विश्व बाजार में तेल का संकट गहराने के साथ भारत की दिक्कतें बढ़ गयी हैं। हमारे देश में तेल के स्त्रोत भी कम हैं साथ ही औद्योगिक विकास के साथ खपत लगातार बढ़ रही है। हमने अभी तक तेल के विकल्पों पर गंभीरता से नहीं सोचा है जिससे संकट और गहरा गया है। अगर जल्दी ही वैकल्पिक उपाय न खोजे गए तो भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा देश से बाहर जाएगी।  – चंद्र कुमार छाबड़ा, व्यापारी नेता, लखनऊ

कठोर कदम उठाने होंगे


विभेदात्मक एवं  प्रतिगामी मूल्य व्यवस्था, राशनिंग, सप्ताह में न्यूनतम एक दिन एवं एक दिन में न्यूनतम 6 घंटे पेट्रोल पंपों की अनिवार्यता बंदी, एक ग्राहक द्वारा अधिकतम 5 पेट्रोल पंपों से ही पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने एवं चेक या क्रेडिट कार्ड से भी भुगतान एवं वाहन की न्यूनतम दो माह में टयूनिंग की बाध्यता, पेट्रोलियम उत्पादों के विक्रय पर बिल या केसमिमों काटना विक्रेता का कानूनी दायित्व, सामान्य सब्सिडी व्यवस्था की समाप्ति, मूल्य निर्धारण फार्मूले की कानूनी अनुपालना जैसे कदम उठाना आग को दावानल नहीं बनने देने  के लिए हमारी मजबूरी माना जाना चाहिए। – प्रो. मानचंद खंडेला, निदेशक, सुबोध प्रबंध संस्थान, जयपुर

उपयोग पर लगाम ही है उपाय


भारत को सर्वप्रथम ‘सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था’ को चुस्त-दुरुस्त करना चाहिए तथा सरकारी सब्सिडी का मुंह इस व्यवस्था की तरफ मोड़ देना चाहिए। नेता, संपन्न वर्ग और अधिकारी भी इसी व्यवस्था का उपयोग कर आम जनता को प्रेरणा दे सकते हैं। राष्ट्रीय संकट से निपटने के इस चारित्रिक उपाय के बाद रतनजोत से ईंधन बनाने और ऐसे ही अन्य गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के उन्नयन हेतु दीर्घकालीन उपाय होने चाहिए। – डॉ. जी.एल. पुणताम्बेकर, रीडर, वाणिज्य विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मप्र)

दिलों की बुझे आग


कच्चे तेल की आग को कैसे बुझाएंगे?
भारत को इस आग से कैसे बचाएंगे?
इस सवाल का उत्तर तो सात शब्दों में इतना है
जब हम अपनी खेती की पैदावार बढ़ाएंगे।
खाद्यान्न ज्यादा होगा तो महंगाई भी कम होगी
सांस की बढ़ती हुई रफ्तार भी सम होगी
सवाल कच्चे तेल की इस आग का नहीं
दिलों की बुझे आग तो यह आग भी नम होगी

-गुलाबचन्द वात्सल्य, विकास ऑफसेट प्रिंटर, बुधवारी बाजार, छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश

अर्थव्यवस्था के लिए सही संकेत नहीं


भारत का तेल आयात बिल पिछले साल करीब 78 अरब डॉलर तक चला गया। डॉलर के गिरते मूल्य के साथ ही वायदा व्यापार के चलते तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं जो कि हमारी अर्थव्यवस्था के लिए कतई शुभ संकेत नही है। भारत को तेल खनन में बढ़ककर निवेश करना होगा, साथ ही देश में तेल उत्पादन को जल्दी बढ़ाना होगा। एथनॉल मिक्सिंग की सीमा कम से कम 15 फीसदी तक बढ़ाने, सौर ऊर्जा की उन्नत तकनीक विकसित करनी होगी।  – सुरेंद्र सिंह, छात्र, पर्यटन संस्थान, लखनऊ

पुरस्कृत पत्र

बुरी तरह झुलस रहा है भारत

विश्व के साथ ही भारत भी तेल की कीमतों में लगी आग की लपटों से बुरी तरह झुलस रहा है। इससे निपटने के लिए दो प्रकार के  उपाय हो सकते हैं प्रथम दीर्घकालीन और द्वितीय फौरी यानी तुरंत। दीर्घकालीन उपायों में गैर परंपरागत ऊर्जा के स्रोतों को विकसित कर उनका दोहन करना है ताकि इससे प्राप्त ऊर्जा का उपयोग करके तेल पर निर्भरता हटाई जा सकें।

इनमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा (ज्वारभाटा), कचरे से ऊर्जा उत्पादन एवं बायो ईंधन का उत्पादन है। बायोईंधन एक बहुत महत्वपूर्ण उपाय है। विकसित देशों में इस दिशा में बहुत तेजी से कार्यवाही हो रही है। दीर्घकालीन उपायों के लाभ 2 से 10 वर्षों तक मिल पाएंगे और वर्तमान में समस्या बहुत विकराल है। हम अपने उपयोग का लगभग 70 फीसदी तेल आयात करते हैं। इससे खजाने पर काफी बोझ पड़ता है। – जी. डी. चतुर्वेदी, 7-सी, बी.डी.ए. कोहेफिजा,भोपाल

सर्वश्रेष्ठ पत्र

तेल उत्पादक देशों से समझौता हो

करीब सात-आठ साल पहले इराक ने भारत को गेहूं के बदले (उस समय के रेट पर 40 फीसदी छूट) कच्चे तेल देने की पेशकश की थी, जिसे नेताओं ने ठुकरा दिया था। भारत में गेहूं, चावल, चीनी, आलू प्याज जैसे तमाम जिंसों के बदले तेल उत्पादक देशों से रियायती तेल हेतु दीर्घकालीन समझौते किए जा सकते हैं।

सोने के आयात पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। इससे भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा का अपव्यय रुकेगा। सरकार को तेल पर टैक्स घटाकर चौपहिया वाहन धारकों पर प्रति माह उपभोग कर 40-45 फीसदी लगाना चाहिए।  – कपिल अग्रवाल, पूर्व वरिष्ठ उपसंपादक, दैनिक जागरण, 1915, थापर नगर, मेरठ

आई मौज फकीर की…

कच्चे  तेल की तेजी और डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने भारतीय तेल नवरत्नों-आई. ओ. सी., एच. पी. और भारत पेट्रोलियम की कमोबेश हवा निकाल दी है। सरकार भी ‘शब्द बाण’ ही चला रही है। महंगाई से त्रस्त जनता पर किस मुंह से नया बोझ डाला जाए- सरकार को न उगलते बन रहा है और न निगलते।

तेल सब्सिडी पर सख्ती व पारदर्शिता बरती जाए तथा धीरे-धीरे आम उपभोक्ता पर बोझ डाला जाए- एकबारगी नहीं अन्यथा वही बात होगी- ‘आई मौज फकीर (गरीब) की झोपड़ा दिया उड़ाय।’ – हर्ष वर्ध्दन कुमार, सरस्वती लेन, पूर्वी लोहानीपुर, पटना (बिहार)

परेशानी मध्यम वर्ग को


तेल की कीमतें अगर बढ़ती हैं तो सबसे ज्यादा परेशान मध्यम वर्ग और खास तौर पर कर्मचारी वर्ग होगा। इतने दिनों से चुनाव की सोच कर सरकार ने तेल के दाम नही बढ़ाए पर अब पानी सर से ऊपर निकल गया है।

सबसे मुश्किल तो यह है कि वेतन बढ़ाते समय आज भी हमारी सरकार या अन्य संस्थान तेल की कीमत को कोई पैमाना नहीं मानती। कम तेल की खपत वाले वाहनों का निर्माण करना होगा साथ ही इसकी सरकारी खपत को भी घटाना होगा। इन उपायों से ही कच्चे तेल की आग से बचा जा सकता है। – गोपाल दत्त गौड़, कर्मचारी नेता (से.नि.), लखनऊ

आखिर कब तक तेल खरीदना है?


प्रश्न यह उठता है कि कब तक बढ़ती हुई कीमत पर कच्चा तेल खरीदना है? यदि बढ़ती हुई कीमत पर कच्चा तेल खरीदा जाता रहेगा तो उत्पादों की कीमतें भी बढ़ती रहेंगी और जनता महंगाई के बोझ तले दबती जाएगी। अत: वैकल्पिक ऊर्जा संसाधनों का कच्चे तेल के स्थान पर उपयोग करना समय की मांग है।

भारत को यदि प्रगतिशील रहना है तो समय के साथ, समय की मांग के साथ चलना होगा। लिहाजा वैकल्पिक ऊर्जा संसाधनों का उपयोग कर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से छुटकारा पाया जा सकता है। – सन्तोष मालवीय ‘प्रेमी’, 222, मालवीय गंज, इटारसी

बकौल विश्लेषक

कीमत बढ़ाने के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं

कच्चे तेल की कीमत में लगी आग से तो बचने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता है। हां यह संभव है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में जो कच्चे तेल की कीमत है, उसी के हिसाब से यहां कीमतें तय की जाएं। कच्चे तेल में बढ़ी कीमतों की मार कमोबेश सभी देश झेल रहे हैं, तो भला इससे हमारा देश कैसे बच सकता है।

हाल ही में ऑयल कंपनियों और पेट्रोलियम ट्रेडर्स की हुई बैठक में यह फैसला लिया गया है कि प्रीमियम प्रोडक्ट्स (एक्स्ट्रा माइल्स, स्पीड) को बाजार में ज्यादा से ज्यादा बेचा जाए। इन प्रोडक्टों की बिक्री से ऑयल कंपनी को थोड़ा ज्यादा मार्जिन मिलता है। भले ही नार्मल ऑयल के मुकाबले प्रीमियम ऑयल थोड़ा महंगा हो लेकिन लंबी अवधि के मद्देनजर यह उपभोक्ता के लिए काफी फायदेमंद होता है।

जहां एक ओर मुद्रास्फीति की दर 8 फीसदी के आंकड़े को छूने जा रही है वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में भी आग लगी हुई है। अगर अन्य स्रोतों की बात की जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि महानगरों में रहने वाले उपभोक्ता जल्द ही अपनी जरूरतों के लिए सीएनजी की ओर शिफ्ट करने वाले हैं।

आगे भी कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती रहीं तो सरकार के पास पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम प्रोडक्टों की कीमत बढ़ाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता है। अगर सरकार उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क में कटौती करती है तो कंपनियों सहित उपभोक्ताओं को राहत जरूर मिलेगी। 

 –  अतुल पेशावरिया
अध्यक्ष, फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया पेट्रोलियम ट्रेडर्स(एफएआईपीटी)

बातचीत: पवन कुमार सिन्हा

कीमतें बढें लेकिन तेल की बढ़ती खपत पर लगे लगाम

आप कल्पना कीजिए कि आप किसी पेट्रोल पंप पर गए हों और वहां आप से यह कहा जाए कि यहां पेट्रोल और डीजल उपलब्ध नहीं है।

हालांकि आने वाले कुछ महीनों में ऐसी स्थिति भले ही न होने वाली हो लेकिन देश की प्रमुख तेल कंपनियों के अधिकारियों की मानें तो यह कल्पना हकीकत में भी बदल भी सकती है।

अधिकारियों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत इसी तरह बढ़ती रही और यहां (भारत में) तेल की कीमतों को थोड़ा बहुत भी नहीं बढ़ाया गया तो फिर स्थिति भयावह हो सकती है।

इसमें कोई शक नहीं कि बीते एक साल में कच्चे तेल की कीमत दोगुनी हो चुकी है। इस वक्त अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल है और यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले कुछ महीनों में कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को छू लेगी। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 70 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात किया जाता है।

सरकार द्वारा यहां के उपभोक्ताओं को रियायती दरों पर तेल मुहैया किया जाता है। बहरहाल, देश में कच्चे तेल की आग में आई तेजी से आसानी से निपटा जा सकता है। सरकार द्वारा न केवल तेल (पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों) की कीमतों में बढ़ोतरी करने की जरूरत है बल्कि देश में तेल की खपत यानी मांग पर भी पाबंदी लगानी होगी।

इसके अलावा भारत को गंभीरतापूर्वक ऊर्जा के अन्य स्रोतों की ओर भी ध्यान देना होगा। मसलन सरकार को सौर ऊर्जा को विकसित करने पर खास जोर देना चाहिए।

– वंदना गोंबर
सह संपादक, बिजनेस स्टैंडर्ड


…और यह है अगला मुद्दा

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First Published : May 26, 2008 | 2:36 AM IST