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तेल की उलझन

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 06, 2022 | 10:01 PM IST

दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में मंदी का आलम है और ऐसे में यह दलील काफी अजीब लगती है कि तेल की कीमतों में जारी उछाल इस साल जारी रहेगी।


हालांकि तेल की वैश्विक कीमतों में उफान जारी है। बीते मंगलवार को यह 122 डॉलर प्रति बैरल की नई ऊंचाई पर पहुंच गया। इससे भी चिंताजनक बात यह है कि कीमतों के ट्रेंड के बारे में की जा रही भविष्यवाणी में इसमें और बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।


ओपेक के प्रतिनिधियों और अन्य विशेषज्ञों के अनुमानों के मुताबिक, तेल की कीमतें 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। मुमकिन है कि वर्ल्ड इकॉनमी वास्तव में मंदी की ओर नहीं बढ़ रही हो (अमेरिका अब तक मंदी की भविष्यवाणी को नजरअंदाज करता आया है) और ऐसा भी मुमकिन है कि चीन और भारत में बढ़ती खपत के कारण कीमतों में उछाल हो रहा हो, क्योंकि अगर जरूरी कमॉडिटीज में 5 फीसदी की कमी भी होती है तो इससे कीमतों में बढ़ोतरी तय है।


पिछले वित्तीय साल में भारत के कच्चे तेल के निर्यात में 5 लाख बैरल रोजाना की बढ़ोतरी दर्ज की गई और जाहिर है कि चीन के निर्यात में इससे ज्यादा ही बढ़ोतरी हुई होगी। ऐसे में साफ है कि अगर अपने विकास को तेज करने के लिए चीन और भारत की ऊर्जा की जरूरत जारी रही और ऊर्जा की भूखी अर्थव्यवस्थाओं ने तेल की अपनी मांग में कमी नहीं की तो वैश्विक मांग में बढ़ोतरी जारी रहेगी।


जहां तक तेल की सप्लाई का मामला है, समय-समय पर कई देशों मसलन इराक और नाइजीरिया की वजह से इसमें बाधाएं आती रहती हैं। तेल का अतिरिक्त उत्पादन नहीं होने की सूरत में (ओपेक इस बारे में पहले ही मना कर चुका है) कीमतों में बढ़ोतरी के सिवा किसी और नतीजे की सूरत नजर नहीं आती। खासकर ऐसे वक्त में जब एथनॉल जैसे ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोत पर खासा विवाद छिड़ चुका है।


ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि भारत को इस समस्या से कैसे निपटना चाहिए? यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि जब-जब (1973-75, 1979-80, 1990-91) भी तेल की कीमतों में आग लगी है, इसके कारण राजनीतिक या आर्थिक संकट पैदा हुआ है। तेल के इस संकट को टालने के लिए कुछ खास कदम उठाना जरूरी है। यह बात साफ है कि हम पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें स्थिर रखकर सब्सिडी के बोझ को कम नहीं कर सकते।


आयातित तेल की कीमत पिछले 3 साल में दोगुनी (56 डॉलर प्रति बैरल से 106 डॉलर प्रति बैरल) हो चुकी है, जिससे बजट घाटा चिंताजनक स्थिति में पहुंच सकता है। तेल का आयात बिल 2 साल में 38 अरब डॉलर से बढ़कर 64 अरब डॉलर पहुंच गया है।


हालांकि, इस विषम परिस्थिति में भी उपभोक्ता कोई दबाव नहीं महसूस कर रहे हैं और शायद आगे भी इससे अलग-थलग ही रहेंगे, क्योंकि चुनाव से पहले के इस साल में सरकार पहले ही महंगाई से जूझने में जुटी है। ऐसे में सरकार कोई भी कड़ा कदम उठाने के मूड में नजर नहीं आती। 

First Published : May 7, 2008 | 10:49 PM IST