प्रख्यात अर्थशास्त्रियों को देखने और पढ़ने के बाद एक सवाल करने की आवश्यकता है: बुजुर्ग अर्थशास्त्री गायब क्यों नहीं होते या फीके क्यों नहीं पड़ते? बुजुर्ग से मेरा मतलब है 60 वर्ष से अधिक आयु के अर्थशास्त्री।
मैं तुनकमिजाजी नहीं दिखा रहा हूं बल्कि यह एक गंभीर प्रश्न है। मैं कुछ युवा अर्थशास्त्रियों से यह प्रश्न करता रहा हूं कि क्या वे मेरी बात से सहमत हैं। उन्होंने इसका सकारात्मक जवाब दिया क्योंकि 50 वर्ष से अधिक आयु के अर्थशास्त्रियों की इस विषय के बौद्धिक पहलू को लेकर ताजा रुझान में कोई खास रुचि नहीं है। यह बहुत अधिक काम है।
इसके बजाय वे उन बातों पर भरोसा करना चाहते हैं जो उन्होंने पिछले 30 वर्षों में सीखी हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों के लिए यह काम भी काफी अधिक है। ऐसे में वे वृहद आर्थिक नीति को लेकर अनुमानित घोषणाएं करने लगते हैं जहां काफी गुंजाइश रहती है।
इन युवा अर्थशास्त्रियों ने यह भी कहा कि दुनिया में किसी भी अन्य स्थान पर बुजुर्ग अर्थशास्त्रियों के साथ मीडिया इतना अलग व्यवहार नहीं करता है जितना कि भारत में किया जाता है। मीडिया उनकी कही हर बात को तब तक प्रसारित या प्रकाशित करता है जब तक वे सरकार के पक्ष में या उसके खिलाफ रुख अपनाते हैं। यह बात भी एक वजह है जिसके चलते पुराने अर्थशास्त्री नए घटनाक्रम को लेकर बहुत अधिक सजग और सचेत नहीं रहते।
मैंने पिछले कुछ महीने यह सीखने की कोशिश करते हुए गुजारे हैं कि अर्थशास्त्र में नए रुझान क्या हैं। इसका दायरा बहुत अधिक विस्मित करने वाला है। मैं यहां उनकी सूची नहीं प्रस्तुत करने वाला हूं लेकिन मैं उन्हें भी पूरी तरह नहीं समझ पाया हूं। यह भी कह सकते हैं कि यह जगह उस काम के लिए उपयुक्त नहीं है।
व्यापक तौर पर कहा जाए तो जिन देशों के अर्थशास्त्र जीवंत है वहां भारी भरकम आंकड़े वृहद आर्थिक विश्लेषण के लिए प्रस्तुत किए जाते हैं। इनकी बदौलत नीतियों को लेकर बहुत उपयोगी अंत:दृष्टि हासिल होती है। बहरहाल, सरकार जिन बुजुर्ग अर्थशास्त्रियों की बातों पर ध्यान देती है वे इस तरह के विश्लेषण की तकनीक और नतीजों से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। उन्होंने इन विषयों में ज्यादा कुछ सीखने की कोशिश भी नहीं की।
भारतीय अर्थशास्त्रियों के लिए तो यह बात विशेष तौर पर सही है। वे आधुनिक आर्थिक विश्लेषण से परिचित नहीं हैं। वे विश्लेषण के दो दशक पुराने तौर तरीकों में फंसे हुए हैं। भारत में कोई भी सुधार इस तलाश के साथ शुरू होना चाहिए कि आखिर वृहद अर्थव्यवस्था में भारी भरकम आंकड़ों को क्यों आजमाया जा रहा है? व्यवहारात्मक अर्थव्यवस्था पर जोर में बदलाव के पीछे यही वजह है।
बुनियादी तौर पर प्रोत्साहन को लेकर व्यक्तिगत स्तर पर लोगों की प्रतिक्रिया कैसी होती है इसे लेकर बीते 60 वर्षों में कई गहन अध्ययन किए गए हैं। अब इस बात का अध्ययन हो रहा है कि एक जैसे लोगों का समूह इस पर कैसी प्रतिक्रिया देता है।
इसके लिए अर्थशास्त्र और एंथ्रोपॉलजी यानी नृविज्ञान के मेल की आवश्यकता है। भारतीय अर्थशास्त्रियों के मन में अभी भी इस बुनियादी बदलाव को लेकर आशंका है और उनका ध्यान राज्य पर तथा उसकी प्रतिक्रिया पर केंद्रित है। आप उन तमाम योजनाओं के विश्लेषण के बारे में जानते ही हैं जो योजना आयोग से उत्पन्न हुई थीं।
भारत में व्यवहारात्मक अर्थशास्त्र की अनदेखी का परिणाम यह हुआ कि सरकार के नीति निर्माण संबंधी उपकरण और यहां तक कि एक बड़े निकाय के पास भी इस बारे में बहुत कम जानकारी है कि नई योजनाओं या उत्पादों के संभावित उपभोक्ता किस प्रकार की प्रतिक्रिया देंगे। टाटा नैनो कॉर्पोरेट की इस अनदेखी का तकरीबन सटीक उदाहरण है।
रतन टाटा को पता था कि भारतीयों को एक सस्ती कार की आवश्यकता है। लेकिन इसके अलावा उनकी कंपनी को कार बाजार के सबसे निचले छोर के समाजविज्ञानी पहलू के बारे में कोई जानकारी नहीं थी जो कि एक आकांक्षी वर्ग है। कोई भी एक ‘गरीब आदमी की कार’ खरीदना नहीं चाहता। यही कारण है कि नैनो का उत्पादन बंद कर दिया गया जबकि यह पूरी तरह स्वीकार्य वाहन था।
या फिर कर नीति की बात करते हैं। सरकार लोगों पर उनकी आय के स्तर के आधार पर कर लगाना जारी रखे हुए हैं जबकि इस बारे में कोई जिक्र नहीं किया जाता है कि उन लोगों की खपत के रुझान में किस प्रकार बदलाव आया है। परंतु अतीत में जहां तयशुदा लागत यानी किराया, भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि पर एक परिवार की आय का 50-55 फीसदी हिस्सा खर्च हो जाता था, वहीं आज यह 80 फीसदी से अधिक हो चुका है।
इस 30 फीसदी के अतिरिक्त हिस्से में परिवहन और संचार, मनोरंजन और ऊर्जा आदि की भागीदारी है। ये एक जमाने इनके स्वीकार्य विकल्प मौजूद थे लेकिन अब ऐसा नहीं है।
इसका सीधा असर आम परिवारों की बचत दर पर पड़ता है जिसमें बीते 15 वर्षों से लगातार गिरावट आ रही है। अगर आपकी आय का 95 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी प्रकार खर्च ही हो जाए तो आप कितनी बचत कर पाएंगे? बात यह है कि परिवारों की बचत और व्यय के रुझानों का एक तगड़ा समाजशास्त्रीय आधार होता है। मिसाल के तौर पर शहरी एकल परिवारों की बात करें तो किसी ने उनकी आर्थिकी का अध्ययन नहीं किया है।
परंतु हमारे अर्थशास्त्रियों ने आंकड़े उपलब्ध होने के बाद भी इनका अध्ययन नहीं किया। ऐसे में वित्त मंत्रालय के अफसरशाहों ने ऐसा व्यवहार जारी रखा मानो कुछ भी नहीं बदला हो।
कुल मिलाकर देखें तो व्यक्तिगत आय कर नीति भी आधुनिक अर्थव्यवस्था से सूचित और सुसज्जित नहीं है। बुजुर्ग अर्थशास्त्रियों के मस्तिष्क के पुराने विचार अभी भी अपना दबदबा कायम रखे हुए हैं। यह अच्छी बात नहीं है।