कुछ सालों से अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा का अंबार दिनोदिन बढ़ता जा रहता था। भुगतान संतुलन की चर्चा का मुद्दा विदेशी मुद्रा की कमी से हटकर इस बात पर आ गया था कि विदेशी मुद्रा के मोटे भंडार का प्रबंधन कैसे किया जाए।
इस हफ्ते जारी हुए दो आंकड़े भुगतान संतुलन के मामले में भारी बदलाव को दिखाते हैं। पहली बात तो यह है कि 2007-08 की आखिरी तिमाही के भुगतान संतुलन के जो आंकड़े जारी हुए हैं, उसके मुताबिक पिछले वित्त वर्ष का चालू खाता घाटा करीबन 17.4 अरब डॉलर का था, जबकि 2006-07 में यही घाटा 9.8 अरब डॉलर का था।
हालांकि, मुल्क में कुल पूंजी प्रवाह इससे कई गुना ज्यादा 110 अरब डॉलर का रहा था। इसकी वजह से रिजर्व बैंक के खजाने में 92 अरब डॉलर की अतिरिक्त पूंजी जमा हो गई। मतलब, पिछले साल की तुलना में इस साल रिजर्व बैंक के खजाने में तीन गुना ज्यादा पूंजी आई है। अब रिजर्व बैंक के खजाने में करीब 300 अरब डॉलर जमा हो चुके हैं, जो किसी भी मुसीबत से मुल्क को बचाने के लिए काफी है।
अगर यह ट्रेंड जारी रहता तो दिक्कत की कोई बात ही नहीं होती। ऐसी हालत में चालू खाता घाटे के बढ़ने से किसी कोई दिक्कत नहीं होती। इसके बजाए विदेशी मुद्रा के मोटे भंडार को नीतियों के जरिये साधना असल मुसीबत होती। लेकिन ऐसी बात है नहीं। पिछले कुछ महीनों में दूसरी बार ऐसी तस्वीर सामने आई है, जहां पूंजीगत खाते की हालत पिछले साल की तुलना में काफी पस्त है। पिछले कुछ हफ्तों में देसी स्टॉक मार्केटों की भारी गिरावट विदेशी निवेशकों का तेजी से बाजार से निकलने को दिखाता है।
इसी वजह से रुपये की सेहत भी गिरी है, जो कुछ दिनों पहले तक काफी मजबूत नजर आ रहा था। हालिया वाकयों ने रुपये की सेहत को काफी हद तक गिरा दिया है। आलम यह है कि इस हालत मार्च, 2007 के स्तर से भी गई गुजरी हो चुकी है। उसी समय से रुपये की काया मजबूत होनी शुरू हुई थी। कहने की जरूरत नहीं है कि रुपये की गिरती सेहत की वजह से निर्यातकों को खुश होना चाहिए था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। दरअसल, मई के निर्यात आंकड़े यह साफ तौर पर दिखलाते हैं कि दुनिया भर में डिमांड में काफी कमी है।
इसकी वजह से उन्हें उतना नुकसान हुआ है, जितना रुपये की मजबूती से भी नहीं हुआ होगा। डॉलर के चश्मे से देखें तो मई में निर्यात में केवल 13 फीसदी का इजाफा हुआ है, जो अप्रैल के 35 फीसदी के आंकड़े से काफी कम है। दूसरी तरफ, इस दौरान आयात में 27 फीसदी का इजाफा हुआ, जिसमें कच्चे तेल का हिस्सा अच्छा-खासा था। मई, 2007 की तुलना में इस साल मई में कच्चे तेल के आयात में 50 फीसदी का इजाफा हो चुका है।
इसकी वजह से मई में मुल्क का व्यापार घाटा 10.8 अरब डॉलर का हो गया। अप्रैल-मई, 2008 के कारोबार घाटे को मिला दें तो यह 20.6 अरब डॉलर था। मतलब, अप्रैल-मई, 2007 के 13.9 अरब डॉलर के कारोबार घाटे की तुलना में इस साल कारोबार घाटे में 50 फीसदी का इजाफा हो चुका है।