सरकार विरोध की परवाह नहीं करते हुए तथाकथित अग्निपथ योजना को लागू करने जा रही है। इस भर्ती योजना की घोषणा 14 जून को बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक कर दी गई। रक्षा मंत्रालय ने योजना के नफे-नुकसान के बारे में विस्तृत जानकारी दिए बिना इसे ऐसे ‘सुधारात्मक उपाय’ के रूप में पेश किया है, जो अग्निवीरों (अब आगे अग्निपथ योजना के तहत भर्ती होने वाले थलसेना सैनिक, नौसैनिक और वायु सैनिक) की भर्ती प्रक्रिया को बदल देंगे। इस समय सैन्यकर्मियों के लिए लंबी अवधि- 15 साल का बॉन्ड होता है, जिससे आजीवन पेंशन मिलती है। इसे बदलकर अल्प सेवा अनुबंध बना दिया गया है, जिसके तहत हर साल भर्ती होने वाले रंगरूट चार साल सेवा देंगे। इसके बाद 75 फीसदी बिना किसी पेंशन के घर जाएंगे। इससे बेरोजगार युवाओं में तगड़ा गुस्सा पनपा है, जिनके लिए पिछले दो साल में लॉकडाउन के कारण एक लाख सैन्य भर्तियों का मौका निकल गया और नई भर्तियां शुरू होने तक बहुत से मौके निकल जाएंगे।
वर्ष 2015 में ‘वन रैंक, वन पेंशन’ लागू होने के बाद पेंशन सालाना रक्षा बजट में वहन नहीं किया जा सकने वाली घटक बन गई है। चालू वर्ष (वित्त वर्ष 2022-23) के रक्षा बजट 5,25,120 करोड़ रुपये में से 23 फीसदी यानी 1,19,696 करोड़ रुपये का एक बड़ा हिस्सा पेंशन के लिए आवंटित किया गया है। इसके अलावा सेवारत थल सैनिकों, नौसैनिकों और वायु सैनिकों, असैनिक कर्मचारी (अब से सैनिक) और कार्मिकों के वेतन का खर्च बढ़कर कुल रक्षा बजट का 54 फीसदी हो गया है।
अग्निपथ योजना का मकसद साफ तौर पर धीरे-धीरे पेंशन की देनदारियों को कम करना है। रंगरूटों के प्रत्येक सालाना बैच- पहले चार साल में हर साल 46,000, पांचवें साल में 90,000 और छठे साल से 125,000 में से एक-चौथाई को सेवा में रखा जाएगा। इसका मतलब है कि 10वें साल से अग्निपथ योजना के तहत हर साल लंबी अवधि के लिए 31,250 सैनिक (1,25,000 का 25 फीसदी) रखे जाएंगे, जबकि अन्य 93,750 अपनी चार साल की सेवा अवधि पूरी करने के बाद घर लौट जाएंगे।
रक्षा मंत्रालय ने फैसला किया है कि चयनित अग्निवीरों को थलसेना, नौसेना और वायु सेना में उनके सेवा अधिनियमों के तहत चार साल के लिए नामांकित किया जाएगा। उनकी सेना में एक अलग रैंक होगा, जो मौजूदा रैंकों से बिल्कुल अलग होगा। चार साल की सेवा पूरी करने के बाद अग्निवीरों को सेना में स्थायी नामांकन के लिए आवेदन का मौका मुहैया कराया जाएगा। चयन सैन्य बलों के विशेष अधिकार क्षेत्र में आएगा। नामांकन ‘अखिल भारतीय, सभी वर्ग’ आधारित होगा और पात्रता की उम्र 17 साल छह महीने से 21 साल होगी।
रक्षा मंत्रालय का दावा है कि अग्निपथ से बहुत से लाभ होंगे। इसका कहना है कि जवान ज्यादा युवा, तंदुरुस्त, मानसिक रूप से ज्यादा मजबूत और तकनीक में ज्यादा दक्ष होंगे। इससे उनकी औसत आयु मौजूदा 32 वर्ष से घटकर 27 साल पर आ जाएगी।
रक्षा मंत्रालय का कहना है कि ये युवा सैनिक अनुशासित कर्मचारियों का एक बैंक मुहैया कराएंगे, जो आसानी से सरकारी और औद्योगिक क्षेत्र की नौकरियों में जा सकते हैं। इस बदलाव को आसान बनाने के लिए सरकार ने सेवानिवृत्त अग्निवीरों के लिए केंद्रीय सैन्य पुलिस बल में 10 फीसदी रिक्त पदों के अलावा तट रक्षक , रक्षा मंत्रालय के असैन्य पदों और सार्वजनिक क्षेत्र के 16 रक्षा उपक्रमों में नौकरियां आरक्षित की हैं। करीब 85 निजी कंपनियों ने भी सेवानिवृत्त अग्निवीरों को रोजगार देने का वादा किया है।
रक्षा मंत्रालय अग्निवीरों का नागरिक जीवन में लौटना आसान बनाने के लिए प्रत्येक को चार साल की अवधि पूरी होने के बाद कर मुक्त 11-12 लाख रुपये की ‘सेवा निधि’ देगा। अग्निवीर का वेतन 30,000 रुपये से शुरू होता है और तीन साल में बढ़कर 40,000 रुपये प्रति माह तक पहुंचता है। इसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि वह यूनिट में सबसे जूनियर सैनिक से भी कम पे ग्रेड पर रहे।
वित्तीय निहितार्थ के अलावा अग्निपथ योजना यूनिट की युद्धक क्षमता की कीमत पर लागू नहीं की जानी चाहिए। भारत जैसी सेना, जो वर्ष भर ढाई मोर्चों- चीन, पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर में तैनात रहती है, उसमें युद्धक नेतृत्व के लिए प्रत्येक सैनिक को बराबर मानना हमेशा दृढ़ विश्वास और बुनियादी सिद्धांत रहा है। लड़ाई के मैदान में समान काम करने वाले सैनिकों के लिए अगर दो अलग-अलग वेतन ग्रेड होंगे तो जल्द ही कम वेतन पाने वाला सैनिक अधिक वेतन पाने वाले सैनिक को निशाने पर लेगा। वह कहेगा और देर-सवेर आवाज भी उठाएगा कि दूसरे सैनिक को बेहतर वेतन दिया जाता है, इसलिए उसे अभियानों में ज्यादा जोखिम लेना चाहिए और जंग के मैदान में बेहतर काम करना चाहिए। यह एक ही युद्धक इकाई में अलग-अलग भर्ती और सेवा मॉडल शुरू करने का अवश्यंभावी नतीजा होगा।
इस जोखिमपूर्ण पहल के बारे में सबसे बड़ी अज्ञात चीज यह है कि न केवल अग्निवीरों के बीच बल्कि अग्निवीर और मौजूदा पूर्णकालिक सैनिकों के बीच मानव संबंध कैसे रहेंगे। अग्निवीर अपने चार साल के कार्यकाल के बाद स्थायी नौकरी पाने के लिए अपने सहकर्मियों के साथ प्रतिस्पर्धा करेंगे। लंबी अवधि की वफादारी पर आधारित रेजिमेंट व्यवस्था से जुड़े सैन्य नेतृत्वकर्ताओं को यह पता होना चाहिए कि अग्निपथ सहकर्मियों को एक-दूसरे के खिलाफ के खिलाफ खड़ा करती है। यह एक-दूसरे की सफलता के बजाय एक-दूसरे की विफलता के लिए प्रोत्साहन देती है। अग्निपथ योजना का ढांचा सैनिकों के सीमा पर एक दूसरे के लिए जान गंवाने वाले सहयोद्धा के रूप में काम करने के बजाय हमवतनों को एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी के रूप में देखने को बढ़ावा देता है और एक को दूसरे की कीमत पर सफलता मिलती है। हर कोई जानता है कि हर चार बैचमेट में से केवल एक को सेवा में रखा जाएगा और और वह भी अब से पहले से बेहतर शर्तों पर। इस स्तर पर नतीजों से ही शायद तय करेंगे कि अग्निपथ योजना सफल रहती है या विफल।
बड़े सैन्यकर्मी और मानव बल सुधार करने वाले हरेक देश ने ऐसा व्यापक विचार-विमर्श और असफलता की मोटी कीमत को समझते हुए किया है। भारत जितने जोखिम कहीं नहीं हैं, जहां बलों के आकार की तुलना में रक्षा आवंटन बहुत कम है। लेकिन फिर भी अग्निपथ योजना प्रमुख अनुमानों और धारणाओं की पुष्टि के लिए किसी छोटे प्रायोगिक परीक्षण के बिना ही जल्दबाजी में घोषित कर दी गई। सेना ने प्रस्तावित परियोजना का व्यापक प्रचार-प्रसार और विचार-विमर्श किए बिना ही इसे हड़बड़ी में लागू कर दिया। अब भी एक कदम पीछे खींचने और सबसे अहम भागीदार- सेना की युद्धक इकाई का समर्थन हासिल करने में ज्यादा देर नहीं हुई है।