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गर्म होता देश अपना

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 06, 2022 | 11:41 PM IST

हाल ही में भारतीय मौसम विभाग ने एक चौंकने वाला खुलासा किया था। उसका कहना है कि 1901 के बाद से रिकॉर्ड किए गए अपने देश के 10 सबसे गर्म सालों में से आठ पिछले दशक के दौरान ही आए हैं।


मौसम विभाग का यह भी कहना है कि 1993 के बाद से जितने भी बरस आए उनमें एक को छोड़, सभी का औसत तापमान सामान्य से ज्यादा रहा है। इससे एक बात तो साफ हो ही जाती है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अपने मुल्क के मौसम ने करवट लेनी शुरू कर दी है। यह असर हमें तब देखने को मिल रहा है, जब यह कहा जा रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग का असर तो काफी आगे चलकर पता चलेगा या फिर इसका असर कभी कभार ही देखने को मिलता है।


पिछले साल कंपकंपाती ठंड, चिलचिलाती गर्मी, भयंकर बाढ़ और धरती से पानी की बूंद-बूंद चूस लेने वाले सूखे की वजह से देश को भारी नुकसान उठाना पड़ा। साथ ही, मौसम के इसी रूख की वजह से मुल्क को अपने 2000 हजार से ज्यादा लालों की जान से हाथ धोना पड़ा।


मौसम विभाग के इस खुलासे ने कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों की इस आशंका की पुष्टि कर दी है कि इस सदी के अंत तक मुल्क के मौसम का पारा 3 से 6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। साथ ही, मौसम के इस रूठे मिजाज की वजह से 22 वीं सदी के आते-आते मॉनसून की बारिस में भी 15 से 50 फीसदी तक का इजाफा हो जाएगा।


दिक्कत यह है कि ज्यादा बारिस के साथ-साथ गर्मी की वजह से ग्लेशियर भी तेजी से पिघलने लगेंगे। इस वजह से समंदर का पानी काफी बढ़ जाएगा, जिससे अपने वतन का भूगोल ही बदल सकता है। इसका सबसे ज्यादा असर तो जंगली जीवों से भरे-पूरे सुंदरबन जैसे तटीय इलाकों पर ही पड़ेगा।


दूसरी तरफ, ग्लेशियरों के खत्म हो जाने की वजह से देश में गंगा जैसी बड़ी नदियों का वजूद ही खत्म हो जाएगा। इससे सबसे ज्यादा असर पड़ेगा खेती पर पड़ेगा। इसकी वजह से उन लाखों किसानों से उनकी रोजी-रोटी छीन जाएगी, जिनके अपने आप को मौसम में आते इस बदलाव के मुताबिक खुद को ढाल पाने की क्षमता नहीं है।


लेकिन सबसे खतरनाक बात तो यह है कि इस सदी के अंत तक अगर पारे का चढ़ना नहीं रूका तो खेती की पैदावार में एक या दो नहीं, पूरे 10 से लेकर 40 फीसदी तक की अच्छी-खासी गिरावट आ सकती है। मतलब, ग्लोबल वार्मिंग की सबसे ज्यादा कीमत किसी को चुकानी पड़ेगी तो वह कृषि सेक्टर ही होगा, जबकि धरती के पारे को चढ़ाने में उसका योगदान काफी कम है।


चढ़ते पारे की कीमत तो अभी से ही गेहूं को चुकानी पड़ रही है। वैसे, इस बद से बदतर होती हालत में अच्छी बात यह है कि कुछ फसलों, खासतौर पर चावल जैसे कुछ खरीफ फसलों को इस बढ़ती गर्मी से फायदा होगा। लेकिन इसे आशा की किरण कहना खुद को भुलावे में रखने की तरह है क्योंकि ग्लोबल वॉर्मिंग के नुकसान, इसके फायदों पर कहीं ज्यादा भारी पड़ रहे हैं।

First Published : May 15, 2008 | 12:10 AM IST