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कारोबार में भी अपना तिरंगा है सुपरहिट

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 4:43 PM IST

स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे झंडे का कारोबार भी परवान चढ़ रहा है। हर साल 20 प्रतिशत की दर से इसका कारोबार बढ़ता जा रहा है।


राष्ट्रीय पर्व के नजदीक आने पर युवाओं और बच्चों में इसकी खरीदारी को लेकर खासा उत्साह देखा जाता है। खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) के आंकड़ों को मानें, तो इसकी बिक्री कम-से-कम प्रति राज्य 60,000 से ज्यादा है। केवीआईसी ने तो लोगों में झंडे को खरीदने की प्रवृति बढाने के लिए एक नारा भी दिया है- एक जिम्मेदार नागरिक बनें, राष्ट्रीय झंडा खरीदें।

केवीआईसी के निदेशक (मार्केटिंग) एस  के सिन्हा ने कहा कि अगर देश की 55 प्रतिशत से ज्यादा पढ़ी- लिखी आबादी का रोजगारी तबका अपने टेबुल पर लगाने के लिए एक झंडा भी खरीदती है, तो इसकी बिक्री संख्या कम-से-कम 8 से 10 करोड़ से भी ज्यादा हो जाएगी और यह व्यापार 27 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच जाएगा।

सिन्हा बताते हैं कि हम इस स्थिति में नहीं हैं, कि बिक्री का कोई ठोस आंकड़ा पेश कर सके। यह बाजार इतना असंगठित है कि इसकी आपूर्ति और मांग को लेकर कोई सही आंकड़ा पेश कर पाना मुश्किल है। उद्योगपति और सांसद नवीन जिंदल की उस याचिका को जब हरी झंडी मिल गई थी, जिसमें उसने हर बिल्डिंग (सरकारी या निजी), स्कूल, कॉलेज, कार्यालयों आदि हरेक जगहों पर झंडा लगाने की बात की थी, उसके बाद लोगों में झंडे खरीदने की प्रवृत्ति में काफी तेजी आई है।

लिहाजा इसका बाजार भी इस वजह से काफी बढ़ गया है। वैसे तो आप जहां-तहां कपड़े, प्लास्टिक और कपड़ों के झंडे बेतरतीब ढंग से बिकते हुए पाएंगे। लेकिन इसके आकार और रंगों को लेकर एक नियत निर्देशों को पालन करना होता है। सिन्हा कहते हैं कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मुंबई, दिल्ली आदि महानगरों के लिए उनके पास 2-2.5 लाख झंडे बनाए जाते हैं। ये सारे झंडे फ्लैग कोड के मुताबिक बनाए जाते हैं, जिसमें इसके आकार और रंगों का पूरा ख्याल रखा जाता है।

हालांकि बहुत कम लोगों को पता है कि इस तरह का कोई सर्टिफाइड झंडा भी होता है। इस बाबत केवीआईसी ने सारे राज्यों, क्षेत्रीय कार्यालयों और डिपार्टमेंटल स्टोर्स को यह निर्देश भी भेज दिया है कि सर्टिफाइड झंडे के वितरण को प्रोत्साहित किया जाए। उन्होंने बताया कि सड़कों के किनारे झंडे काफी सस्ते मिल जाया करते हैं। सदर बाजार में झंडों के थोक विक्रेता हारून असलम ने कहा कि राष्ट्रीय पर्वों पर झंडे का कारोबार काफी अधिक होता है।

वैसे तो लोग अन्य दिनों में भी झंडे खरीदने आया करते हैं, लेकिन यह व्यापार के ख्याल से नगण्य होता है। असलम ने बताया कि 15 अगस्त से 15 दिन पहले इसकी मांग बढ़ने लगती है और तिथि ज्यों-ज्यों नजदीक आती है, इसकी बिक्री बढ़ती जाती है। उनका कहना है कि कागजों और प्लास्टिक के झंडों की बिक्री कुल बिक्री का 65 प्रतिशत से अधिक होता है। लोग खादी की बजाय पॉलिएस्टर और सस्ते कपड़ों से बने झंडे को प्राथमिकता देते हैं।

किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे अहम बात यह है कि उनके नागरिक राष्ट्रीय प्रतीकों और आदर्शों के प्रति जोश और सम्मान का जज्बा बरकरार रखें। लिहाजा झंडे का कारोबार तो अपनी जगह है, लेकिन इससे जुड़ी भारतीयता और देशभक्ति की भावना ही सबसे प्रमुख है। आज युवाओं और शहरी लोगों की जीवन-शैली में काफी बदलाव आया है, लेकिन इसके बावजूद इन राष्ट्रीय पर्वों के मौके पर जब वे अपनी हाथों में तिरंगा झंडा लेकर भारतीय होने का गौरव महसूस करते हैं, तो एकबारगी यह एहसास करा जाती है कि उनके लिए देश के क्या मायने हैं।

इन नई पीढ़ियों ने हालांकि वंदे मातरम से मां तुझे सलाम तक का सफर जरूर तय किया है, लेकिन बदलाव की इस बयार में जो एक चीज नहीं बदली है वह है- देशभक्ति की भावना। गांधीवादी नेता उमाकांत कालेलकर कहते हैं कि आज की युवा पीढ़ी भले ही रॉक एंड रॉल की धुनों पर थिरकते नजर आ जाते हैं, लेकिन उनकी कर्तव्यपरायणता और वास्तविकता से जुडाव कमाल का है।

आज बहुत सारे युवा ऐसे हैं, जो देश के लिए कुछ हट कर करने का जज्बा रखते हैं। अगर हमारा युवावर्ग देश की भलाई के लिए एक छोटा सा भी काम करने का प्रण करें, जो मुश्किल नहीं है, तो यह बहुत बड़ी बात होगी। फिर सपनों के भारत की परिकल्पना अतिशियोक्ति मालूम नहीं पड़ेगी।

First Published : August 13, 2008 | 12:20 AM IST